Sunday, 17 May 2020

आर्यो,हिन्दुओ का कुरान की आयतो पर आपत्ति का जवाब

।।काफ़िर और नास्तिक।।

"सत्यार्थप्रकाश" के कर्त्ता द्वारा हिन्दू समाज और अन्य धर्म में यह भ्रम और भ्रांति फैलाई गई कि कुरआन में काफिरों के लिए आक्रमक और अपमानजनक घोषणाएं हैं। देश का एक विशिष्ट वर्ग कुरआन की कुछ आयतों (मंत्रों) को लेकर इसी प्रकार की आपत्ति करता है और कहता है कि इस्लाम न केवल अन्य धर्मों का अनादर करता है बल्कि जुल्म और अत्यचार को भी प्रोत्साहित करता है। कुरआन की कुछ आयतों को यहां उद्घृत किया जा रहा है जिन पर लोगों को आपत्ति है और जिन्हें "सत्यार्थप्रकाश" में अति अशिष्ट भाषा में आरोपित किया गया है।
1. "काफ़िरों को अपना मित्र न बनाओ।" (3:28)
2. "मुशरिक तो बस अपवित्र ही हैं।" (9:28)
3. "मुशरिक (काफ़िर) को जहाँ पाओ क़त्ल करो।" (9:5)
4. "जब काफ़िरों से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो पहला काम इनकी गर्दनें मारना है।" (47:4) आदि...


उपरोक्त आयतों को समझने के लिए हमें न केवल उस पृष्ठभूमि और उन परिस्थितियों को समझना पड़ेगा जिनमें ये आयतें अवतरित हुई हैं बल्कि हमें इस्लाम के उद्देश्य और मिशन को भी समझना होगा। केवल आयतें (मंत्रों को) पढ़कर और सुनकर आरोप लगाना बुद्धिमात्ता नहीं है। इस्लाम शान्ति, एकता और समानता का आवाहक है। वह दुनिया में कुफ्र (नास्तिकता) को सबसे बड़ा जुल्म, बिगाड़ और फ़साद का कारण समझता है, इसलिए इसे मिटाने और समूल नष्ट करने को प्राथमिकता देता है। यही इस्लाम का मूल उद्देश्य और मिशन है।
इस असीम और अद्भुत ब्रह्मांड का सृजन करने वाली सत्ता सिर्फ एक है, वही एक मात्र व्यवस्थापक, नियामक, न्यायध्यक्ष और उपास्यदेव है। उसको छोड़कर किसी अन्य शक्ति, सत्ता अथवा देवी-देवता को इष्ट और न्यायध्यक्ष समझना कुफ़्र (नास्तिकता) है। मानव जीवन से जुड़ा यह एक ऐसा स्तय है कि इससे कोई अक़्ल का अंधा व्यक्ति ही इंकार कर सकता है और जो इस सत्य का इनकार करता है वह व्यक्ति अथवा समूह यक़ीनन नास्तिक (काफ़िर) है। कोई व्यक्ति या समुदाय अगर अपने पैदा करने वाले का ही इनकार के दे, इससे बड़ा गुनाह (पाप) और क्या हो सकता है ? इस्लाम मुख्यतः इसी स्तय का प्रतिपादन करता है। इसी स्तय का स्थापन ही इस्लाम का मुख्य उद्देश्य और मिशन है। वेद भी इसी स्तय का प्रतिपादन करती हैं।
इस्लाम की दृष्टि में उक्त स्तय का इनकार और विरोध एक नाकाबिल-ए-माफ़ी गुनाह (पाप) है। मृत्योपरांत इस गुनाह-ए-अज़ीम (बड़ी पाप) का अंजाम अति भयानक हैं। मानव जाति के अंतिम चरण में सम्पूर्ण मानवता को इस भयानक अंजाम से बचाने के लिए यह उत्तरदायित्व इस्लाम के अंतिम सन्देशवाहक हज़रत मोहम्मद (सल्ल०) पर डाला गया। आपने (सल्ल०) इस्लाम की शिक्षा और सिद्धांतों को अत्यंत शान्तिमय तरीके से लोगों तक पहुंचाना प्रारम्भ कर दिया। आपका संबन्ध अरब क़ौम (समुदाय) से था जो एक बर्बर व असभ्य क़ौम थी। आपके सन्देश को लोगों ने सुना। 
सन्देश को सुनकर कुछ लोग आपके करीब आते गए। कुछ लोग आपके दुश्मन बन गए। आपके दुश्मनों ने आप व आपके साथियों को परेशान करना, अपमानित करना, मज़ाक उड़ाना, सख़्त बर्ताव, ईर्ष्या, द्वेष, गाली-गलौच करना प्रारम्भ कर दिया।
आपने फिर भी शान्तिमय तरीके से अपना सन्देश सुनाने और फैलाने का क्रम जारी रखा। आपके समकालीन लोगों ने आपके मिशन के बढ़ते प्रचार और प्रसार को देखकर आप व आपके साथियों को सताना व यातनाएं देनी प्रारम्भ कर दी। आपका बहिष्कार किया गया। भूखा-प्यासा रहने पर विवश किया गया। आप ताइफ़ (शहर) चले गए ताकि वहां के लोगों को अपना सन्देश सुनाकर अपना समर्थक बनाए, मगर वहाँ भी आपके साथ अमानुषिक व्यवहार किया गया। 
पत्थर मार-मार कर आपको लहूलुहान कर दिया। आप फिर ताइफ़ (शहर) से मक्का (शहर) वापस आ गए। इस्लाम विरोधियों ने आपकी हत्या करने की योजनाएं बनाई। एक बार यहूदियों में से एक गिरोह ने आप व आपके ख़ास-ख़ास साथियों के खिलाफ एक गुप्त षडयन्त्र रचा कि आपको खाने की दावत पर बुलाकर अचानक आप पर जानलेवा हमला कर देंगे, मगर ठीक समय पर अल्लाह की कृपा से आपको इस षडयन्त्र का पता चल गया और आप दावत पर नहीं गए। एक बार कुरैशियों (समुदाय वालों) ने आपको मार डालने की साज़िश के तहत रात के समय आपके घर को चारों तरफ से घेर लिया मगर अल्लाह की कृपा से इस्लाम विरोधियों की यह साजिश भी नाकाम हो गई।
आप मक्का छोड़कर मदीना (शहर) चले गए, मगर इस्लाम के कट्टर विरोधियों ने वहां भी आपका पीछा नहीं छोड़ा। जो लोग आपकी शिक्षाओं को समझकर आपके साथ आना चाहते थे, उनको रोकने के लिए उनपर असहनीय जुल्मों-सितम ढाए गए। 
आपके ख़िलाफ भ्रम और भ्रांतियां फैलाई गई। जो समझौते और सिंधियां की गई, उनकी शर्तों को तोड़ा गया। आपको धोखा देने के लिए मुशरिकों (बहुदेववादीयों) और मुनाफिकों (कपटाचारियों/धोखेबाज़ों) ने मस्जिद के नाम से एक षडयन्त्र का अड्डा बनाया। आपको काबा की ज़ियारत से रोका गया, मगर फिर भी आपकी तरफ से कोई विरोधात्मक कार्यवाही नहीं कि गई।
आरम्भिक काल में इस्लाम स्वीकार करने वालों के ऐतिहासिक किस्से पढ़ने पर पता चलता है कि उन बेकसूर स्त्रियों व पुरुषों पर अमानुषिक जुल्मों-सितम को सुनकर कौन-सा दिल होगा जो न रो पड़ेगा। धधकते कोयलों, तपती बालू पर नंगे कर लिटाना, शरीर के अंगों को काट-काट कर निर्ममता व निर्दयता से हत्या करना, जुल्मों-सितम करने में अपने सगे-संबंधियों की परवाह न करना, भ्रम व भ्रांतियां फैलाकर लोगों को सही रास्ते की तरफ आने से रोकना आदि बातों की जब अति हो गई तब विषम व विकट परिस्थितियों में विवशता वश प्रतिशोधात्मक नहीं बल्कि आत्मरक्षा के लिए उन षड्यंत्रकारियों के साथ अल्लाह की तरफ से लड़ाई का आदेश अवतरित हुआ। 

कुरआन के कुछ अंश यहां उद्धृत किए जाते हैं-

1. "बहुत बुरी करतूत थी जो ये करते रहे। किसी ईमान वाले के मामले में न ये किसी नाते-रिश्ते की परवाह करते हैं और न किसी समझौते के दायित्व की, और ज़्यादती सदैव इन्हीं की ओर से हुई है।" (9:10)
2. "यदि प्रतिज्ञा के पश्चात ये फिर अपनी क़समों को तोड़ डालें और तुम्हारे धर्म पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दें तो अधर्म के ध्वजावाहकों से युद्ध करो क्योंकि उनकी क़समों का कोई विश्वास नहीं।" (9:12)
3. "क्या तुम न लड़ोगे ऐसे लोगों से जो अपनी प्रतिज्ञा भंग करते हैं और उन्होंने रसूल को देश से निकाल देने का निश्चय किया था, ज़्यादती का आरम्भ करने वाले वही थे।" (9-13)

यहां यह विचारणीय है कि क्या तार्किर्कता और बौद्धिकता का मुकाबला गाली-गलौच, पत्थर और तलवार से करने को न्यायसंगत कहा जा सकता है ? क्या किसी व्यक्ति अथवा गिरोह को महज इस कारण जुल्मों-सितम का निशाना बनाना कि वह हक (स्तय) को जानकर उसे क़बूल कर रहा है, तर्कसंगत कहा जा सकता है ? क्या किसी व्यक्ति अथवा गिरोह का विरोध इस वजह से करना कि वह लोगों को बुराई से रोकता है, भलाई की तरफ बुलाता है, बुद्धि सम्मत कहा जा सकता है ?
आप (सल्ल०) की लगभग 23 वर्ष की नबूवत की अवधि में मात्र 1018 लोग मारे गए जिनमें 259 आप के पक्ष के व 759 विरोधी पक्ष के थे (जंगो में)। जबकि विश्व में जितनी बड़ी क्रांतियां हुई हैं, उनमें मरने वालों की संख्या इतनी अधिक है कि उनके मुकाबले इस्लामी क्रांति को रक्तहीन क्रांति ही कहा जाएगा। 
यह भी विचारणीय है कि जिस व्यक्ति ने अविद्यान्धकार में डूबी ज़ालिम व बर्बर क़ौम को समता, न्याय, एकता, नैतिकता व शिष्टता का पाठ पढ़ाया हो, उसकी उद्दंडता, कुचरित्रता, अस्वच्छता को समाप्त कर एक उच्च कोटि की सभ्यता विकसित की हो, उस व्यक्ति के मिशन पर ये आरोप कि वह अनुदार व असहिष्णु तत्ववाद का प्रतिनिधित्व करता है, यह एक दुराग्रह से ग्रसित का आरोप तो हो सकता है मगर जिन लोगों ने कुरआन व उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का गहनता, गंभीरता व निष्पक्षता से अध्ययन किया है वे इस्लाम पर इतना घिनोना आरोप कभी न लगाएंगे। 
कुरआन का निष्कपटता के साथ अध्ययन व चिंतन किए बिना उसकी शिक्षाओं पर आरोप-प्रत्यारोप करना न केवल सांप्रदायिक विद्वेष उतपन्न करेगा, बल्कि नैतिक अपराध भी होगा। इस्लाम का स्वभाव सुधारात्मक व प्रचारत्मक है प्रतिशोधात्मक व धृणात्मक नहीं है। इस्लाम प्रेम व भाईचारे की बुनियादों पर जीवन का निर्माण करता है मगर शोषित व पीड़ित की सहायता व अन्याय व असत्य की उद्दंडता के लिए तलवार (हत्यार) उठाने को जायज़ ही नहीं अनिवार्य समझता है। 

