क्या वेदकाल से ही नपुसकँ है आर्य राजा ~
आर्यो ब्रहाचार्य का भडाँफोड ~
नियोग या सिर्फ भोग ~
अगर हम धार्मिक ग्रथोँ का अध्ययन करते है तो वेदकाल से
ही आर्य राजा नपुसँक दिखते है और ब्रहाचार्य का
चोला पहने ऋषी भोगी दिखते है ।
ब्रहाचार्य तो सिर्फ एक चौला था
लेकिन ब्रहाचार्य का पालन किसी ने भी
नहीँ किया कोई किसी राजा कि पत्नि के साथ
नियोग कर रहा है । कोई किसी के साथ ।
और वहीँ आर्य राजाओ को देखा जाए तो वो बेचारे
नपुसकँ दिखते धार्मिक ग्रथोँ मे
राजा दशरत 4 पत्नि पुत्र चारो नियोग से । राजा
जनक सिता जी उनकी पुत्रि
नहीँ थी बल्कि खेत मे मिली
थी जिसका जिकर स्वामी जी ने
अपने अमर ग्रथँ सत्यार्थ मे किया है ।
महाभारत कि बात करे तो एक भी विवाह से सतानँ
उत्तपन नहीँ हुई जहाँ पाडवोँ कि बात है वो कुतिँ
कुवारी थी तभी नियोग कर लिया
था ।
ध्रतराष्ट वो भी नियोग से हुए । उनकी
शादी हुई गाधारीँ के साथ पर पुत्र
नहीँ हुए तभ एक से नियोग किया फिर आगे लिखा है
वो 2 वर्ष
तक गर्भवती रही फिर 100 पुत्रोँ का
जन्म एक ही बार की
डिलीवरी मेँ ।
आगे भिष्म
जिन्हे बडा बहुत बडा ब्रहाचारी कहा जाता है वो
भी नियोगी थे । ब्रहाचार्य का पालन
किसी ने नहीँ किया ।
ब्रहाचार्य आर्यो का चोला था जैसे हाथी के दातँ खाने के
और दिखाने
के और होते है ।
आज आपको ऐसे आर्य मिल जाएगेँ जो नियोग को आपात कालिन
स्थिती का उपाय बताते है । की नियोग तो
पती के मर जाने पर है ।
आर्यो के दावोँ का भडाफोँड उनके ही स्वामी
जी के अगर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश से
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 4 पृष्ट 102 पर यह भी
लिखा है कि जिस स्त्री का पति जीवित है
वह दूर देश में रोजगार के लिए गया हो तो उसकी
स्त्री तीन वर्ष तक बाट (प्रतिक्षा)
देखकर किसी अन्य पुरूष से नियोग
( कुकर्म ) कर के सतानँ कर ले, जब पति घर आये तो नियोग किए
पति को त्याग दे तथा उस गैर संतान का गोत्र भी विवाहित
पति वाला ही
माना जाएगा।
समिक्षा ~ यहाँ साफ बताया गया है कि अगर किसी
औरत का पत्ति जिवित है और अगर वो बाहर गया है रोजगार के
लिए तो पत्नि को चाहिए कि किसी गैर मर्द से नियोग
(कुकरम ,
बिना विवाह के शारिरिक सबधँ अर्थात जिना गुनाह ) कर ले
इतने गटीया तो अग्रेजोँ के भी नियम
नहीँ जितने आर्यो के है ।
(4). जिस पुरूष की पत्नी अप्रिय बोलने
वाली हो तो उस पुरूष को चाहिए कि किसी
अन्य स्त्री से नियोग कर ले तथा रहे
अपनी पत्नी के
साथ ही।
समिक्षा ~ अगर किसी कि पत्नी अप्रिय
बोले तो उसे छोडकर किसी दुसरी से नियोग
( कुकरम ) कर ले और रहे उसके साथ ।
कुछ जाहिल नयुज चैनल वाले तलाक " का मजाक उडाते है और
इस्लाम को बदनाम करते है । देख लो जाहिलोँ
अगर इस्लाम का कानुन तलाक " ना होता तो ये होता औरतो के साथ
"बताइए भला क्या कोई अप्रिय बोलने कि वजह से हि
किसी दुसरी
औरत के साथ सबधँ क्यु बनाये जब वो उसके साथ रह सकता है
तो फिर उसे उसका हक कयो नहीँ दे सकता क्यो
