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Sunday, 2 August 2015

इस्लाम को बदनाम करने के लिए फेलाई जा रही जूठी हदीश की समीक्षा पार्ट -4 (स्त्री की मर्यादा शोषण और उम्मे किर्फा)

इस्लाम विरोधी लोग हदीस के शब्दों को तोड़ मरोड़कर इस्लाम पर आपत्तिजनक आरोप लगाने मे माहिर हैं, 

हम जब भी इस्लाम मे युद्ध के समय भी शत्रु स्त्रियों के सतीत्व और सुरक्षा को मुस्लिमों द्वारा कतई हानि न पहुंचाने के नियम के बारे मे बताते थे , तो एक भाई "उम्मे किर्फा" का नाम लेते हुए पहुंच जाते और ये आरोप लगाते थे कि उक्त उम्मे किर्फा नाम की गैरमुस्लिम महिला की जघन्य हत्या मुस्लिमों ने कर डाली थी, 
और उसकी बेटी को मक्का के काफिरो को एक गुलाम के रूप मे बेच दिया था ... 

सच ये है कि उम्मे किर्फा की कहानी एण्टी इस्लामिक साइट्स द्वारा गढ़ी गई है जिसके लिए "सिरा" और "तारीखे तबरी" एवं मुस्लिम शरीफ़ के तथाकथित प्रमाण दिए जाते हैं, लेकिन सिरा और तबरी हदीस नहीं हैं, न ही इस नाते ये इस्लामी ज्ञान का स्रोत हैं, 
हालांकि इन किताबों (सिरा व तबरी) पर मुस्लिमों की आस्था नहीं है, इन किताबों मे इस्लामी आचार विचार के विरुद्ध कई बातें हैं इन किताबों मे उम्म किर्फा की पूरी कहानी की वास्तविकता भी संदेहास्पद है, ..... 
फिर भी, इन अप्रमाणिक और संदेहास्पद किताबों से भी मुस्लिम अपराधी नहीं ठहरते, इन किताबों मे भी तथ्य यही हैं कि उम्म किर्फा स्वयं मुस्लिमों पर आक्रमण करती थी और हिंसक, क्रूर और बर्बर तरीकों से मुस्लिमों की हत्या करती थी वो कई मुस्लिमों की हत्या की दोषी थी, और जान के बदले जान का नियम जो इस्लाम मे स्त्री पुरूषों के लिए समान है, 
उस नियम के तहत उसको मृत्युदण्ड दिया गया... बहरहाल इस्लामी ज्ञान का स्रोत सही हदीस और कुरान है, और उनमें आप कहीं उम्म किर्फा का जिक्र तक नहीं दिखा सकते, तो इस कहानी को हम इस्लाम विरोधियों का एक झूठा प्रपंच से अधिक कुछ क्यों मानें, 
हमारे सामने तो मक्का के सरदार अबू सुफयान की पत्नी हिन्द का प्रमाणिक उदाहरण है, जो युद्ध मे मुस्लिमों को अत्यधिक हानि पहुंचाती थी, और युद्ध मे नबी सल्ल. के प्रिय चचा हज़रत हमज़ा,रज़ि. का कत्ल करवाने के बाद उनकी लाश को चीर कर उनका कलेजा चबा गई थी, इसके बावजूद जब मक्का विजय के अवसर हिन्द नबी सल्ल. के समक्ष एक पराजित की तरह आई तो नबी सल्ल. ने बस उस स्त्री को अपनी नजरों के सामने से हटा दिया कोई दण्ड नहीं दिया .... 

तो हमने तो इस्लाम से यही सीखा कि क्रूर स्त्रियों के प्रति भी जहाँ तक हो सके विनम्र ही रहें ॥ 
रही बात सही मुस्लिम, किताब 19, नम्बर 4345 की तो वहाँ उम्म किर्फा का कहीं नाम नहीं, और जैसा विरोधी लोगों की गन्दी ज़हनियत ने अन्दाज़ा लगा लिया कि मुस्लिमों ने बनू फज़ारा से अपहरण कर के एक युवती को मक्का के काफिरो को एक गुलाम के रूप मे "बेच दिया" तो वो भी झूठ है .... 

बुखारी शरीफ मे प्रसिद्ध हदीस वर्णित है कि अल्लाह उस व्यक्ति का शत्रु हो जाएगा जो व्यक्ति किसी आज़ाद शख्स को गुलाम बनाकर बेचकर उसका दाम वसूल लेगा , इस हदीस का ज्ञान रखने के कारण निष्ठावान मुस्लिमों ने स्त्रियों या पुरूषों को अपने इतिहास से लेकर आज तक कभी नही बेचा , लोगों को दास बनाकर बेचने की परम्परा औरों की रही है .... .... 