कुरआन की निम्नलिखित आयतों पर भी एक दृष्टि डालिए-
1. "बुराई का बदला भलाई से दो, तुम देखोगे कि जिसे तुम से दुश्मनी थी, वह भी तुम्हारा गहरा दोस्त हो जाएगा।" (41:34)
2. "किसी जीव की नाहक़ हत्या न करो।" (6:151)
3. "किसी व्यक्ति को किसी खून का बदला लेने या धरती में फ़साद के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानों उसने सारे ही मनुष्यों की हत्या कर डाली और जिसने उसे जीवन प्रदान किया उसने मानों सारे मनुष्यों को जीवनदान दिया।" (5:32) 
4. "किसी संप्रदाय विशेष की शत्रुता तुम्हारे लिए इस बात का कारण न बन जाए कि तुम न्याय न करो।" (5:8) 
5. "जो तुम पर जुल्म करें तुम उसे माफ कर दो।" (हदीस) 

उपर्युक्त तथ्यों और विश्लेषण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कुरआन में जिन लोगों के लिए काफ़िर, ज़ालिम, मुशरिक, मुनाफ़िक़ आदि शब्द प्रयोग किए हैं, ये अत्यंत घृणित प्रवृत्ति के लोग थे, जिनके दिलों में कपट व नियतों में खोट था। जिन्होंने अपने आचरण से ये बात साबित कर दी थी कि वे वास्तव में झूठी मान बड़ाई की खातिर स्तय, सज्जनता व तर्क का मुकाबला झूठ, फरेब व तलवार से कर रहे थे। घिनोने षडयन्त्र रच-रच कर इस्लाम के अनुयायियों पर जुल्मों-ज्यादती कर रहे थे। इन्हें न रिश्तों-नातों का कोई लिहाज़ था, न अपनी क़समों की कोई परवाह। ये शब्द किसी जाति, रंग व नस्ल के लिए नहीं बोले गए हैं। 
ये सभी शब्द गुणवाचक हैं जो आपके समकालीन कुछ खास निकृष्ट प्रवृत्ति के लोगों के लिए प्रयोग किए गए हैं। 
निःसन्देह विश्व में कुछ मुस्लिम तत्व आतंक की कार्यवाही में लिप्त हैं। एक खास मानसिकता के वे तत्व जिहाद के नाम पे निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हैं। कहने को वे मुस्लिम हैं, मगर वास्तव में वे इस्लाम के सच्चे अनुयायी नहीं है। 
इस्लाम तो सौहार्द और सहिष्णुता का प्रतिनिधित्व करता है, मगर तथाकथित तत्वों ने इस्लाम की उदारवादी छवि को अत्यंत नुकसान पहुंचाया है। इस्लाम जिस सहिष्णुता की मांग करता है, आज उसमें अत्यंत गिरावट देखने में आ रही है जो अत्यंत ही दुःखद और दुर्भग्यपूर्ण हे। विश्व का जनमानस इस्लाम और मुस्लिम समुदाय को जिस धृणित दृष्टि से देख रहा है इसके लिए इस्लाम की शिक्षा नहीं बालको मुस्लिम समुदाय दोषी और उत्तरदायी है।
अब जहां तक हिन्दू समुदाय का सवाल है, विराट हिन्दू समुदाय में उन लोगों की संख्या नगण्य है, जो वेदों को अपनी एक मात्र धार्मिक पुस्तक मानते हैं। 
यहां यह विचारिणी है कि यदि सम्पूर्ण समाज वेदों को अपनी एक मात्र धार्मिक पुस्तक मान ले तो फिर उनके लिए रामायण और गीता व्यर्थ और अस्वीकार्य हो जाएगी, क्योंकि वेदों और रामायण व गीता की धारणाएं एक दूसरे के विपरीत और विरोधी हैं। आर्यसमाजी धारा के लोग जो वेदों को अपनी एक मात्र धार्मिक पुस्तक मानते हैं, उनमें उन लोगों की संख्या नगण्य है, जिन्हें वेदों का समुचित ज्ञान है। दयानंदीय आस्था धारा के लोगों ने चूंकि "सत्यार्थ प्रकाश" को वेदों की कुंजी मान लिया है, इसलिए वे वेदों के मूल को पढ़ने की जरूरत ही नहीं समझते। विडंबना तो यह है कि उन्हें वेदों का तो क्या, "सत्यार्थ प्रकाश" का भी समुचित ज्ञान नहीं है। 
वेद और मनुस्मृति में भी काफ़िर के समानार्थी शब्द के रूप में नास्तिक, म्लेच्छ, दस्यु आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। 
जो आक्रामक घोषणाएं कुरआन में काफ़िरों के लिए की गई हैं, वैसी ही घोषणाएं वेद और मनुस्मृति में वेद-निंदकों और नास्तिकों के लिए की गई हैं। कहीं-कहीं तो ऐसी धोषणाएँ भी की गई हैं, जिन्हें किसी भी आधार पर न्यायोचित और तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता।
आइए कुछ उदहारण देखते हैं-
"सत्यार्थ प्रकाश" में स्वामी जी स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं-

"म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः।।" (मनुस्मृति 10:45)
"म्लेच्छ देश स्तवतः परः।" (मनुस्मृति 2:23)"भावार्थ: जो आर्यवत से भिन्न देश है वे दस्यु (दुष्ट) और म्लेच्छ देश कहलाते है।"-पृष्ठ 264:8 समुल्लास। 

जहां कुरआन में काफ़िर, मुशरिक, ज़ालिम आदि शब्द गुणवाचक के तौर पर आया हैं वही उक्त में दस्यु और म्लेच्छ शब्दों को स्थानवाचक के रूप में प्रयोग किया गया है अर्थात एक देश विशेष के अलावा अन्य देश के सभी मनुष्य चाहे वो सत्कर्मी और सदाचारी ही क्यों न हों, दस्यु और म्लेच्छ हैं। क्या उक्त धोषणा न्यायसंगत है ? आस्था और सद्गुण के स्थान पर भौगोलिक क्षेत्र और जन्मभूमि को अच्छे-बुरे का आधार बनाना कौन-सी ईश्वरीय व्यवस्था है ? 
आगे लिखा है- 
"हम सृष्टि विषय में कह आए हैं कि "आर्य" नाम उत्तम पुरुषों का है और आर्यों से भिन्न मनुष्यों का नाम दस्यु हैं।"-पृष्ठ 324:11समुल्लास।

"जैसे आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को कहते हैं वैसे ही में भी मानता हूं।"-स्वमन्त०29।

अब जैसा कि उपरोक्त से स्पष्ट है कि सभी अनार्य चाहे वो उत्तम गुणों से युक्त हों "दुष्ट" हैं। 
दुष्टों के लिए मनुस्मृति में क्या सजा लिखी है, उसे भी देखिए।

"नाततापिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युं ऋच्छति।।" 
भावार्थ: दुष्ट पुरूषों के मारने में हन्ता को पाप नहीं होता चाहे प्रसिद्ध (सबके सामने) मारे चाहे अप्रसिद्ध (एकान्त में) क्यों कि क्रोधी को क्रोध से मारना जानो क्रोध से क्रोध की लड़ाई है ।(मनुस्मृति 8:351)

"योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्द्विजः ।स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः"
भावार्थ: जो तर्कशास्त्र के आश्रय से वेद और धर्मशास्त्र का अपमान करता अर्थात् वेद से विरूद्ध स्वार्थ का आचरण करता है, श्रेष्ठ पुरूषों को योग्य है कि उसको अपनी मण्डली से निकाल के बाहर कर देवें क्यों कि वह वेदनिन्दक होने से नास्तिक है । (मनुस्मृति 2:11)

"उपरुध्यारिं आसीत राष्ट्रं चास्योपपीडयेत् ।दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम्।।"
भावार्थ: किसी समय उचित समझे तो शत्रु को चारों ओर से घेरकर रोक रखे और इसके राज्य को पीडित कर शत्रु के चारा, अन्न, जल और इन्धन को नष्ट दूषित कर दे। (मनुस्मृति 7:195)

अथर्वेद 12:5:61 भावार्थ "वेद विरोधी दुराचारी पुरुष को न्याय व्यवस्था से जला कर भस्म कर डाले।"

अथर्वेद 12:5:62 भावार्थ "तू वेद निंदक को काट डाल, चिर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूंक दे, भस्म कर दें।

ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर "दस्यु" शब्द का प्रयोग हुआ है वेद विद्वानों ने दस्यु शब्द का अर्थ अनार्य, दुष्ट, शत्रु, प्रतिद्वंद्धि और यज्ञादि न करने वाले पतित लोग लिया है। ऋग्वेद में अनेक ऐसे मंत्र हैं जिनमे दस्युओं का नाश करने और मारने के लिए प्रार्थना की गई है।

ऋग्वेद 1:100:18 भावार्थ: "हे पुरुहूत, बहुत बार बुलाए गए इंद्र, अपने स्वभावनुसार दस्युओं और शिभ्युओं को पृथ्वी पर पटक कर वज्र द्वारा कुचल डालों।"
ऋग्वेद 10:38:3 भावार्थ: "हे विद्वान वा राजन! यदि उत्तम कर्म रहित दस्यु कर्मा मनुष्य! अथवा बलशाली मनुष्य और राक्षसी वृत्ति वाला मनुष्य हमें युद्ध के लिए ललकारे तो ये सभी शत्रु हमारे द्वारा परास्त होवें। आपके सहाय से रण में हम उन्हें मार भगायें।"

ऋग्वेद 10:22:8 भावार्थ: "हे काम आदि शत्रुओं का नाश करने वाले भगवन! जो उत्तम कार्यों को नहीं करने वाले, वेद विहित कर्मों के क्षय करने वाले, राक्षसी प्रवृत्ति के मनुष्य आप हन्ता होकर उनको विनष्ट करें।"

ऋग्वेद 9:41:2 भावार्थ "वेद नियमों का भंग करनेवाले नाशक आसुरी भाव को कुचलनेवाले बनते हैं।"

ऋग्वेद 10:28:8 भावार्थ: "शक्तिशाली लोग आगे बढ़े, हथियारों को धारण करें, जंगलों को काटते हुए और रास्ते में नदी पड़े तो उसके वेग को रोकते हुए पानी के वेग का अनुसरण करते हुए शत्रु सैन्य को दुग्ध करें।"

सत्यार्थ प्रकाश के दशम समुल्लास में स्वामी जी लिखते हैं- "कभी नास्तिक, लम्पट, विश्वासघाती, मिथ्यावादी, स्वार्थी, कपटी, छली, आदि दुष्ट मनुष्यों का संग न करें।"पृष्ठ 310:10समुल्लास।