किसी दुसरी औरत से सबधँ बनाये ।
इसी प्रकार जो पुरूष अत्यन्त दुःखदायक हो तो
उसकी स्त्री भी दूसरे पुरूष से
नियोग से कर
के उसी विवाहित पति के दायभागी संतान कर
लेवे।
समिक्षा ~ हद है जाहिलियत की अगर
किसी का पत्ति दुखदायक है तो उसकी
पत्रनी उसे छोडकर किसी दुसरे पुरुष से
नियोग ( कुकरम) क्यो करे ।
इतना ही नहीँ सत्यार्थ प्रकाश मे
स्वामी जी ने ये तक फरमाया है
की अगर कीसी कि
पत्नी गर्भवती हो और पति से ना रहा
जाए तो किसी दुसरी औरत से नियोग कर ले
"
स्वामी जी ने आर्यो औरतो को 11 मर्दो
और मर्दो को 11 औरतोँ तक नियोग (कुकरम) करने
कि छुट दी है ।
समिक्षा ~ इन बातो के बाद नियोग के
आपातकालिन होने का तो सवाल ही नहीँ
उठता और दुसरी तरफ ब्रहाचार्य के दावे का
भी भडाँफोड हो जाता है । कयोकिँ अगर
पतनी के गभवर्ती होने तक
ही अगर ब्रहाचार्य का पालन नहीँ किया
जाए तो कैसा ब्रहाचार्य ।
ये ब्रहाचार्य सिर्फ दिखावा है जैसे हाथी के दातँ खाने
के और दिखाने के और होते है ।
अब आर्यो के ही धार्मिक ग्रथोँ से नियोग (कुकरम ,
बिना विवाह शारिरिक सबधँ ,
गुनाह ) के प्रमाण देखीये ~
रामायण/ महाभारत/स्मृति में नियोग के प्रमाण
व्यासजी का काशिराज की पुत्री
अम्बालिका से नियोग- महाभारत आदि पर्व अ 106/6
वन में बारिचर ने युधिस्टर से कहा- में
तेरा धर्म नामक पिता- उत्पन्न करने वाला जनक हूँ- महाभारत वन
पर्व 314/6
उस राजा बलि ने पुन: ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी
भार्या सुदेष्णा को उसके पास फिर भेजा- महाभारत आदि पर्व अ
104 कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो
विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न
करे- महाभारत आदि पर्व 104/2
उत्तम देवर से आपातकाल में पुरुष पुत्र की इच्छा
करते हैं-
महाभारत आदि पर्व 120/26
परशुराम द्वारा लोक के क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों
ने क्षत्रानियों में संतान उत्पन्न की- महाभारत आदि
पर्व 103/10
पांडु कुंती से- हे कल्याणी अब तू
किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का
प्रयत्न कर- महाभारत
आदि पर्व 120/28
सूर्ष ने कुंती से कहा- तू
मुझसे भय छोड़कर प्रसंग कर- महाभारत आदि
पर्व 111/13
किसी कुलीन ब्राह्मण को
बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई
दोष नहीं हैं-
सूर्य ने कुंती से कहा-भय मत करो संग करो-
महाभारत अ। पर्व 111/13
वह तू केसरी का पुत्र क्षेत्रज नियोग से उत्पन्न बड़ा
पराकर्मी – वाल्मीकि रामायण किष कांड
66/28
मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को उत्पन्न किया –
वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15
जिसका पति मर गया हैं-वह 6 महीने बाद पिता व भाई
नियोग करा दे- वशिष्ट स्मृति 17/486
किन्ही का मत हैं की देवर को छोड़कर
अन्य से नियोग न करे- गौतम स्मृति 18
जिसका पति विदेश गया हो तो वह नियोग कर ले- नारद स्मृति श्लोक
98/99/100
देवर विधवा से नियोग करे- मनु स्मृति 9/62