ऐतिहासिक तथ्य ये है कि नबी सल्ल. के समय मे काफिरो से जितने भी युद्ध मुस्लिमों के साथ हुए वो सारे युद्ध मक्का के काफिरो ने शुरू किए, फिर अपने मित्र कबीलो के साथ योजनाएं बना बनाकर किए, बनू फज़ारा भी मक्का के काफिरो के मित्र थे और इस हदीस के पार्श्व मे बनु फजारा ने मक्का वालों के साथ मिलकर युद्ध किए थे जिसके फलस्वरूप अनेक मुस्लिमों को उन्होंने बंधक भी बना लिया था ऐसे ही एक युद्ध मे फज़ारा वालों की जब मुस्लिमों के समक्ष हार हो गई और युद्ध क्षेत्र मे मौजूद स्त्री एवं पुरूषों को मुस्लिमों ने बंदी बना लिया, और हज़रत सलामा रज़ि. को एक युवती दी गई (नौकरानी के तौर पर न कि रखैल के) , 

इसी हदीस मे हज़रत सलामा रज़ि. कम से कम तीन बार ये कसम खाते है कि वो युवती मुझे बहुत पसंद थी मगर मैंने उसके साथ कोई जबरदस्ती नहीं की ... 
उधर अपने मित्र कबीले की इस युवती को आजाद कराने के लिए मक्का के काफिरो ने नबी सल्ल. के साथ समझौता किया, और नबी सल्ल. ने वो युवती जैसी पवित्र वो सलामा रज़ि. के पास आई थी, वैसी ही पवित्र उसके मित्र मक्का वालों को सौंप दी जिसके बदले मे मक्का वालों ने अपने पास पहले हुए युद्ध मे बंधक बनाए हुए मुस्लिमों को रिहा कर दिया .... 
वो युवती मक्का के काफिरो को बेची गई , ऐसा अनुमान गिरी हुई सोच के लोग ही लगा सकते हैं, या उन लोगों को भ्रम हो सकता है जिन लोगों के दिमाग मे पूर्वाग्रह डाल दिया गया हो, लेकिन संतुलित बुद्धि से, और दास व्यापार न करने की इस्लामी शिक्षा को ध्यान मे रखते हुए 
मुस्लिम शरीफ़ की इस हदीस पर सोचा जाए तो स्पष्ट है कि यदि अपने मित्र कबीले बनू फज़ारा की लड़की को खरीद कर मक्का वाले उसे गुलाम बना लेते व उसका यौन शोषण करने लगते तो बनू फज़ारा से मक्का वालों की दुश्मनी हो जाती और मक्का वालों की ये खास प्लानिंग थी कि वे मुस्लिमों के विरुद्ध रहने वाले सभी गैर मुस्लिम कबीलो से दोस्ती बनाकर रखते थे ताकि मिलकर मुस्लिमों का खात्मा कर सकें, 
जैसा कि अल्लाह पाक ने कुरान मजीद मे फरमाया है कि "ये लोग मुस्लिमों के विरुद्ध एक दूसरे के मित्र हैं,

और तुम देखोगे कि जिनके दिलों मे रोग (मुस्लिमों के लिए दुर्भावना) है वे दौड़ दौड़ कर एक दूसरे से मिले जाते हैं ... " 

अत: मुस्लिमों के खिलाफ मजबूत बने रहने के लिए मक्का वालों ने उस युवती को उसके परिजनो को सौंपने के लिए ही मुस्लिमों से मांगा था.... 

अत: ये भी सिद्ध है कि इस्लाम का कोई भी नियम कायदा कभी ऐसा नहीं रहा जिससे किसी स्त्री की मर्यादा या प्राणो को जरा भी नुकसान पहुंचने की आशंका रही हो ॥

इस्लाम को बदनाम करने के लिए फेलाई जा रही हदीश की समीक्षा पार्ट -3(पति पत्नी के बिच सम्बन्ध)

कुछ लोग इस्लाम का अपमान करने के लिए पति पत्नी के बीच नैसर्गिक सम्बन्धो की हदीसो मे चर्चा को तोड़ मरोड़ कर बेहद अश्लील ढंग से वो बातें सबको सुनाते हैं,

जैसे कुछ लोग इण्टरनेट पर कहते मिलते हैं कि सही मुस्लिम किताब 8 हदीस 32443 मे ऐसा लिखा है कि औरतें सदा संभोग के लिए तैयार रहें, जिहादी पति इनसे कभी भी सम्भोग कर सकते हैं..... 