अगर कोई व्यक्ति उक्त विषय वस्तु को पढ़कर केवल बाह्य  शब्दों और अर्थों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल ले कि इसमें तो जैन, बौद्ध, सिख, यहूदी, ईसाई, मुसलमान, आदि विधर्मियों के लिए आक्रामक और अपमानजनक घोषणाएं है तो क्या इसे न्यायसंगत माना जाएगा ?
सन्दर्भ, पृष्टभूमि और परिस्थितियों से अनभिज्ञ, बिना किसी विवेक, अध्ययन और अन्वेषण के केवल शब्दों और वाक्यों के बाह्य अर्थों को आधार बनाकर एक तरफा और मनोनुकूल अर्थ निरुपूर्ण करना बौद्धिक और तार्किक जीवन की नितांत दुर्भाग्यपूर्ण और दुःखद स्थिति है। 
यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है जब आरोपों का विषय किसी समुदाय की आस्थाओं से जुड़ा हो। आरोपों में अगर दंभ और दुराग्रह हो तब तो स्थिति अत्यंत ही गंभीर और भयावह हो जाती हैं।

ऐसे आपत्तिकर्ताओं के लिए सत्यार्थप्रकाश में स्वामी जी ने लिखा है- "बहुत से हठी, दुराग्रह मनुष्य होते हैं कि जो वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध कल्पना किया करते है,विशेषकर मत वाले लोग। क्योंकि मत के। आग्रह से उनकी बुद्धि अंधकार में फंस कर नष्ट हो जाती है।" (भूमिका) 

कुछ ऐसा ही व्यवहार कुरआन के साथ कथित लेखकों ने किया है स्वामी जी जिनमे आप भी गिनती में आते है और आलोचकों द्वारा भी किया गया है। कुरआन की मंत्रो (आयतों) की जो आलोचना विरोधी मत वालों के द्वारा की गई है उसमें न विवेक नज़र आता है और न कहीं गंभीरता नज़र आती है। उसमें केवल आग्रह और दुराग्रह है जो विवेकपूर्ण जीवन के लिए अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यह भी बौद्धिक जीवन की एक विडंबना ही है कि जो आरोप खुद हम पर बनते हैं वही आरोप हम दूसरों पर लगाए।
।।धन्यवाद।।
-Shoaib Pathan

Saturday, 17 September 2016

कुछ गैर मुस्लिम भाई लोग पूछते हैं कि अल्लाह का अस्तित्व वास्तव मे है भी या नहीं, मुस्लिम भाई ये कैसे सिद्ध करेंगे ??

कुछ गैर मुस्लिम भाई लोग पूछते हैं कि अल्लाह का
अस्तित्व वास्तव मे है भी या
नहीं, मुस्लिम भाई ये कैसे सिद्ध करेंगे ??

पहली बात तो मै यही कहना चाहता हूँ कि अल्लाह कोई अलग ईश्वर नहीं बल्कि विश्व के हर धर्म के मूल मे बताए गए एक और निराकार ईश्वर का ही नाम है …तो विश्व का जो भी व्यक्ति एक और निराकारईश्वर मे विश्वास करता है वो वास्तव मे अल्लाह पर ही विश्वास करता है! हां, ये बात अलग है कि वो अल्लाह का हक न अदा करता
हो !! 
जहाँ तक अल्लाह के अस्तित्व का सबूत होने की बात है, तो अल्लाह के होने का सबसे बड़ा सबूत है कुरान पाक जिसके विषय मे अल्लाह फरमाता है कि यदि किसी को कुरान के विषय मे ये शक हो कि ये मनुष्य का लिखा हुआ है तो उसे चैलेन्ज है कि वो कुरान जैसी एक ही आयत बना लाए और अगर न ला पाए तो ये मान ले कि ये कुरान तुम्हारे रब्ब का ही भेजा हुआ है …लेकिन 1400 वर्ष बीत गए कुरान का ये चैलेन्ज अब तक कायम है और कोई भी व्यक्ति कुरान जैसी कोई आयत नहीं ला सका…!!
ध्यान देने की बात है कि कुरान का अवतरण एक ऐसे महापुरुष पर हुआ जो न तो पढ़े लिखे थे, न ही पेशे से कोई वैज्ञानिक या चिकित्सक थे इसके बावजूद कुरान मे ऐसी ऐसी विज्ञान की बातें आज से 1400 साल पहले लिख दी गई हैं,जिनको पढ़ के आज भी आधुनिक विज्ञान का ज्ञान रखने वाले अपने दांतो तले अंगुलियां दबा लेते हैं ।
आप ही सोचिए ब्रह्माण्ड के जन्म की बिग बैंग थ्योरी,चन्द्रमा का प्रकाश उसका अपना नही,धरती का आकार वास्तव मे गोल है, पेड़ पौधों मे भी जीवन है, मानव शिशु के जन्म की प्रक्रिया जैसी विज्ञान की जिन बातों का ज्ञान मनुष्य को अब से महज़ डेढ़ दो सौ वर्ष पूर्व ही हो सका है ।
तो अब से 1400 वर्ष पूर्व हज़रत मोहम्मद स.अ.व. के पास उस ज्ञान के पहुंचने का स्रोत क्या था ..??? अन्य कोई स्रोत आपको समझ पड़ता हो तो बता दीजिए…. अन्यथा ये मान लीजिए कि निश्चित ही वो अल्लाह था जिसने नबी स.अ.व. को ये अमूल्य ज्ञान दिया ..!!!
इसके अतिरिक्त आप ये भी जानते होंगे कि विश्व मे ऐसी बहुत सी अनोखी बातें हुई हैं जिनके होने का क्या कारण था, विज्ञान इस पर मौन रहा है … और हार कर दुनिया के
वैज्ञानिकों को मानना ही पड़ा है कि कोई न कोई ऐसी सुपर नेचुरल पावर है , जिसे विज्ञान के द्वारा समझा नहीं जा सकता, और जो विज्ञान से परे होने वाली ऐसी
घटनाओं का कारण है, यही सुपर नेचुरल पावर है अल्लाह और अल्लाह ने कुरान ए पाक मे ऐसी कई चमत्कारी घटनाओं का वर्णन किया है जिनपर विज्ञान मौन है,
जैसे अल्लाह ने मिस्र के जालिम शासक फिरऔन की लाश को सदा के लिए बचाए रखने का पवित्र कुरान मे वादा किया है ताकि फिरऔन के अंजाम से दुनिया वाले सबक लें अब से सौ वर्ष पूर्व फिरऔन की वो लाश लाल सागर मे उतराती हुई पाई गई जिसपर कई परीक्षण करने के बाद भी वैज्ञानिक ये पता नही लगा पाए कि फिरऔन की मौत के 3000 वर्ष बाद भी उसका शरीर सड़ गल कर नष्ट क्यों नहीं हुआ।
जब विज्ञान इस प्रश्न का उत्तर नही दे सका तो फिरऔन की लाश पर 1981 मे परीक्षण करने वाले फ्रांस के ख्यातिलब्ध चिकित्सक “डाक्टर मौरिस बुकाय” इस चमत्कार के पीछे के कारण उस सुपर नेचुरल पावर अल्लाह के आगे नतमस्तक हो
गए और इस्लाम कुबूल कर लिया जिन लोगों को भी अल्लाह के अस्तित्व पर शंका है, मेरी उन लोगों
को यही सलाह है कि वो दुनिया मे फैले चमत्कारों जैसे बरमूडा त्रिकोण, फिरऔन का अक्षय शरीर आदि के उत्तर ढूंढ कर लाने की कोशिश करें… साथ ही ये भी पता करने की कोशिश करें कि पवित्र कुरान मे विज्ञान की वो बातें कैसे दर्ज कर ली गई थीं जिनका ज्ञान 1400 वर्ष पहले किसी भी मनुष्य को नही था और यदि आप इन सवालों का कोई उत्तर न ढूंढ पाएं तो मान लीजिए कि इन सब बातों के पीछे अल्लाह ही कारण है मुझे तो अपने अल्लाह के अस्तित्व पर पूरी तरह विश्वास है क्योंकि अल्लाह ने कुरान मे वादा किया है कि

“मुझसे दुआ मांगो (एकेश्वर मे पूरा विश्वास रखकर), मै
तुम्हारी दुआ कुबूल करूंगा”

तो मैंने जब भी अल्लाह से पूरे विश्वास के साथ दुआ मांगी मेरी दुआ अक्षरश कुबूल हुई है …. जिन लोगों का भी विश्वास अल्लाह/निराकार ईश्वर के विषय मे डांवाडोल रहता है वो पहले कुरान के प्रमाणो पर शोध कर के ये जान लें कि अल्लाह का अस्तित्व है

फिर केवल एक अल्लाह मे विश्वास करते हुए दुआ मांगे तो जब उनकी दुआएं कुबूल हो जाएंगी तो उन्हें ये विश्वास भी हो जाएगा कि केवल अल्लाह ही पूज्यप्रभू है॥

Friday, 16 September 2016

तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हे..???

क्या इस्लाम एक बुरा धर्म हैं!!!

जब से इस्लाम धर्म दुनिया में आया हैं , तब से ही इस्लाम को बुरा कहने वाले भी पैदा हो गये हैं।
इस्लाम धर्म से चिढने वालों की हर वक़्त यही कोशिश रहती हैं कि किसी न किसी तरीके से इस्लाम को बदनाम किया जाए
और वे इस्लाम धर्म के प्रति अलग अलग प्रकार की भ्रामक बातें फैलाते रहते हैं।आखिरकार वे इस्लाम से चिढते क्यों हैं? जबकि

1-इस्लाम कहता है कि हमें एक ईश्वर को पुजना चाहिए जो हम सबका मालिक हैं। जिसका कोई रंग हैं ना कोई रूप हैं। जिसे किसी ने नहीं बनाया पर उसने हर चीज़ को बनाया। अगर ये बात बुरी हैं तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

2-इस्लाम कहता है कि तुम्हारी मेहनत की कमाई से 2.5% गरीबों को देना हर हालत में जरूरी हैं। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

3- इस्लाम कहता है कि तुम लोगों की मदद करोगे तो खुदा तुम्हारी मदद करेंगा। और जो कुछ भी तुम अपने लिए चाहते हो वही सबके लिए भी चाहो तो ही एक सच्चे मुसलमान बन सकते हो। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

4-इस्लाम कहता है कि तुम एक महीने तक सुबह से शाम भूखे और प्यासे रहो ताकि तुम्हें एहसास हो सकें कि भूख और प्यास क्या होती हैं। अगर ऐसी बात सिखाना गलत हैं तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

5-इस्लाम कहता है कि तुम्हारे घर बेटी पैदा हो तो दुखी मत होना क्योंकि बेटियाँ तो खुदा की रहमत (इनाम) हैं। और जो व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई से अपनी बेटी की परवरिश करें और उसकी अच्छे घर में शादी कराएँ तो वो जन्नत (स्वर्ग) में जायेगा। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

6-इस्लाम कहता है कि सबसे अच्छा आदमी वो हैं जो औरतों के साथ सबसे अच्छा सुलूक करता हैं। अगर ये बुरी बात है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

7- इस्लाम कहता है कि विधवाएं मनहूस नहीं होती इन्हें भी एक बेहतर जीवन जीने का पूरा अधिकार है। इसलिए विधवाओ और उनके बच्चों को अपनाओ। अगर विधवाओ को अधिकार देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