आपातकाल में नियोग भी गौण हैं- मनु 9/58
नियोग संतान के लोभ के लिए ही किया जाना चाहिए-
ब्राह्मण सर्वस्व पृष्ट 233 यदि राजा वृद्ध
हो गया या बीमार रहता हो तो अपने मातृकुल तथा
किसी अन्य गुणवान सामंत से अपनी भार्या
में नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करा ले- कौटिलीय शास्त्र
1/17/52
जब कई भाई संग रहते हो और उनमें से एक निपुत्र मर जाये तो
उसकी स्त्री का ब्याह पर
गोत्री से न किया जाये-उसके पति का भाई उसके पास
जाकर उसे अपनी स्त्री कर ले –
व्यवस्था विवरण 25/5-10
यदि देवर नियोग से इंकार करे तो भावज उसके मुह पर थूके और
जूते उसके पाव से उतारे- व्यवस्था 25/2
आर्य राजा नपुसकँ थे और ब्रहाचार्य कहलाने वाले भोगी थे ।
Thursday, 15 September 2016
नियोग औरतो पर अत्याचार और उनकी इज्जत की लूट बलत्कार
Monday, 20 July 2015
सत्यप्रकाश और सजा का कानून
स्वामी जी अपनी
पुस्तक ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ में मनुस्मृति के संदर्भ से
लिखते हैं कि दंड का विधान ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधार
पर होना चाहिए। (6-27)
स्वामी जी द्वारा संदर्भित मनुस्मृति
के दंड विधान पर एक दृष्टि डालिए-
कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो त्रान्यः प्रकृतो जनः।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा।।
(मनु0, 8-335)
भावार्थ - साधारण प्रजा को जिस अपराध के लिए एक पैसा
दंड दिया जाता है, उसी अपराध में लिप्त होने
पर राजा पर हजार पैसा दंड लगाया जाना चाहिए।
अष्टापद्यं तु शुद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम्।
षौडशैस्तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च।।
(मनु0, 8-236)
भावार्थ- यदि चोरी शुद्र, वैश्य या क्षत्रिय
करता है तो उन्हें पाप का क्रमशः आठ, सोलह और
बत्तीस गुना भागीदार बनना पड़ता
है।
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टि पूर्णं वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा च चतुःषष्टिस्तद्दोषगुण विद्धि सः।
(मनु0, 8-337)
भावार्थ - इसी प्रकार चूंकि ब्राह्मण को
चोरी के गुण-दोष का सर्वाधिक ज्ञान होता है,
अतः वह चोरी करता है तो उसे पाप का चैसठ
गुना भागीदार बनना पड़ता है।
यहां स्वामी जी ने वर्ण को ज्ञान
और प्रतिष्ठा का आधार माना है और ब्राह्मण वर्ण को
ज्ञान और प्रतिष्ठा में अन्य वर्णों क्षत्रिय, वैश्य
और शुद्र से ऊंचा मानते हुए किसी अपराध में
ब्राह्मण के लिए अधिक सजा का प्रावधान किया है।
स्वामी दयानंद ने अपनी दंड
विधान की धारणा को मनुस्मृति के उक्त ‘लोकों से
सत्य साबित करने का प्रयास अपनी पुस्तक
‘सत्यार्थ प्रकाश’ में किया है। (6-27)
अगर उक्त ‘लोकों से स्वामी दयानंद
की यह धारणा कि दंड का विधान ज्ञान और
प्रतिष्ठा के आधार पर होना चाहिए, सत्य साबित हो
भी जाता है तो अब मुनस्मृति के निम्न ‘लोक
भी देखिए, उनसे क्या साबित हो रहा है?