अव्वल तो बात ये है कि मुस्लिम शरीफ़ की किताब आठ मे इस नम्बर की कोई हदीस कहीं है ही नहीं , बल्कि सही मुस्लिम किताब 8, हदीस नम्बर 3240, 3241 और 3242 पर जो अहादीस दर्ज हैं , उनमें बेहद साफ साफ ये ही बात लिखी है कि जब किसी पराई औरत का सौन्दर्य और उकसाने वाली हरकतों को देखकर किसी पुरुष का मन डोलने लगे, उस स्त्री से व्यभिचार के विचार दिल मे आने लगें तो पुरुष को कि कोई भी गलत काम करने से बचते हुए, अपने घर लौट आना चाहिए 
और अपनी पत्नी का संसर्ग कर के मन मे आई व्यभिचार की भावना को पूरा ही खत्म कर डालना चाहिए.... 
तो यहाँ तो पराई स्त्रियों से बचने की एक बेहद अच्छी तालीम दी गई है और सबको अनदेखा कर के केवल अपनी वैध पत्नी से ही यौन सम्बन्ध बनाने की अच्छी बात कही गई है, इन लोगों को उसमें भी बुराई नजर आ गई ?? 

हंसी आती है ये देखकर कि इस्लाम मे विवाह संस्था के अन्दर पति पत्नी के बीच सेक्स का होना तो इन लोगों को अश्लील और आपत्तिजनक दिखता है, लेकिन लिव इन रिलेशन, और सेरोगेसी जैसी चीजों की यही लोग वकालत करते हैं । ..... 
इन लोगों की बातों से तो लगता है कि हमारे समाज मे पति पत्नी भी आपस मे सेक्स के लिए तैयार होने को पाप मानते होंगे, मगर हमारे देश मे लगातार बढ़ते हिंसक बलात्कारो और व्यभिचारो के मामले साफ पता देते हैं, कि यहाँ के लोग कितने शर्मीले और पुण्यात्मा हैं ...!! 

मेरे भाईयों अगर समाज मे पति और पत्नी के बीच वैसी ही ईमानदारी न बनाई जाए जैसी इस्लाम मे सिखाई गई है तो फिर उस समाज मे वैसा ही व्यभिचार और नंगापन फैल जाता है जैसा अमेरिका और योरोप मे फैल चुका है और भारत मे फैल रहा है ॥ 
रही आपकी ये कल्पना कि औरतें सदा सेक्स के लिए तैयार बैठी रहेंगी और मर्द बाहर से आते ही उनसे जानवर की तरह लिपट जाएंगे, तो जनाब ये आपकी कोरी कल्पना है, इस्लाम मे जानवरों की तरह औरत के पास जाने वालों के लिए कोई जगह नही है । 
इस्लाम मे ज़िन्दगी के हर पहलू, यानि चलने बोलने खाने पीने, प्यार करने, दाम्पत्य मे संवाद, यानि हर चीज का सबसे अच्छा सलीका सिखाया गया है ... 
घर आते ही अपनी बीवी पर जानवर की तरह कूद पड़ने वाले कोई और होंगे, .... जिस तरह मुसलमान को ये सिखाया गया कि बेपर्दा पराई स्त्रियों के आमन्त्रण पर भी पुरुष अपनी कामेच्छा पर नियंत्रण रखे, उसी तरह अपने घर मे लौटकर भी सही समय आने तक खुद पर नियंत्रण रखेगा ... 
घर के बाकी सदस्यों से शर्म करेगा, और पत्नी के तैयार होने की प्रतीक्षा भी करेगा । 
नबी सल्ल. ने फरमाया "तुम लोग अपनी बीवियों पर (सम्बन्ध बनाने मे) सीधे जानवरों की तरह मत गिर जाया करो, बल्कि अपनी पत्नी को इस विषय मे पहले किन्हीं माध्यमों से सूचित किया करो ... 
सहाबा ने पूछा किन माध्यमों से ? आप सल्ल. ने मुस्कुरा के फरमाया प्रेम की बातों या चुंबन से " 