8- इस्लाम कहता है कि ऐ मुसलमानों जब नमाज पढ़ो तो एक दूसरे से कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़े रहो क्योंकि तुम सब आपस मे बराबर हो तुम में से कोई छोटा या बड़ा नहीं हैं। समानता की शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

9-इस्लाम कहता है कि ऐ मुसलमानों अपने पड़ोसियों से अच्छा बर्ताव करो चाहे तुम उन्हें जानते हो या न जानते हो। और खुद खाने से पहले अपने पड़ोसी को खाना खिलाओ। पड़ोसी की मदद करना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

10-इस्लाम कहता है कि शराब और जुआ सारी बुराइयों की जड़ है। इनसे अपने आप को दूर रखे। अगर समाज में मौजूद बुराइयों को समाप्त करना बुरी बात हैं तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

11- इस्लाम कहता है कि मजदूर का पसीना सूखने से पहले पहले उसकी मजदूरी दे दो। और कभी किसी गरीब और अनाथ की बद्दुआ न लेना नहीं तो बरबाद हो जाओगे। अगर ये बुरी बात है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

12-इस्लाम कहता है कि अपने आप को जलन (ईर्ष्या) से दूर रखो क्योंकि ये तुम्हारे (नेकियों) अच्छे कामों को ऐसे बरबाद कर देती हैं जैसे दीमक लकड़ी को। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

13-इस्लाम कहता है कि बुजुर्ग व्यक्ति का सम्मान करना मानों खुदा का सम्मान करने जैसा हैं। अगर तुम जन्नत (स्वर्ग) में जाना चाहते हो तो अपने मा बाप को हर हाल में खुश रखो। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

14- इस्लाम कहता है कि सबसे बड़ा जिहाद ये है कि कोई व्यक्ति अपनी इच्छाओं को मारे और अपने आप से लड़े। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

15-इस्लाम कहता है कि अगर खुश रहना चाहते हो तो किसी अमीर को मत देखो बल्कि गरीब को देखो तो खुश रहोगे। और लोगों से अच्छा बर्ताव करना सबसे बड़ा पुण्य का काम हैं। अगर ये बुरी बात है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

16- इस्लाम कहता है कि हमेशा नैतिकता और सच्चाई के रास्ते पर चलो। बोलों तो सच बोलों, वादा करो तो निभाओ और कभी किसी का दिल मत दुखाओ। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

17- इस्लाम कहता है कि सबसे बुरी दावत वह हैं जिसमें अमीरों को तो बुलाया जाता हैं परन्तु गरीबों को नहीं बुलाया जाता हैं।

18-पानी को ज़रूरत तक ही इस्तेमाल(उपयोग) करना। और बिना वजह पानी का दुरूपयोग करना गुनाह(पाप)। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

19-रास्ते में अगर कोई तक़लीफ़ देने वाली वस्तु(पत्थर,कील,) होतो उसे किनारे करना जिससे दुसरो को पीड़ा न हो। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा धर्म हैं।

20-महिलाओ को आँख उठा कर देखना गुनाह(पाप) समझना। ऐसी शिक्षा देना गलत है तो फिर इस्लाम एक बुरा घर्म है ।

Thursday, 15 September 2016

नियोग औरतो पर अत्याचार और उनकी इज्जत की लूट बलत्कार

क्या वेदकाल से ही नपुसकँ है आर्य राजा ~
आर्यो ब्रहाचार्य का भडाँफोड ~
नियोग या सिर्फ भोग ~
अगर हम धार्मिक ग्रथोँ का अध्ययन करते है तो वेदकाल से
ही आर्य राजा नपुसँक दिखते है और ब्रहाचार्य का
चोला पहने ऋषी भोगी दिखते है ।
ब्रहाचार्य तो सिर्फ एक चौला था
लेकिन ब्रहाचार्य का पालन किसी ने भी
नहीँ किया कोई किसी राजा कि पत्नि के साथ
नियोग कर रहा है । कोई किसी के साथ ।
और वहीँ आर्य राजाओ को देखा जाए तो वो बेचारे
नपुसकँ दिखते धार्मिक ग्रथोँ मे
राजा दशरत 4 पत्नि पुत्र चारो नियोग से । राजा
जनक सिता जी उनकी पुत्रि
नहीँ थी बल्कि खेत मे मिली
थी जिसका जिकर स्वामी जी ने
अपने अमर ग्रथँ सत्यार्थ मे किया है ।
महाभारत कि बात करे तो एक भी विवाह से सतानँ
उत्तपन नहीँ हुई जहाँ पाडवोँ कि बात है वो कुतिँ
कुवारी थी तभी नियोग कर लिया
था ।
ध्रतराष्ट वो भी नियोग से हुए । उनकी
शादी हुई गाधारीँ के साथ पर पुत्र
नहीँ हुए तभ एक से नियोग किया फिर आगे लिखा है
वो 2 वर्ष
तक गर्भवती रही फिर 100 पुत्रोँ का
जन्म एक ही बार की
डिलीवरी मेँ ।
आगे भिष्म
जिन्हे बडा बहुत बडा ब्रहाचारी कहा जाता है वो
भी नियोगी थे । ब्रहाचार्य का पालन
किसी ने नहीँ किया ।
ब्रहाचार्य आर्यो का चोला था जैसे हाथी के दातँ खाने के
और दिखाने
के और होते है ।
आज आपको ऐसे आर्य मिल जाएगेँ जो नियोग को आपात कालिन
स्थिती का उपाय बताते है । की नियोग तो
पती के मर जाने पर है ।
आर्यो के दावोँ का भडाफोँड उनके ही स्वामी
जी के अगर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश से
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 4 पृष्ट 102 पर यह भी
लिखा है कि जिस स्त्री का पति जीवित है
वह दूर देश में रोजगार के लिए गया हो तो उसकी
स्त्री तीन वर्ष तक बाट (प्रतिक्षा)
देखकर किसी अन्य पुरूष से नियोग
( कुकर्म ) कर के सतानँ कर ले, जब पति घर आये तो नियोग किए
पति को त्याग दे तथा उस गैर संतान का गोत्र भी विवाहित
पति वाला ही
माना जाएगा।
समिक्षा ~ यहाँ साफ बताया गया है कि अगर किसी
औरत का पत्ति जिवित है और अगर वो बाहर गया है रोजगार के
लिए तो पत्नि को चाहिए कि किसी गैर मर्द से नियोग
(कुकरम ,
बिना विवाह के शारिरिक सबधँ अर्थात जिना गुनाह ) कर ले
इतने गटीया तो अग्रेजोँ के भी नियम
नहीँ जितने आर्यो के है ।
(4). जिस पुरूष की पत्नी अप्रिय बोलने
वाली हो तो उस पुरूष को चाहिए कि किसी
अन्य स्त्री से नियोग कर ले तथा रहे
अपनी पत्नी के
साथ ही।
समिक्षा ~ अगर किसी कि पत्नी अप्रिय
बोले तो उसे छोडकर किसी दुसरी से नियोग
( कुकरम ) कर ले और रहे उसके साथ ।
कुछ जाहिल नयुज चैनल वाले तलाक " का मजाक उडाते है और
इस्लाम को बदनाम करते है । देख लो जाहिलोँ
अगर इस्लाम का कानुन तलाक " ना होता तो ये होता औरतो के साथ
"बताइए भला क्या कोई अप्रिय बोलने कि वजह से हि
किसी दुसरी
औरत के साथ सबधँ क्यु बनाये जब वो उसके साथ रह सकता है
तो फिर उसे उसका हक कयो नहीँ दे सकता क्यो
किसी दुसरी औरत से सबधँ बनाये ।
इसी प्रकार जो पुरूष अत्यन्त दुःखदायक हो तो
उसकी स्त्री भी दूसरे पुरूष से
नियोग से कर
के उसी विवाहित पति के दायभागी संतान कर
लेवे।
समिक्षा ~ हद है जाहिलियत की अगर
किसी का पत्ति दुखदायक है तो उसकी
पत्रनी उसे छोडकर किसी दुसरे पुरुष से
नियोग ( कुकरम) क्यो करे ।
इतना ही नहीँ सत्यार्थ प्रकाश मे
स्वामी जी ने ये तक फरमाया है
की अगर कीसी कि
पत्नी गर्भवती हो और पति से ना रहा
जाए तो किसी दुसरी औरत से नियोग कर ले
"
स्वामी जी ने आर्यो औरतो को 11 मर्दो
और मर्दो को 11 औरतोँ तक नियोग (कुकरम) करने
कि छुट दी है ।
समिक्षा ~ इन बातो के बाद नियोग के
आपातकालिन होने का तो सवाल ही नहीँ
उठता और दुसरी तरफ ब्रहाचार्य के दावे का
भी भडाँफोड हो जाता है । कयोकिँ अगर
पतनी के गभवर्ती होने तक
ही अगर ब्रहाचार्य का पालन नहीँ किया
जाए तो कैसा ब्रहाचार्य ।
ये ब्रहाचार्य सिर्फ दिखावा है जैसे हाथी के दातँ खाने
के और दिखाने के और होते है ।
अब आर्यो के ही धार्मिक ग्रथोँ से नियोग (कुकरम ,
बिना विवाह शारिरिक सबधँ ,
गुनाह ) के प्रमाण देखीये ~
रामायण/ महाभारत/स्मृति में नियोग के प्रमाण
व्यासजी का काशिराज की पुत्री
अम्बालिका से नियोग- महाभारत आदि पर्व अ 106/6
वन में बारिचर ने युधिस्टर से कहा- में
तेरा धर्म नामक पिता- उत्पन्न करने वाला जनक हूँ- महाभारत वन
पर्व 314/6
उस राजा बलि ने पुन: ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी
भार्या सुदेष्णा को उसके पास फिर भेजा- महाभारत आदि पर्व अ
104 कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो
विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न
करे- महाभारत आदि पर्व 104/2
उत्तम देवर से आपातकाल में पुरुष पुत्र की इच्छा
करते हैं-
महाभारत आदि पर्व 120/26
परशुराम द्वारा लोक के क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों
ने क्षत्रानियों में संतान उत्पन्न की- महाभारत आदि
पर्व 103/10
पांडु कुंती से- हे कल्याणी अब तू
किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का
प्रयत्न कर- महाभारत
आदि पर्व 120/28
सूर्ष ने कुंती से कहा- तू
मुझसे भय छोड़कर प्रसंग कर- महाभारत आदि
पर्व 111/13
किसी कुलीन ब्राह्मण को
बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई
दोष नहीं हैं-
सूर्य ने कुंती से कहा-भय मत करो संग करो-
महाभारत अ। पर्व 111/13
वह तू केसरी का पुत्र क्षेत्रज नियोग से उत्पन्न बड़ा
पराकर्मी – वाल्मीकि रामायण किष कांड
66/28
मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को उत्पन्न किया –
वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15
जिसका पति मर गया हैं-वह 6 महीने बाद पिता व भाई
नियोग करा दे- वशिष्ट स्मृति 17/486
किन्ही का मत हैं की देवर को छोड़कर
अन्य से नियोग न करे- गौतम स्मृति 18
जिसका पति विदेश गया हो तो वह नियोग कर ले- नारद स्मृति श्लोक
98/99/100
देवर विधवा से नियोग करे- मनु स्मृति 9/62
आपातकाल में नियोग भी गौण हैं- मनु 9/58
नियोग संतान के लोभ के लिए ही किया जाना चाहिए-
ब्राह्मण सर्वस्व पृष्ट 233 यदि राजा वृद्ध
हो गया या बीमार रहता हो तो अपने मातृकुल तथा
किसी अन्य गुणवान सामंत से अपनी भार्या
में नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करा ले- कौटिलीय शास्त्र
1/17/52
जब कई भाई संग रहते हो और उनमें से एक निपुत्र मर जाये तो
उसकी स्त्री का ब्याह पर
गोत्री से न किया जाये-उसके पति का भाई उसके पास
जाकर उसे अपनी स्त्री कर ले –
व्यवस्था विवरण 25/5-10
यदि देवर नियोग से इंकार करे तो भावज उसके मुह पर थूके और
जूते उसके पाव से उतारे- व्यवस्था 25/2
आर्य राजा नपुसकँ थे और ब्रहाचार्य कहलाने वाले भोगी थे ।

Tuesday, 29 December 2015

कुरान को आसमानी किताब क्यों कहा जाता है?