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह।
विलुप्तौ शुद्रवद्दण्ड्यौ दग्ध्व्यौ वा कटाग्निना।।
(मनु0, 8-376)
भावार्थ - यदि रक्षिण ब्राह्मणी से वैश्य या
क्षत्रिय शारीरिक संबंध स्थापित करे तो
उन्हें शुद्र के समान दंड देते हुए आग में जलाकर मार
देना चाहिए।
सहस्रं ब्राह्मणो दण्ड्योगुप्तां विप्रां बलाद् व्रजन्।
शतानि पत्र्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह सड्.गतः।।
(मनु0, 8-377)
भावार्थ - रक्षित ब्राह्मणी से यदि ब्राह्मण
बलात मैथुन करता है तो उस पर दो हजार पैसा दंड लगाना
चाहिए। यदि ब्राह्मणी की
सहमति से ऐसा करता है तो उसे पांच सौ पैसा दंड देना
चाहिए।
मौण्ड्यं प्राणान्तिकोदण्डोब्राह्मणस्य
विधीन्यते।
इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत्।।
(मनु0, 8-378)
भावार्थ - ब्राह्मण के सिर मुंडवाने का अर्थ
ही उसको मृत्युदंड देना है, जबकि अन्य
वर्णवालों को मृत्युदंड मिलने पर उनका सचमुच वध किया
जाना चाहिए।
न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम्।
राष्ट्रादेनं बहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम्।।
(मनु0, 8-379)
भावार्थ- भले ही ब्राह्मण ने अनेक
महापाप किए हों, किंतु उसका वध करना निषिद्ध है। उसे
देश निकाले की सजा दी जा
सकती है, ऐसी स्थिति में उसका
धन उसे दे देना उचित है।
न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मा विद्यते भुवि।
तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत्।।
(मनु0, 8-380)
भावार्थ- ब्राह्मण के वध से बढ़कर और कोई पाप
नहीं। ब्राह्मण का वध करने की
तो राजा को कल्पना भी नहीं करना
चाहिए।
शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति।
वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शुद्रस्तुवधमर्हति।।
(मनु0, 8-266)
भावार्थ- ब्राह्मण को यदि क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र द्वारा
अपशब्द या कठोर वचन कहा जाए तो उन्हें क्रमशः सौ
पैसा, डेड़ सौ पैसा तथा वध का दंड देना चाहिए।
पत्र्चाशद् ब्राह्मणो दण्डः क्षत्रियस्याभिशंसने।
वैश्ये स्यादर्धपत्र्चाशच्छूद्रे द्वादशको दम्ः।।
(मनु0, 8-267)
भावार्थ- यदि ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र को
अपशब्द कहा जाए तो उसे क्रमशः पचास,
पच्चीस और बारह पैसा आर्थिक दंड देना
चाहिए।
एकाजातिद्र्विजातीस्तु वाचा दारूण या क्षिपन्।
जिह्नयाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः।।
(मनु0, 8-269)
भावार्थ - शुद्र द्वारा द्विजातियों को अपशब्द कहा जाए तो
उसकी जिह्ना काट लेनी चाहिए,
ऐसे अधम के लिए यही दंड उचित है।
नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्योऽयोमयः ‘ांकुज्र्वलन्नास्ये दशांगुलः ।।
(मनु0, 8-270)
भावार्थ - यदि शुद्र प्रभाव के अहंकार में द्विजातियों के
नाम व जाति का उपहास करता है तो आग में तप्त दस
उंगली शलाका (लोहे की छड़)
उसके मुंह में डाल देनी चाहिए।
धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः।
तप्तमासेचयेत्तैलं वक्तृ श्रोत्रे च पार्थिवः ।।
(मनु0, 8-271)