यह बात सही है कि कुरआन में कुछ अच्छी बातें लिखी हैं लेकिन यह तो हर धर्म की किताबों में लिखी होती हैं और कोई भी समझदार इंसान लिख सकता है, फिर हम कुरआन को अल्लाह की किताब क्यों माने, क्या सबूत है कि कुरान अल्लाह की तरफ से ही है ?

जवाब - मैं इस सवाल का जवाब कई पहलुओं से दूँगा, क्यों कि कुरान ने अलग पहलुओं से अल्लाह के कलाम (वाणी) होने के सबूत दिए हैं, अगर आप घहराई से बिना पक्षपात के विचार करेंगें तो मैं आप को यकीन दिलाता हूँ कि कोई भी ज़रा भी शक बाकि नहीं रहेगा.

(1) पहली बात, अगर आप अरब का मुहम्मद (ﷺ) के टाइम का इतिहास पढेंगे जो इतिहास की बड़ी किताबों में आप को आसानी से मिल जाएगा, तोआप पाएँगे कि मुहम्मद (ﷺ) बिलकुल बिलकुल पढना लिखना नहीं जानते थे और तो और वो अपना नाम भी लिखना नहीं जानते थे और ना ही उन्हें शाइरी वगैरह का कोई शौक था,लेकिन अरब के लोग शाइरी के बादशाह थे वो अपना पूरा इतिहास और अपनी कई पीढयों के नाम भी शाइरी में ही बयान कर दिया करते थे,आप जानते हैं कि किसी भी भाषा या शब्दों का सबसे अच्छा इस्तिमाल एक शायर (कवि) ही करता सकता है उस ज़माने में अरब में एकसे बढ़कर एक शायर मौजूद थे, हर साल वहां शाइरी की बहुत बड़ी प्रतियोगिता होती थी जिस में दूर दूर के लोग भाग लेते थे, जीतने वाले शायर का शेर काबा की दीवार पर लगाया जाता था और उस शायर को सब सजदा किया करते थे

अब ऐसे माहौल में मुहम्मद (ﷺ) अचानक एक कलाम पेश करते हैं और दावा करते हैं कि यह कलाम अल्लाह की तरफ से है और अगर तुम्हे इसमें शक है तो तुम भी ऐसा कलाम बना कर दिखाओ (सूरेह बक्राह-23,24).

आप तसव्वुर कीजये एक तरफ कोई एक अनपढ़ आदमी है जिसे सब जानते हैं कि यह हम में 40 साल रहा है इसने कहीं से तालीम हासिलनहीं की और दूसरी तरफ इक़बाल, ग़ालिब, मीर और हाली जैसे महान शायर मौजूद हैं जो अपनी शानदार शाइरी के लिए मशहूर हैं, वो अनपढ़ आदमी इन शायरों को चैलेंज कर कह रहा है कि तुम सब मिलकर भी मेरे मुकाबले का कलाम पेश नहीं कर सकते, ये बड़े बड़े शायरउस आदमी से दुश्मनी रखते हैं उसके खिलाफ़ जंग लड़ते हैं उसकी दुश्मनी में अपनी जाने और माल खर्च करते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि वे सब मिलकर भी एक पेज भी ऐसा नहीं लिख सके जिसको वे कुरआन के मुकाबले में दुनियां के सामने पेश करके कह सकें कि देखो हमने मुहम्मद (ﷺ) को झूटा साबित कर दिया है.

इससे साफ़ ज़ाहिर है कि यह अज़ीम कलाम किसी अज़ीम हस्ती ही का हो सकता है कोई इंसान तो अपने लिखे हुए कलाम के बारे में ऐसा दावा नहीं कर सकता.

(2) जो लोग अरबी भाषा का थोड़ा भी ज्ञान रखते हैं वो यह हकीक़त अच्छी तरह जानते हैं कि कुरआन ने अरबी भाषा को नई ऊँचाइयाँ दी हैं यानि कुरआन में बहुत हाई स्टेंडर्ड की अरबी शैली का इस्तिमाल किया गया है इतने स्टेंडर्ड की अरबी की कोईकिताब इसके बाद कभी नहीं लिखी जा सकी, आज भी जो कोई कुरआन की शैली के 10% करीब की अरबी बोले या लिखे उसे दुनियां में हाई स्टेंडर्ड अरबी बोलने वाला माना जाता है, इतने हाई स्टेंडर्ड की अरबी कोई आम इंसान लिखे यह नामुमकिन है.इससे भी यह बात साफ़ ज़ाहिर होती है कि कुरआन कोई आम किताब नहीं है.

(3) कुरआन में अल्लाह तआला ने दावा किया है कि इस में कोई ज़रा भी बदलाव नहीं कर सकता क्यों कि हम इसकी हिफाज़त करते हैं(सूरेह हिज्र-9)

इस बात का भी इतिहास गवाह है कि कुरआन में आज तक कोई एक नुक्ते का भी बदलाव नहीं हुआ, वरना यूं तो बाइबल भी अल्लाह की किताब है लेकिन सब जानते हैं कि उसके कितने ही नए एडिशन कुछ ना कुछ बदलाव के साथ आते रहते हैं, लेकिनकुरआन 1450 सालों से ऐसा ही है.इससे भी पता चलता है कि कुरआन कोई आम किताब नहीं है.

(4) आप जानते हैं कि कुरान करीब 600 पेज की एक बड़ी और मोटी किताब है इसके बावजूद यह लाखो नहीं बल्कि करोड़ों लोगोंको ज़ुबानी याद है, और इसका कुछ ना कुछ हिस्सा तो हर मुस्लमान को याद होता है, यह रुतबा दुनियां की और किसी भी किताब को हासिल नहीं है, आप सोच कर देखें किसी छोटी सी किताब को भी वर्ड-टू-वर्ड ज़ुबानी याद करना कितना मुश्किल काम है और अगर वो कोई 600 पेज की मोटी किताब हो तब तो यह काम बेहद मुश्किल हो जाता है और इतना ही नहीं फिर अगर वो किताब किसी ऐसी भाषामें हो जो आप को समझ ही नहीं आती तो ??? 

लेकिन कुरान को अल्लाह ने कुछ ऐसा बनाया है जो वो चमत्कारी ढंग से बड़ों का तो क्या कहना 12,13, साल का बच्चा पूरा कुरआन ज़ुबानी याद किया हुआ आप को मुसलमानों की हर गली या मोहल्ले में आसानी से मिल जाएगा यह तो आम है लेकिन ऐसे बच्चों की भी बहुत बड़ी तादाद है जिनको पूरा कुरआन याद है और उनकी उमर सिर्फ 6,7, और 8 साल है, अगर आप गौर करें तो यह कोई मामूली बात नहीं कि 600 पेज की एक मोटी किताब जो ऐसी भाषा में लिखी है जो गैर अरब को समझ नहीं आती और उसको छोटे छोटेबच्चे पूरा ज़ुबानी याद कर लेते हैं.इससे भी पता चलता है कि कुरआन कोई आम किताब नहीं है.

(5) कुरआन का एक कमाल यह भी है कि हर किताब तो एक खास तबके के लिए लिखि जाती है यानि लिखने वाला पहले यह फैसला कर लेताहै की मैं किस तरह के लोगों के लिए यह किताब लिख रहा हूँ कोई आम आदमी की समझ के अनुसार होती है और कोई बड़े एजुकेटिड लोगों को ध्यान में रख कर लिखी जाती है तो कोई ख़ास ज़माने और देश को ध्यान में रख कर लिखी जाती है, लेकिन कुरआन जितना अनपढ़ के लिखे हिदायत है उतना ही बहुत पढे लिखे के लिए भी हिदायत है, 

जैसे इसे पढ़कर आम लोग के ईमान लाने की बेशुमार मिसालें हैं ऐसे ही बहुत पढ़े लिखे एजुकेटिड लोगों के इस को पढ़ कर ईमान लाने की भी मिसालों की कमी नहीं यानि चाहे कोई मर्द हो या औरत, भारत से हो अफ्रीका से, अमीर घर से हो या गरीब घर से, बूढ़ा हो या नौजवान, बहुत पढ़ा लिखा हो या कम पढ़ा लिखा हो यह किताब सब को समझ में भी आती है और सब की रहनुमाई (मार्गदर्शन) भी करती है, इसी लिए कुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया है कि- हमने कुरआन को नसीहत के लिए आसान बना दिया है, तो क्या कोई है नसीहत चाहने करने वाला ?(सूरेह क़मर-32)

और बहुत ज्यादा गहराई में जा कर बात समझने वालों के लिए तो यह समुन्द्र के जैसा है,आज तक अलग अलग आलिमों की तरफ से कुरआन की हजारों बड़ी बड़ी तफसीरें (Commentary) लिखी जा चुकी हैं लेकिन हमेशा लिखने वाले कहते हैं कि हमने तो कुछ भी नहीं लिखा अभी तो बहुत ज्यादा लिखना बाकि है.यानि एक तरफ तो कुरआन इतना सादा है कि एक आम रेढ़ी चलाने वाला भी इससे फाएदा हासिल करता है और दूसरी तरफ गहराई इतनी कि कोई बड़े से बड़ा आलिम भी यह दावा नहीं करता कि मैंने पूरा कुरआन समझ लिया है अब और ज्यादा कुरान में कुछ नहीं है बल्कि वोयह ही कहता है कि जितना समझा है उससे कहीं ज्यादा समझना बाकि है.इससे भी ज़ाहिर होता है कि यह कोई आम किताब नहीं है.

(6) एक अहम पहलू यह भी है कि जब हम किसी बड़े कवि या लेखक को पढ़ते हैं तो हमेशा हम देखते हैं कि वक़्त से साथ साथ उस लेखक के ज्ञान, भाषा शैली और विचारों में विकास हुआ है यह ना मुमकिन है कि एक लेखक लम्बे समय तक कुछ लिखता हो और उसके लेखन में विकास न हुआ हो, इसी विचारों के विकास की वजह से एक ही लेखक की शुरू ज़िन्दगी की लिखी हुई बातों और आखिर ज़िन्दगीकी लिखी हुई बातों में विरोधाभास मिलना एक आम बात है, आप चाहे इकबाल को पढ़लें या ग़ालिब को या विलियम शेक्सपियर को या किसी भी लेखक को जिसने सालों लिखा हो आप को उसके लेखन में विकास और विरोधाभास साफ नज़र आएगा, 

क्यों कि हर इंसान के विचारों में विकास होता रहता है.लेकिन कुरआन 23 साल के लम्बे अरसे में लिखे जाने के बावजूद उसमे आप को कोई विकास नज़र नहीं आ सकता, और ना ही उसमे विरोधाभास पाया जाता है जिस मापदंड के विचार, भाषा शैली, ज्ञान और दावे उसमे शुरू में हैं आखिर तक वैसे ही हैं, यह किसी इंसान के वश की बात नहीं यह अल्लाह ही है जिसके ज्ञान में विकास नहीं होता क्यों कि वो पहले से ही सब जनता है, इसी लिए कुरआन में लिखा है कि- अगर यह कुरआन अल्लाह के बजाए किसी और की ओर से होता तो वे इसके भीतर बहुत विरोधाभास पाते (सूरेह निसा-82) इससे साफ़ ज़ाहिर है कि कुरआन किसी इंसान का लिखा हुआ नहीं है.

(7) अब कुछ कुरआन की की हुई भविष्यवाणयों पर नज़र डालये जो अब इतिहास बन चुकी हैं- कुरआन के नाज़िल होते वक़्त दुनियाँ में दो बहुत बड़ी सलतनतें थी एक रूमी सलतनत जो ईसाइयों की थी उसका बादशाह हरकुल (हरक्युलिस) था दूसरी ईरानी सलतनत जो मजूसयों (आग को पूजने वालों) की थी और उसका बादशाह खुसरो था, ईरानियों ने रूमयों को बुरी तरह हरा दिया था और रूमयों के फिर से उठने के कोई आसार नहीं थे, मक्के के मुशरिक इस पर खुशियाँ मना रहे थे और मुसलमानों से कहते थे कि देखो ईरान के आगके पुजारी विजय पा रहे हैं और रोमन पैगम्बरों के मानने वाले ईसाई हार पर हार खाते चले जा रहे हैं, इसी तरह हम भी अरब के बुत परस्त तुम्हें और तुम्हारे धर्म को मिटा कर रख देंगे.

कुरआन ने ऐसे हालात में भविष्यवाणी की कि रूमी 10 साल के अन्दर फिरसे विजय पाएगें (सूरेह रूम), इसे सुनकर मक्का के मुशरिक मुसलमानों की मज़ाक उड़ाने लगे कि देखो मुस्लमान पागल हो गए हैं जो ऐसी बात कह रहे हैं जो मुमकिन ही नहीं है,लेकिन दुनियां ने देख लिया कि कुरआन की यह नामुमकिन भविष्यवाणी 9 साल के भीतर पूरी हुई, इतिहासकार भी हरक्युलिस की जीत को किसी चमत्कार से कम नहीं मानते.इससे भी पता चलता है कि कुरआन अल्लाह का कलाम है.

(8) इतिहास से ही आप को पता चल सकता है कि एक वक़्त ऐसा भी था जब मुसलमानों की तादाद उँगलियों पर गिनने लायक थी और जो थे उनकी भी हालत गरीबी में ऐसी थी कि उनके पास अपनी हिफाज़त करने के लिए तलवारें भी ना के बराबर थी, जबकि उनके दुश्मन अनगिनत थे और बड़े बड़े सरदार थे जो मुसलमानों और इस्लाम को ज़मीन से मिटाने के लिए बेताब थे और देखने वाले समझ रहे थे कि अब मुसलमानों का बचना नामुमकिन है, ऐसे हालत में कुरआन ने दो भविष्यवाणी की एक मक्का शहर मुसलमान फ़तेह करेंगे और दूसरी लोग फ़ौज की फ़ौज इस्लाम क़ुबूल करेंगे (सूरेह नस्र).

जिस वक़्त यह दोनों भविष्यवाणी हुई उस वक़्त इनसे नामुमकिन बात और कोई नहीं थी लेकिन कुछ ही अरसे बाद दुनियां ने ये दोनों भविष्यवाणी भी पूरी होती हुई देखली थी.इससे भी अंदाज़ा होता है कि कुरआन अल्लाह का कलाम है.

(9) मक्का में मुहम्मद (ﷺ) का एक पड़ोसी था वो कुरैश का सरदार था उसका नाम अबू लहब था वो और उस की बीवी अल्लाह के रसूल के बहुतबड़े दुश्मन थे वो हर तरह से उन्हें सताता था, उसकी मौत से करीब 10 साल पहले कुरआन ने भविष्यवाणी की थी कि वो कभी ईमाननहीं लाएगा और उसकी मौत अज़ाब से होगी (सूरेह लहब), वो इस्लाम दुश्मनी में कुछ भी कर सकता था अगर वो ईमान क़ुबूल करलेता जैसे उसकी बेटी और दोनों बेटों ने किया तो कुरआन की भविष्यवाणी गलत साबित हो जाती लेकिन वो ऐसा ना कर सका और उसकी मौत भीबहुत बुरी बीमारी से हुई जिससे उस का शरीर सड़ गया था उसके परिवार के लोगों ने भी उसके शरीर को हाथ नहीं लगाया.इससे भी पता चलता है कि कुरआन अल्लाह का कलाम है.

(10) कुरआन के नाजिल होने से बहुत पहले अल्लाह के एक पैगम्बर मूसा (अलैहिस्सलाम) के ज़माने में मिस्र में फिरौन नामीएक राजा को जो ज़बरदस्ती खुद को खुदा कहलवाता था अल्लाह ने अज़ाब के तौर पर दरया में डुबा कर मार दिया था उसका ज़िक्र ओल्ड टेस्टीमेंट में भी है,कुरआन में उसके बारे में भविष्यवाणी हुई थी कि उसकी लाश को अल्लाह एक दिन ज़ाहिर करेगा ताकि बाद में आने वालों लोगों के लिए वो इबरत की निशानी बने (सूरेह यूनुस-92).

ध्यान रहे उसके अज़ाब से मरने के बारे में तो ओल्ड टेस्टीमेंट में ज़िक्र है लेकिन उसकी लाश पानी में गर्क नहीं होगी ऐसा कुरआन के अलावा किसी भी किताब में नहीं लिखा था,सन 1898 में चमत्कारी तौर पर उसके मरने के हजारों साल बाद उसकी लाश 'नील' नामी दरया के पास से मिली, जो ममी ना होनेके बावजूद भी हजारों साल तक गर्क नहीं हुई थी उसे आज भी मिस्र के म्युज्यम में देखा जा सकता है, उसकी लाश की पहचान और मिलने का विवरण 'डॉ. एलीड स्मिथ' की किताब ''royal mummies'' में देखा जा सकता है.

अगर किसी इंसान ने हकीकत से आंखें बंद करने की कसम ही ना खा रखी हो तो यह एक बहुत बड़ा सबूत है कि कुरआन अल्लाह की किताब है.इनके अलावा भी कुरआन और सही हदीसों में बहुत सी भविष्यवाणयां हैं जो पूरी हुई हैं लेकिन वो इल्मी तरह की हैं इसलिए मैं उन्हें स्किप कर रहा हूँ, लेकिन एक बात साबित शुदा है कि अल्लाह और उसके रसूल की की हुई एक भी भविष्यवानि आज तक गलत साबित नहीं हुई है.

(11) अगर आप किसी लेखक से कहें की एक छोटी सी कहानी लिखो और उसमे फला फला शब्द इतनी इतनी बार आना चाहिए और फला फला शब्द नहीं आना चाहिए और फला फला शब्द जितनी बार पहले वाक्य में इस्तिमाल होगा दुसरे में भी इतनी ही बार होना चाहिए जैसी 5,6 कंडीशन आप लगादें तो आप अंदाज़ा कर सकते हैं कि लेखक पहले तो इन शर्तों के साथ कुछ लिख ही नहीं पाएगा और अगर लिख भी दिया तो वो जितना टूटा फूटा होगा आप खुद समझ सकते हैं.

लेकिन कुरआन में अपनी बहतरीन शैली के साथ साथ गणित के पहलु से भी अनगिनत चमत्कार मौजूद हैं, मैं समझाने के लिए सिर्फ एक मिसाल देता हूँ, कुरआन मैं कहा गया है कि अल्लाह की नज़र में हज़रत ईसा (अ) की मिसाल हज़रत आदम (अ) के जैसी है (सूरेह आलेइमरान-59) यानि कि ईसा (अ) को बिना बाप के पैदा किया और आदम (अ) को बिना माँ बाप के पैदा किया,मायने के लिहाज़ से यह बात बिलकुल साफ़ है लेकिन अगर आप पूरे कुरआन में शब्द ''ईसा'' तलाश करें तो वो 25 बार पूरे कुरआन में आया है, और शब्द ''आदम'' भी पूरे कुरआन में 25 बार ही आया है, तो गिनती के लिहाज़ से भी यह दोनों एक जैसे ही हैं,अगर कुरआन में यह चीज़ें दो चार बार होती तो माना जाता कि यह इत्तिफाक से है, लेकिन यह गणित के चमत्कार तो कुरआन में अनगिनत हैं कुरआन में यह खोज अभी नई है और जारी है इसलिए इस टॉपिक पर अभी कुछ खास किताबें नहीं लिखी जा सकी, कुरआन में गणित के ऐसे चमत्कारों जो समझने के लिए आप हमारे ब्लॉग में कई पोस्ट हे और इस लिंक की विडियो देखें -http://www.youtube.com/watch?v=Y96KuhAQBMI

इस नई खोज से भी पता चलता है कि कुरआन इंसानी दिमाग की उपज नहीं है.

(12) कुरआन साइन्स की किताब नहीं है, उसका मकसद लोगों को साइन्स के बारे में बताना नहीं है लेकिन फिर भी ऐसी बहुत सीबातें कुरआन में हैं जिनकी पुष्टि आज साइन्स से होती है,मिसाल के तौर पर कुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया - हमने हर जीवित चीज़ को पानी से पैदा किया है (सूरेह अंबिया-30)

आज से पहले तो शायद लोग इस बात को ऐसे नहीं समझते होंगे जैसे अब हम साइन्स की मदद से इस आयत को समझ सकते हैं,एक जगह अल्लाह ने कुरआन में अजीब सी कसम खाई - कसम है सितारों के मरने या टूटने के मौक़े की, और अगर तुम जान लो तो यह बहुत बड़ी कसम है (सूरेह वकिअह-75) आज से पहले लोग इस आयत को भी ऐसे नहीं समझ सकते थे जिस तरह आज हम जानते हैं कि सितारा मरने के बाद एक बेहद ताकतवर ब्लैक होल में बदल जाता है, तो वाकई यह बहुत बड़ी कसम है,इसी तरह और बहुत सी आयतें हैं जिनमे अंतरिक्ष, जल चक्र, पहाड़ों के बारे में और माँ के पेट में बच्चे के बन्ने के स्टैप वगैरा के बारे में बताया गया है, जो अब साइंस की मदद से हमें सही सही समझमे आती हैं, इस टॉपिक को ज्यादा जानने के लिए यह(Bible, Quran and Science, Author Dr. Maurice Bucaille) नामी किताब पढ़ें,किसी को धोड़ी देर के लिए कोई गलत फहमी हो जाए तो और बात है 

वरना आज तक साइन्स ने जितनी भी तक्की की है वो कभी कुरआन के खिलाफ़ साबित नहीं हो सकी और उल्टा साइन्स ने कुरआन को सच ही साबित किया है और बहुतसी आयातों को समझने में मददगार साबित हुआ है.इससे भी साबित होता है कि कुरआन अल्लाह का कलाम है.