भावार्थ- यादि शुद्र दर्प में आकर द्विजातियों को
धर्मोपदेश देने की धृष्टता करे तो राजा उसके
मुंह व कान में खौलता तेल डलवा दे मनुस्मृति के उक्त
‘लोकों में दंड विधान को बदल दिया गया है।
स्वामी दयानंद ने जहां ब्राह्मण को
किसी अपराध में अन्य वर्णों से अधिक दंड का
अधिकारी माना है, वहीं उक्त
‘लोकों में ब्राह्मण के लिए अन्य वर्णों से कम दंड का
प्रावधान किया गया है। जैसा कि उक्त ‘लोकों से स्पष्ट है
कि अगर क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र व्यभिचार करें तो उनको
जलाकर मार देना चाहिए, जबकि ब्राह्मण को मात्र सिर
मुंडवाने की सजा देनी चाहिए।
स्वामी दयानंद के मतानुसार तो ब्राह्मण को
जलाकर मारने से भी कोई बड़ी सजा
दी जानी चाहिए। मगर यहां
ब्राह्मण को सिर मुंडाने जैसी नाममात्र
की सजा रखी गई है। जहां
ब्राह्मण को अपशब्द कहने पर शुद्र के मुक़ाबले वैश्य
को और वैश्य के मुकाबले क्षत्रिय को अधिक दंड देना
चाहिए था, वहीं ‘लोक (8-266) में उक्त
प्रावधान को उलट दिया गया है, क्षत्रिय और वैश्य को
आर्थिक दंड रखा गया है वहीं शुद्र के लिए
मृत्यु दंड की बात कही गई है।
‘लोक (8-269, 270, 271) में शुद्र द्वारा द्विजातियों को
मात्र अपशब्द कहने पर अमानवीय सजा का
प्रावधान किया गया है। क्या सजा का यह प्रावधान
बुद्धिसम्मत और न्यायसंगत है? जिस अपराध में
ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक सजा होनी
चाहिए थी वहीं ‘लोक (8-267)
में ब्राह्मण को अन्य वर्णों से कम सजा का प्रावधान किया
गया है। अब कहां गया स्वामी जी
का ज्ञान और प्रतिष्ठा पर आधारित दंड विधान? क्या
स्वामी जी ने पूरी
मनुस्मृति नहीं पढ़ी
थी?
अब क्या स्वामी दयानंद अथवा मनुस्मृति द्वारा
प्रतिपादित दंड विधान की धारणा न्यायसंगत और
व्यावहारिक लगती है ? क्या कोई शासन
व्यवस्था उक्त दंड विधान को मान्य करार दे
सकती है? क्या उक्त विधान हास्यास्पद और
अक्ल के ख़िलाफ़ नहीं
कुफ्र की पहचान संक्षिप्त मे
इस्लाम
इस्लाम (अरबी: الإسلام) एक एकेश्वरवादी धर्म है, जो इसके अनुयाइयों के अनुसार, अल्लाह के अंतिम रसूल और नबी, मुहम्मद द्वारा मनुष्यों तक पहुंचाई गई अंतिम ईश्वरीय पुस्तक क़ुरआन की शिक्षा पर आधारित है। यानी दनियावी रूप से और धार्मिक रूप से इस्लाम (और मुस्लिम कृरए के अनुसार पिछले धर्मों अनुकूलन) शुरू, ६१० ए से ६३२ ई। तक २३ वर्ष शामिल समय में मोहम्मद पर अल्लाह की ओर से उतरने वाले इल्हाम (कुरआन) से होता है। कुरान अरबी भाषा में रची गई (गोपनीयता कारण: आललसान कुरआन) और इसी भाषा में विश्व की कुल जनसंख्या के २४% हिस्से, यानी लगभग १.६ से १.८ अरब लोगों, द्वारा पढ़ी जाती है; इनमें से (स्रोतों के अनुसार) लगभग २० से ३० करोड़ लोगों की यह मातृभाषा है। कई निजी स्रोतों से मौजूदा स्वरूप में आने वाली अन्य ईश्वरीय पुस्तकों के विपरीत, बोसीलहٔ रहस्योद्घाटन, व्यक्ति अकेला (मुहम्मद) के मुँह से कथित होकर लिखी जाने वाली पुस्तक और पुस्तक का पालन करने के निर्देश प्रदान करने वाली शरीयत ही दो ऐसे संसाधन हैं जो इस्लाम की जानकारी स्रोत करार दिये जाते हैं।
इस्लामी मत
इस्लामी धर्म के प्रमुख मत यह हैं:
ईश्वर की एकता
मुसलमान एक ही ईश्वर को मानते हैं, जिसे वे अल्लाह (फ़ारसी: ख़ुदा) कहते हैं। एकेश्वरवाद को अरबी में तौहीद कहते हैं, जो शब्द वाहिद से आता है जिसका अर्थ है एक। इस्लाम में ईश्वर को मानव की समझ से परे माना जाता है। मुसलमानों से इश्वर की कल्पना करने के बजाय उसकी प्रार्थना और जय-जयकार करने को कहा गया है। मुसलमानों के अनुसार ईश्वर अद्वितीय है - उसके जैसा और कोई नहीं। इस्लाम में ईश्वर की एक विलक्षण अवधारणा पर बल दिया गया है और यह भी माना जाता कि उसका सम्पूर्ण विवरण करना मनुष्य से परे है। कहो: ईश्वर एक और अनुपम। ईश्वर सनातन, सदा से सदा तक जीने वाला है।
न उसे किसी ने जना और न ही वो किसी का जनक है।br /> एवं उस जैसा कोई और नहीं है।”
(कुरआन, सूरत ११२, आयते १ - ४)}}
नबी (दूत) और रसूल
इस्लाम के अनुसार ईश्वर ने धरती पर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिये समय समय पर किसी व्यक्ति को अपना दूत बनाया। यह दूत भी मनुष्य जाति में से होते थे और ईश्वर की ओर लोगों को बुलाते थे। ईश्वर इन दूतों से विभिन्न रूपों से समपर्क रखता था। इन को इस्लाम में नबी कहते हैं। जिन नबियों को ईश्वर ने स्वयं, शास्त्र या धर्म पुस्तकें प्रदान कीं उन्हें रसूल कहते हैं। मुहम्मद भी इसी कड़ी का भाग थे। उनको जो धार्मिक पुस्तक प्रदान की गयी उसका नाम कुरान है। कुरान में अल्लाह के २५ अन्य नबियों का वर्णन है। स्वयं कुरान के अनुसार ईश्वर ने इन नबियों के अलावा धरती पर और भी कई नबी भेजे हैं जिनका वर्णन कुरान में नहीं है। लगभग सन्सार मे १२४००० नबी (दूत) वर्णन कुरान मे है।
सभी मुसलमान ईश्वर द्वारा भेजे गये सभी नबियों की वैधता स्वीकार करते हैं और मुसलमान, मुहम्मद को ईशवर का अन्तिम नबी मानते हैं। अहमदिय्या समुदाय मुहम्मद को अन्तिम नबी नहीं मानता तथापि स्वयं को इस्लाम का अनुयायी कहता है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकारा भी जाता है हालांकि कई इस्लामी राष्ट्रों में उसे मुस्लिम मानना प्रतिबंधित है। भारत के उच्चतम न्यायालय के अनुसार उनको भारत में मुसलमान माना जाता है।[1] ref>On Finality of Prophethood – Opinions of Islamic
आर्य समाज की नियोग विधि,औरत पर अत्याचार
आर्य समाज और सजा का कानून
स्वामी जी अपनी
पुस्तक ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ में मनुस्मृति के संदर्भ से
लिखते हैं कि दंड का विधान ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधार
पर होना चाहिए। (6-27)
स्वामी जी द्वारा संदर्भित मनुस्मृति
के दंड विधान पर एक दृष्टि डालिए-
कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो त्रान्यः प्रकृतो जनः।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा।।
(मनु0, 8-335)
भावार्थ - साधारण प्रजा को जिस अपराध के लिए एक पैसा
दंड दिया जाता है, उसी अपराध में लिप्त होने
पर राजा पर हजार पैसा दंड लगाया जाना चाहिए।
अष्टापद्यं तु शुद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम्।
षौडशैस्तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च।।
(मनु0, 8-236)