(13) कुरआन को आप यह ना समझें कि इसमें कोई अलग ही बातें बताई गई हैं, कुरआन अपने से पहली आसमानी किताबों का विरोधी नहीं बल्कि वो तो उनकी बार बार पुष्टि करता है, बस वो यह कहता है की धर्म के ठेकेदारों ने उन किताबों में अपनी अकल से छेड़ छाड़ करके उनमे काफी कुछ गलत चीज़े मिलादी है और लोगों से कहते हैं कि यह ईश्वर की तरफ से है, वो भी अल्लाह ही था जिसने पहले वे किताबें नाजिल की थी और यह भी अल्लाह ही है जिसने कुरआन नाजिल किया है.

इसके अलावा भी बहुत से पहलु हैं जिनसे कुरआन अल्लाह का कलाम साबित होता है लेकिन सबको एक पोस्ट में लिख देना मेरे लिए मुमकिन नहीं है, लेकिन एक ऐसे इंसान के लिए जो बिना पक्षपात के बातों को देखता और समझता है उसके लिए ये सबूत काफी हैं किकुरआन अल्लाह का कलाम है, और जिसने पक्षपात का चश्मा लगाया हुआ है उसके लिए हज़ार सुबूत भी कम हैं, वरना कुरआन में 6500 से ज्यादा आयतें हैं और ''आयत'' का मतलब ही ''निशानी'' होता है.

हमारी दावत (पुकार) इसके सिवा कुछ भी नहीं कि हम मुहब्बत और हमदर्दी के साथ ज़मीन पर रहने वाले इंसानों को उनके असल रब का यह पैगाम पहुंचा दें जो हमारे पास उनकी अमानत है, हम आप से इसके बदले में कुछ नहीं चाहते हमारा बदला तो रब के जुम्मे है,और कुरआन की दावत इसके सिवा कुछ नहीं कि वो इंसानों को उस दिन से खबरदार कर दे जो अब करीब आ लगा है, जिस दिन यह दुनियां ख़त्म हो जाएगी और इंसान और उनके रब के बीच का पर्दा उठ जाएगा और इंसान बंद आखों से भी वो सब कुछ देख लेगा जिसे आज वो खुली आखों से भी देखना नहीं चाहता, जिस दिन हर ज़ालिम को उसके हर ज़ुल्म की सज़ा मिल कर रहेगी और हर नेक को उसकी हर नेकी काबदला मिलेगा जिस दिन फैसले हमारी कमज़ोर अदालते नहीं बल्कि इंसानों का रब खुद करेगा.

कुरआन लोगों को बताना चाहता है कि तुम अच्छी बुरी ज़िन्दगी जी कर मिट्टी हो जाने के लिए पैदा नहीं किये गए हो बल्कि तुम्हारे अज़ीम रब ने एक अज़ीम स्कीम एक अज़ीम प्लान के तहत तुमको पैदा किया, अब जो चाहे अपने होने का मकसद इससे जान ले और जो ना चाहे ना जाने.अब जिसके जी में आए वो ही पाए रौशनी,हम ने तो दिल जलाके सरे आम रख दिया..

Monday, 21 December 2015

चाँद का टूटना एक वैज्ञानिक तथ्य..@

☆ चाँद के टूटने के विश्वास से सिद्ध होते है
वैज्ञानिक तथ्य …
बहुत समय से गैर मुस्लिम भाईयों को मुस्लिमों के
इस विश्वास का मजाक उडाते देख रहा हूँ कि
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने चांद के दो
टुकड़े कर दिए थे ..
ये लोग कहते हैं कि मुसलमान बार बार इस्लाम
धर्म को विज्ञान पर खरा उतरने वाला धर्म
बताते हैं, पर इस्लाम मे वर्णित चांद के तोड़ने और
नबी के द्वारा बिना किसी विमान के आकाश
की सैर जैसी इन अवैज्ञानिक बातों के जरिए
इस्लाम भी झूठ और अंधविश्वास ही फैलाता है …
पहली बात तो हम इन भाईयों से यही कहेंगे कि
इस्लाम को फैलाने के लिए अल्लाह और रसूल
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने चमत्कार दिखाने
का सहारा नही लिया बल्कि इस्लाम फैला
अपने उच्च नैतिक नियमों के कारण …. लेकिन आप
कुरान और हदीस पढ़ेन्गे तो पाएंगे कि नबी
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का चमत्कार न
दिखाना भी कुफ्फार की नजरों मे नबी
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के झूठे होने का
प्रमाण था और ये कुफ्फार लोगों को ये कह कहकर
भड़काया करते थे कि ये कैसा नबी है जो
साधारण आदमियों की तरह बाजारों मे घूमता
फिरता है, यदि ये वास्तव मे नबी होता तो
अल्लाह ने इसके साथ एक फरिश्ता रखा होता
और ये चमत्कार दिखाता होता इस कारण, कुछ
एक चमत्कार जो अल्लाह के हुक्म से नबी
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दिखाए, वे एक तो
इसलिए ताकि कुफ्फार के आरोपों को झुठलाया
जा सके,
और दूसरा कारण ये कि वे गैर मुस्लिम जो चमत्कार
को ही ईश्वर की निशानी मानते थे और सम्मोहन
करने वाले जादूगरो के जादू के कारण ही उन्हें
ईश्वर का साथी मानने लगे थे, वे लोग भी अल्लाह
के द्वारा किए गए सच्चे चमत्कार को देखकर ये
जान लें कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
को ईश्वर का सच्चा साथ प्राप्त है …
चांद के दो टुकड़े करने के लिए भी कुफ्फारे मक्का
ने प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को
बहुत उकसाया और ये वादे किए कि अगर मोहम्मद
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सच्चे हैं और सचमुच
अल्लाह के रसूल हैं, तो वे चांद को तोड़कर दिखा
दें, फिर हम इनका नबी होना तस्लीम कर लेंगे और
मुसलमान हो जाएंगे …
अल्लाह और उसके नबी जानते थे कि कुफ्फार के ये
दावे और वादे सिर्फ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व
सल्लम) को झूठा साबित करने की नीयत से किए
गए हैं, इस्लाम कुबूल करने की नीयत से नहीं …
लेकिन यहाँ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
की सच्चाई को दांव पर लगाया गया था सो
अल्लाह की मर्ज़ी से नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व
सल्लम) ने उंगलियों के इशारे से चांद के दो टुकड़े कर
के अपनी सच्चाई का सबूत भी कुफ्फार को
दिया, और कुफ्फार का ये झूठ भी दुनिया के
सामने ले आए कि चांद के टूटते ही वो मोहम्मद
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का नबी होना
तस्लीम कर के ईमान ले आएंगे ….
कुफ्फारे मक्का चांद के तोड़े जाने को जादू कहकर
इस सच से इनकार करने लगे, और न नबी (सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम) को उन्होंने नबी तस्लीम किया,
न मुसलमानों को यातनाएँ देनी बंद कीं…
बहरहाल … चांद के दो टुकड़े होने का ये वाकया
सच्चा था ये हम आज भी पूरे दावे से कहते हैं … नबी
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) द्वारा चन्द्रमा के
तोड़े जाने की इस घटना ने कई वैज्ञानिक तथ्यों
को भी स्पष्ट कर दिया जिनकी पुष्टि आज भी
अंतरिक्ष विज्ञानी करते हैं…
» 1 – चांद को देखकर दुनिया मे पहले की
आबादियां उसे एक ठण्डी रौशनी का पुन्ज
समझती थीं जैसे सूरज एक गर्म प्रकाश पुंज है, और
रौशनी को न छुआ जा सकता है न ही तोड़ा जा
सकता है , इस्लाम से पहले चांद को कोई भी
व्यक्ति ऐसी ठोस वस्तु नहीं मानता था जिसे
स्पर्श किया जा सकता हो …. ये खयाल बीसवीं
शताब्दी तक लोगों मे बना रहा जब तक नील
आर्मस्ट्रांग ने चांद पर उतर कर ये साबित न किया
कि चांद मिट्टी और चट्टानों से बना एक
विशाल उपग्रह है … लेकिन चांद के तोड़े जाने के
वाकये से इस्लाम ने 1400 साल पहले ही ये सिद्ध
कर दिया कि चांद एक ठोस आकाशीय संरचना है

» 2 – पूरी दुनिया के लोगों मे चांद को देवता
या दैवीय शक्ति आदि मानने का भी चलन था
इस्लाम से पूर्व … लेकिन चांद को तोड़कर नबी
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ये सिद्ध किया
कि चांद एक ठोस निर्जीव आकाशीय पिण्ड से
अधिक कुछ नहीं और उसमें कोई दैवीय शक्ति नहीं,
और न ही वो कोई देवता है…. दुनिया भर के अनेक
गैर मुस्लिम अब तक चांद मे दैवीय शक्तियों का
वास समझते थे, लेकिन अपने इतिहास से लेकर आज
तक मुस्लिमों ने ऐसा अंधविश्वास चांद के विषय
मे कभी नहीं रखा ॥
» 3 – चांद के तोड़ने के मुस्लिमो के इस दावे ने इस
सम्भावना को भी दुनिया के सामने रखा कि
यदि 1400 वर्ष पहले चांद को तोड़कर जोड़ा गया
था, तो इस बात के चिन्ह आज भी चांद की सतह
पर मिलने चाहिए,
आज हमारे पास NASA द्वारा लिये गये चांद की
सतह के कुछ चित्र हैं, जिनमें चांद की सतह पर एक
विशाल दरार दिखाई पड़ रही है …. जैसे किसी
टूटी हुई चीज़ दोबारा जोड़कर रखने पर बन जाती
है ….. हम जानते है कि विरोधी इस दरार के
चन्द्रमा की सतह पर होने के भी अलग अलग
कयास निकालेंगे पर चांद के टूटने की बात नहीं
मानेंगे… पर इस्लाम मे चांद के टूटने के विश्वास का
मजाक ये लोग तब उड़ा सकते थे जब चांद पर ऐसी
कोई दरार न मिली होती ….. इस दरार के पाये
जाने के बावजूद यदि लोग चांद के टूटने की
सम्भावना पर विचार न करें तो इसे उन लोगों के
पूर्वाग्रह का ही परिणाम कहा जाएगा…
बहरहाल जो लोग चांद के टूटने को इस्लाम का
अंधविश्वास साबित करना चाहते हैं, वे अपनी इस
बात कि चांद कभी नहीं टूटा था को सिद्ध करने
का कोई प्रमाण नहीं दे सकते …. लेकिन चांद टूटा
था इस बात का एक बड़ा प्रमाण मुस्लिमों के
पास अवश्य है !!

Tuesday, 15 December 2015

मुसलमान मांस क्यों खाते हे .?

सवाल :- जानवरों की हत्या एक क्रूर निर्दयतापूर्ण
कार्य है तो फिर मुसलमान मांस क्यों खाते हैं ?