भावार्थ- यदि चोरी शुद्र, वैश्य या क्षत्रिय
करता है तो उन्हें पाप का क्रमशः आठ, सोलह और
बत्तीस गुना भागीदार बनना पड़ता
है।
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टि पूर्णं वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा च चतुःषष्टिस्तद्दोषगुण विद्धि सः।
(मनु0, 8-337)
भावार्थ - इसी प्रकार चूंकि ब्राह्मण को
चोरी के गुण-दोष का सर्वाधिक ज्ञान होता है,
अतः वह चोरी करता है तो उसे पाप का चैसठ
गुना भागीदार बनना पड़ता है।
यहां स्वामी जी ने वर्ण को ज्ञान
और प्रतिष्ठा का आधार माना है और ब्राह्मण वर्ण को
ज्ञान और प्रतिष्ठा में अन्य वर्णों क्षत्रिय, वैश्य
और शुद्र से ऊंचा मानते हुए किसी अपराध में
ब्राह्मण के लिए अधिक सजा का प्रावधान किया है।
स्वामी दयानंद ने अपनी दंड
विधान की धारणा को मनुस्मृति के उक्त ‘लोकों से
सत्य साबित करने का प्रयास अपनी पुस्तक
‘सत्यार्थ प्रकाश’ में किया है। (6-27)
अगर उक्त ‘लोकों से स्वामी दयानंद
की यह धारणा कि दंड का विधान ज्ञान और
प्रतिष्ठा के आधार पर होना चाहिए, सत्य साबित हो
भी जाता है तो अब मुनस्मृति के निम्न ‘लोक
भी देखिए, उनसे क्या साबित हो रहा है?
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह।
विलुप्तौ शुद्रवद्दण्ड्यौ दग्ध्व्यौ वा कटाग्निना।।
(मनु0, 8-376)
भावार्थ - यदि रक्षिण ब्राह्मणी से वैश्य या
क्षत्रिय शारीरिक संबंध स्थापित करे तो
उन्हें शुद्र के समान दंड देते हुए आग में जलाकर मार
देना चाहिए।
सहस्रं ब्राह्मणो दण्ड्योगुप्तां विप्रां बलाद् व्रजन्।
शतानि पत्र्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह सड्.गतः।।
(मनु0, 8-377)
भावार्थ - रक्षित ब्राह्मणी से यदि ब्राह्मण
बलात मैथुन करता है तो उस पर दो हजार पैसा दंड लगाना
चाहिए। यदि ब्राह्मणी की
सहमति से ऐसा करता है तो उसे पांच सौ पैसा दंड देना
चाहिए।
मौण्ड्यं प्राणान्तिकोदण्डोब्राह्मणस्य
विधीन्यते।
इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत्।।
(मनु0, 8-378)
भावार्थ - ब्राह्मण के सिर मुंडवाने का अर्थ
ही उसको मृत्युदंड देना है, जबकि अन्य
वर्णवालों को मृत्युदंड मिलने पर उनका सचमुच वध किया
जाना चाहिए।
न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम्।
राष्ट्रादेनं बहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम्।।
(मनु0, 8-379)
भावार्थ- भले ही ब्राह्मण ने अनेक
महापाप किए हों, किंतु उसका वध करना निषिद्ध है। उसे
देश निकाले की सजा दी जा
सकती है, ऐसी स्थिति में उसका
धन उसे दे देना उचित है।
न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मा विद्यते भुवि।
तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत्।।
(मनु0, 8-380)
भावार्थ- ब्राह्मण के वध से बढ़कर और कोई पाप
नहीं। ब्राह्मण का वध करने की
तो राजा को कल्पना भी नहीं करना
चाहिए।
शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति।
वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शुद्रस्तुवधमर्हति।।
(मनु0, 8-266)
भावार्थ- ब्राह्मण को यदि क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र द्वारा
अपशब्द या कठोर वचन कहा जाए तो उन्हें क्रमशः सौ
पैसा, डेड़ सौ पैसा तथा वध का दंड देना चाहिए।
पत्र्चाशद् ब्राह्मणो दण्डः क्षत्रियस्याभिशंसने।
वैश्ये स्यादर्धपत्र्चाशच्छूद्रे द्वादशको दम्ः।।
(मनु0, 8-267)
भावार्थ- यदि ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र को
अपशब्द कहा जाए तो उसे क्रमशः पचास,
पच्चीस और बारह पैसा आर्थिक दंड देना
चाहिए।
एकाजातिद्र्विजातीस्तु वाचा दारूण या क्षिपन्।
जिह्नयाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः।।
(मनु0, 8-269)
भावार्थ - शुद्र द्वारा द्विजातियों को अपशब्द कहा जाए तो
उसकी जिह्ना काट लेनी चाहिए,
ऐसे अधम के लिए यही दंड उचित है।
नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्योऽयोमयः ‘ांकुज्र्वलन्नास्ये दशांगुलः ।।
(मनु0, 8-270)
भावार्थ - यदि शुद्र प्रभाव के अहंकार में द्विजातियों के
नाम व जाति का उपहास करता है तो आग में तप्त दस
उंगली शलाका (लोहे की छड़)
उसके मुंह में डाल देनी चाहिए।
धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः।
तप्तमासेचयेत्तैलं वक्तृ श्रोत्रे च पार्थिवः ।।
(मनु0, 8-271)
भावार्थ- यादि शुद्र दर्प में आकर द्विजातियों को
धर्मोपदेश देने की धृष्टता करे तो राजा उसके
मुंह व कान में खौलता तेल डलवा दे मनुस्मृति के उक्त
‘लोकों में दंड विधान को बदल दिया गया है।
स्वामी दयानंद ने जहां ब्राह्मण को
किसी अपराध में अन्य वर्णों से अधिक दंड का
अधिकारी माना है, वहीं उक्त
‘लोकों में ब्राह्मण के लिए अन्य वर्णों से कम दंड का
प्रावधान किया गया है। जैसा कि उक्त ‘लोकों से स्पष्ट है
कि अगर क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र व्यभिचार करें तो उनको
जलाकर मार देना चाहिए, जबकि ब्राह्मण को मात्र सिर
मुंडवाने की सजा देनी चाहिए।
स्वामी दयानंद के मतानुसार तो ब्राह्मण को
जलाकर मारने से भी कोई बड़ी सजा
दी जानी चाहिए। मगर यहां
ब्राह्मण को सिर मुंडाने जैसी नाममात्र
की सजा रखी गई है। जहां
ब्राह्मण को अपशब्द कहने पर शुद्र के मुक़ाबले वैश्य
को और वैश्य के मुकाबले क्षत्रिय को अधिक दंड देना
चाहिए था, वहीं ‘लोक (8-266) में उक्त
प्रावधान को उलट दिया गया है, क्षत्रिय और वैश्य को
आर्थिक दंड रखा गया है वहीं शुद्र के लिए
मृत्यु दंड की बात कही गई है।
‘लोक (8-269, 270, 271) में शुद्र द्वारा द्विजातियों को
मात्र अपशब्द कहने पर अमानवीय सजा का
प्रावधान किया गया है। क्या सजा का यह प्रावधान
बुद्धिसम्मत और न्यायसंगत है? जिस अपराध में
ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक सजा होनी
चाहिए थी वहीं ‘लोक (8-267)
में ब्राह्मण को अन्य वर्णों से कम सजा का प्रावधान किया
गया है। अब कहां गया स्वामी जी
का ज्ञान और प्रतिष्ठा पर आधारित दंड विधान? क्या
स्वामी जी ने पूरी
मनुस्मृति नहीं पढ़ी
थी?
अब क्या स्वामी दयानंद अथवा मनुस्मृति द्वारा
प्रतिपादित दंड विधान की धारणा न्यायसंगत और
व्यावहारिक लगती है ? क्या कोई शासन
व्यवस्था उक्त दंड विधान को मान्य करार दे
सकती है? क्या उक्त विधान हास्यास्पद और
अक्ल के ख़िलाफ़ नहीं