जवाब:- शाकाहार ने अब संसार भर में एक आन्दोलन
का रूप ले लिया है। बहुत से लोग तो इसको जानवरों
के अधिकार से जोड़ते हैं। निस्संदेह लोगों की एक
बड़ी संख्या मांसाहारी है और अन्य लोग मांस खाने
को जानवरों के अधिकारों का हनन मानते हैं।
इस्लाम प्रत्येक जीव एवं प्राणी के प्रति स्नेह और
दया का निर्देश देता है। 
साथ ही इस्लाम इस बात पर भी ज़ोर देता है कि अल्लाह ने पृथ्वी, पेड़-पौधे और छोटे-बड़े हर प्रकार के जीव-जन्तुओं को इंसान के लाभ के लिए पैदा किया है। अब यह इंसान पर निर्भर करता है कि वह ईश्वर की दी हुई नेमत और अमानत के रूप में मौजूद प्रत्येक स्रोत को किस प्रकार उचित रूप से इस्तेमाल करता है।

आइए इस तथ्य के अन्य पहलुओं पर विचार करते हैं-

१। एक मुसलमान पूर्ण शाकाहारी हो सकता है एक
मुसलमान पूर्ण शाकाहारी होने के बावजूद एक
अच्छा मुसलमान हो सकता है। मांसाहारी होना
एक मुसलमान के लिए ज़रूरी नहीं है।

२। पवित्र कुरआन मुसलमानों को मांसाहार की
अनुमति देता है पवित्र कुरआन मुसलमानों को
मांसाहार की इजाज़त देता है। 

निम्र कुरआनी आयतें इस बात की सुबूत हैं- '

'ऐ ईमान वालो ! प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो। तुम्हारे लिए चौपाए जानवर जायज़ हैं केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है।'' (कुरआन, ५:१)

''रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया, जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी है और हैं अन्य कितने ही लाभ। उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो।'' (कुरआन, १६:५)

''और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक
उदाहरण हैं। उनके शरीर के भीतर हम तुम्हारे पीने के
लिए दूध पैदा करते हैं, और इसके अतिरिक्त उनमें तुम्हारे
लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका मांस तुम प्रयोग करते
हो।'' (कुरआन, २३:२१)

३। मांस पौष्टिक आहार है और प्रोटीन से भरपूर है
मांस उत्तम प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। इसमें आठों
आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं जो शरीर के
भीतर नहीं बनते और जिसकी पूर्ति आहार द्वारा
की जानी ज़रूरी है। मांस में लोह, विटामिन बी-१
और नियासिन भी पाए जाते हैं।

४. इंसान के दाँतों में दो प्रकार की क्षमता है यदि
आप घास-फूस खाने वाले जानवरों जैसे भेड़, बकरी
अथवा गाय के दाँत देखें तो आप उन सभी में समानता
पाएँगे। इन सभी जानवरों के चपटे दाँत होते हैं अर्थात
जो घास-फूस खाने के लिए उचित हैं। यदि आप
मांसाहारी जानवरों जैसे शेर, चीता अथवा बाघ
इत्यादि के दाँत देखें तो आप उनमें नुकीले दाँत भी
पाएँगे जो कि मांस को खाने में मदद करते हैं। यदि
मनुष्य के दाँतों का अध्ययन किया जाए तो आप
पाएँगे उनके दाँत नुकीले और चपटे दोनों प्रकार के हैं।
इस प्रकार वे वनस्पति और मांस खाने में सक्षम होते
हैं। यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि सर्वशक्तिमान
परमेश्वर मनुष्य को केवल सब्जि़याँ ही खिलाना
चाहता तो उसे नुकीले दाँत क्यों देता? यह इस बात
का प्रमाण है कि उसने हमें मांस एवं सब्जि़याँ दोनों
को खाने की इजाज़त दी है। 

५. इंसान मांस अथवा सब्जि़याँ दोनों पचा सकता है शाकाहारी जानवरों के पाचनतंत्र केवल सब्जि़याँ ही पचा सकते हैं और मांसाहारी जानवरों का पाचनतंत्र केवल
मांस पचाने में सक्षम है, परंतु इंसान का पाचनतंत्र
सब्जि़याँ और मांस दोनों पचा सकता है। यदि
सर्वशक्तिमान ईश्वर हमें केवल सब्जि़याँ ही
खिलाना चाहता है तो वह हमें ऐसा पाचनतंत्र क्यों
देता जो मांस एवं सब्ज़ी दोनों को पचा सके। 
6. हिन्दू धार्मिक ग्रंथ मांसाहार की अनुमति देते हैं
बहुत से हिन्दू शुद्ध शाकाहारी हैं। उनका विचार है
कि मांस-सेवन धर्म विरूद्ध है। परंतु सत्य यह है कि
हिन्दू धर्म ग्रंथ इंसान को मांस खान की इजाज़त देते
हैं। ग्रंथों में उन साधुओं और संतों का वर्णन है जो
मांस खाते थे। 
(क) हिन्दू कानून पुस्तक मनुस्मृति के
अध्याय 5 सूत्र 30 में वर्णन है कि - ''वे जो उनका
मांस खाते हैं जो खाने योग्य हैं, कोई अपराध नहीं
करते है, यद्यपि वे ऐसा प्रतिदिन करते हों क्योंकि
स्वयं ईश्वर ने कुछ को खाने और कुछ को खाए जाने के
लिए पैदा किया है।'' 
(ख) मनुस्मृति में आगे अध्याय 5
सूत्र 31 में आता है - ''मांस खाना बलिदान के लिए
उचित है, इसे दैवी प्रथा के अनुसार देवताओं का
नियम कहा जाता है।'' 
(ग) आगे अध्याय 5 सूत्र 39
और 40 में कहा गया है कि - ''स्वयं ईश्वर ने बलि के
जानवरों को बलि के लिए पैदा किया, अत: बलि के
उद्देश्य से की गई हत्या, हत्या नहीं।'' महाभारत
अनुशासन पर्व अध्याय 88 में धर्मराज युधिष्ठिर और
पितामह भीष्म के मध्य वार्तालाप का उल्लेख
किया गया है कि कौनसे भोजन पूर्वजों को शांति
पहुँचाने हेतु उनके श्राद्ध के समय दान करने चाहिए।

प्रसंग इस प्रकार है- ''युधिष्ठिर ने कहा, ''हे
महाबली ! मुझे बताइए कि कौन-सी वस्तु जिसको
यदि मृत पूर्वजों को भेंट की जाए तो उनको शांति
मिलेगी ? 
कौन-सा हव्य सदैव रहेगा ? और वह क्या है
जिसको यदि पेश किया जाए तो अनंत हो जाए ?
ÓÓ भीष्म ने कहा, ''बात सुनो, ऐ युधिष्ठिर कि वे
कौन-सी हवि हैं जो श्राद्ध रीति के मध्य भेंट करना
उचित हैं। और वे कौन से फल हैं जो प्रत्येक से जुड़ें है?
और श्राद्ध के समय शीशम बीज, चावल, बाजरा,
माश, पानी, जड़ और फल भेंट किया जाए तो
पूर्वजों को एक माह तक शांति रहती है। 
यदि मछली भेंट की जाएँ तो यह उन्हें दो माह तक राहत देती है।
भेड़ का मांस तीन माह तक उन्हें शांति देता है।
$खरगोश का मांस चार माह तक, बकरी का मांस
पाँच माह और सूअर का मांस छह माह तक, पक्षियों
का मांस सात माह तक, 'प्रिष्टा नाम के हिरन के
मांस से वे आठ माह तक और ''रूरू हिरन के मांस से वे
नौ माह तक शांति में रहते हैं। त्रड्ड1ड्ड4ड्डं के मांस
से दस माह तक, भैंस के मांस से ग्यारह माह और गौ
मांस से पूरे एक वर्ष तक। पायस यदि घी में मिलाकर
दान किया जाए तो यह पूर्वजों के लिए गौ मांस
की तरह होता है। 

बधरीनासा (एक बड़ा बैल) के मांस से बारह वर्ष तक और गैंडे का मांस यदि चंद्रमा के अनुसार उनको मृत्यु वर्ष पर भेंट किया जाए तो यह उन्हें सदैव सुख-शांति में रखता है। क्लास्का नाम की जड़ी-बूटी, कंचना पुष्प की पत्तियाँ और लाल बकरी का मांस भेंट किया जाए तो वह भी अनंत सुखदायी होता है। 
अत: यह स्वाभाविक है कि यदि तुम अपने
पूर्वजों को अनंत सुख-शांति देना चाहते हो तों तुम्हें
लाल बकरी का मांस भेंट करना चाहिए।

7. हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित यद्यपि हिन्दू ग्रंथ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर
भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना
ली, क्योकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे।


8. पेड़-पौधों में भी जीवन कुछ धर्मों ने शुद्ध
शाकाहार को अपना लिया क्योंकि वे पूर्ण रूप से
जीव-हत्या के विरूद्ध हैं। अतीत में लोगों का
विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता। आज यह
विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता
है। अत: जीव-हत्या के संबंध में उनका तर्क शुद्ध
शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता। 

9. पौधों को भी पीड़ा होती है वे आगे तर्क देते हैं कि पौधे पीड़ा महसूस नहीं करते, अत: पौधों को मारना
जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है। आज
विज्ञान कहता है कि पौधे भी पीड़ा अनुभव करते हैं
परंतु उनकी चीख मनुष्य के द्वारा नहीं सुनी जा
सकती है। इसका कारण यह है कि मनुष्य में आवाज
सुनने की अक्षमता जो श्रुत सीमा में नहीं आते
अर्थात 20 हर्टज से 20,000 हर्टज तक इस सीमा के
नीचे या ऊपर पडऩे वाली किसी भी वस्तु की
आवाज मनुष्य नहीं सुन सकता है। 

एक कुत्ते में 40,000 हर्टज तक सुनने की क्षमता है। इसी प्रकार $खामोश कुत्ते की ध्वनि की लहर संख्या 20,000 से अधिक और 40,000 हर्टज से कम होती है। इन ध्वनियों को केवल कुत्ते ही सुन सकते हैं, मनुष्य नहीं। एक कुत्ता अपने मालिक की सीटी पहचानता है और उसके पास पहुँच जाता है। अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का आविष्कार किया जो पौधे की चीख को ïऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है। जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को इसका तुरंत ज्ञान हो जाता। वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते हैं कि पौधे भी पीड़ा, दुख और सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं। 

10. दो इंद्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं एक बार एक शाकाहारी ने अपने पक्ष में तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इंद्रियाँ होती हैं जबकि जानवरों में पांच होती हैं। अत: पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुकाबले में छोटा अपराध है। कल्पना करें कि अगर किसी का भाई पैदाइशी गूंगा और बहरा है और
दूसरे मनुष्य के मुकाबले उसके दो इंद्रियाँ कम हैं। वह
जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो
क्या आप न्यायाधीश से कहेंगे कि वह दोषी को कम
दंड दे क्योंकि उसके भाई की दो इंद्रियाँ कम हैं।
वास्तव में उसको यह कहना चाहिए कि उस अपराधी
ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायाधीश को
उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए। 

पवित्र कुरआन में कहा गया है- ''ऐ लोगो ! खाओ जो पृथ्वी पर है,परंतु पवित्र और जायज़।'' (कुरआन, 2:168)