उम्मीद है , भाईयों की गलतफहमी दूर हुई होगी ॥ धन्यवाद

इस्लाम को बदनाम करने के लिए फेलाई गयी जूठ हदीश की समीक्षा पार्ट -2

कुछ हदीसो की गलत तरीके से व्याख्या कर के ये सिद्ध करना चाहते हैं कि इस्लाम मे पत्नी को पीटने की शिक्षा दी गई है ... आइए देखें इन आरोपों मे कितनी सत्यता है 1• पहला प्रमाण हदीस मे वाइफ बीटिंग का दिखाया जाता है सही मुस्लिम 4/2127 मे मां आएशा रज़ि. का ये बयान कि "नबी सल्ल. ने मेरे सीने पर मारा, जिससे मुझे दर्द हुआ " उत्तर - इतनी सी बात पढ़कर ऐसा ही लगता है जैसे नबी सल्ल. ने माज़अल्लाह मां आएशा रज़ि. को पीटा हो, परंतु जब आप ये हदीस पढ़ते हैं तो पाएंगे कि यहाँ कोई विवाद नहीं हो रहा था जिसमें मारपीट की नौबत आए, बल्कि अल्लाह के आदेश पर रात को चुपचाप घर से निकले नबी सल्ल. का पीछा मां आएशा रज़ि. ने किया था, ये जानकर नबी सल्ल. को स्वाभाविक ही दुख हुआ कि अपनी जिन पत्नी को नबी सल्ल. दिलोजान से प्रेम करते थे उन पत्नी ने ही नबी सल्ल. की जासूसी की, और इस हदीस की व्याख्या करते हुए इमाम नानवी ने लिखा है कि शब्द "ल-ह- दा" का सही अर्थ मारना नहीं बल्कि धकेलना है तो नबी सल्ल. ने मलाल के तौर पर मां आएशा को धक्का दिया जिससे मां आएशा को शारीरिक पीड़ा नहीं बल्कि मानसिक पीड़ा हुई, पश्चाताप स्वरूप इस स्थान पर कोई मारपीट नहीं हुई थी इस बात की पुष्टि बहुत बेहतर तरीके से अम्मी आएशा रज़ि. के इस बयान से हो जाती है कि "नबी सल्ल. ने कभी भी किसी को भी अपने हाथ से नहीं मारा, सिवाय तब के जबकि आप सल्ल. अल्लाह की राह मे जंग कर रहे थे, और न ही कभी आप सल्ल. ने किसी गुलाम या किसी स्त्री पर हाथ उठाया " (इब्ने माजाह, अल्बानी ने इसे सही प्रमाणित किया) 2• दूसरी हदीस बुखारी 72/715 , कि "एक स्त्री ने अपने पति द्वारा की गई पिटाई की शिकायत मां आएशा से की तो नबी सल्ल. ने उल्टा उस स्त्री को ही घर लौटकर अपने पति की शारीरिक इच्छा की पूर्ति करने का आदेश दिया " उत्तर - यहाँ भी हदीस पढिए पहले ये स्त्री आकर अपने पति की शिकायत मां आएशा रज़ि. से करती है, लेकिन जब ये स्त्री अपने पति समेत नबी सल्ल. के सम्मुख प्रस्तुत होती है तो ये नहीं कहती कि उसका पति उसे पीटता है, बल्कि वो स्त्री एक बड़ा और गम्भीर झूठ बोलती है कि उसका पति नपुंसक है और उसके लिए बेकार है ... लेकिन उसके पति के साथ मे उस समय पति की दूसरी पत्नी से पैदा हुए पुत्र थे, जिस कारण उस स्त्री का झूठ पकड़ा गया, उस स्त्री के पति ने कहा कि मुझमे ऐसी कोई कमी नहीं, बल्कि असल मे ये स्त्री मुझे तलाक देकर अपने पूर्व पति से शादी करना चाहती है, इसलिए मुझपर झूठे आरोप लगा रही है (ताकि अदालत द्वारा उसे एकतरफा तलाक मिल जाए) यहाँ ये भी प्रश्न उठता है कि यदि वो स्त्री सचमुच पति द्वारा पिटाई से पीड़ित थी, तो पति के नपुंसक होने का झूठ क्यों बोला, पति द्वारा क्रूरता के आधार पर वो आसानी से खुला ले सकती थी क्योंकि कुरान 4:128 और 2:229 मे ये व्यवस्था है कि यदि पति से स्त्री को हानि पहुंचने का भय हो तो वो तलाक (खुला) ले सकती है ॥ पर उस स्त्री ने नबी सल्ल. के सम्मुख ये बात नहीं उठाई, इससे तो यही सिद्ध होता है कि पति द्वारा अत्याचार करने का उसका आरोप भी उसी तरह झूठ था जैसे पति के नपुंसक होने का आरोप झूठ था .... उस स्त्री की मंशा जानकर नबी सल्ल. ने उस स्त्री को ये समझाया कि यदि वो इस प्रकार बिना सम्बन्ध बनाए दूसरे पति से खुला ले भी लेगी, तो भी पहले पति से दोबारा विवाह करना उसके लिए वैध नहीं होगा जब तक वो किसी अन्य पुरुष से सम्बन्ध बनाने के बाद तलाक नहीं ले लेती ... इस वैधानिक सलाह को गलत अर्थ मे लेकर ये आरोप लगा दिया गया कि नबी सल्ल. ने उस स्त्री को घर लौटकर अपने पति की शारीरिक इच्छा पूर्ति करने का आदेश दिया, अब क्योंकि इस हदीस मे मारपीट के विषय मे पति पत्नी ने कोई बात ही न की इसलिए ये कहना कतई न्यायोचित नहीं होगा कि नबी सल्ल. ने मुस्लिम पतियों को अपनी पत्नियों को पीटने की शिक्षा दी है..... पत्नी को पीटने के विषय मे नबी सल्ल. ने क्या फरमाया है वो आप अनेकों हदीसों मे पढ़ सकते हैं कि नबी सल्ल. ने मुस्लिमों को स्पष्टत: हुक्म दिया अपनी पत्नियों को पिटाई न करो (सुनन अबू दाऊद, किताब-11, हदीस-2137, 2138 और 2139 ) 3• मुस्लिम 9/3506, "नबी को प्रसन्न करने के लिए हज़रत अबूबक्र रज़ि. और उमर रज़ि. ने अपनी पुत्रियों (नबी सल्ल. की पत्नियों ) को थप्पड़ मारे, जिसपर नबी सल्ल. हंसे ॥" उत्तर - इसी हदीस मे लिखा है कि ये एक स्वांग था न कि कोई गम्भीर विवाद, नबी सल्ल. अपनी पत्नियों के साथ उदास बैठे थे अत: जब वहाँ हज़रत अबूबक्र और हज़रत उमर रज़ि. पहुंचे तो माहौल को बोझिल देखकर हज़रत उमर ने मज़ाक करने की सोची और इस मज़ाक मे हज़रत अबूबक्र भी शामिल हो गए, और अपनी बेटियों को चपत लगाने का केवल नाटक किया, ऐसी हंसी मज़ाक को वाइफ बीटिंग को अनुमति कोई कैसे समझ सकता है ?? 4 और 5• अबू दाऊद 11/2141 मे नबी सल्ल. ने पत्नियों को पीटने की अनुमति दी और अबू दाऊद 11/2142 के अनुसार हजरत उमर रज़ि. ने फरमाया कि नबी सल्ल. ने फरमाया कि एक पति से इस बात का प्रश्न नहीं किया जाएगा कि उसे अपनी पत्नी को क्यों पीटा " उत्तर - अबू दाऊद 11/2141 मे लिखा है कि नबी सल्ल. मुस्लिमो से फरमाते थे कि अल्लाह की भक्तों (पत्नियों) को न पीटो, इस पर हज़रत उमर रज़ि. ने आशंका व्यक्त की कि यदि इस तरह स्त्रियों को अपने पतियों से सख्त व्यवहार का बिल्कुल भी भय नहीं रह जाएगा तो वे बहुत से अनैतिक कार्य करने से भी नहीं डरेंगी तब अति गम्भीर मामलों यथा व्यभिचारोन्मत्त ता आदि के मामलों मे परिवार टूटने से बचाने को नबी सल्ल. ने पति को थोड़ा सख्त व्यवहार अपनाने की अनुमति दी है, और अबू दाऊद शरीफ़ 11/2142 मे हज़रत उमर का बयान भी इसकी पिछली हदीस यानी 11/2141 के परिप्रेक्ष्य मे ही है कि व्यभिचार आदि के गम्भीर मामले मे यदि पति पत्नी पर हलका दण्ड देने को हाथ उठाएगा तो इस कारण पति पर पाप नहीं होगा ... लेकिन कुरान 4:34 की अनुमति के अतिरिक्त यदि पति अकारण ही पत्नी को पीटेगा, या छोटी मोटी गलतियों पर पत्नी को प्रताड़ित करेगा तो जरूर ही गम्भीर दण्ड का भागी होगा, ये बात कुरान और अन्य हदीसों से भली भांति स्पष्ट है ॥ 6• अबू दाऊद 11/2126 "एक पति को अपनी पत्नी को छड़ी से मारने का आदेश नबी सल्ल. ने दिया, क्योंकि वो स्त्री विवाह के पहले ही गर्भवती थी किसी और पुरुष से " उत्तर - इस हदीस मे स्पष्टत: पता चलता है कि उस स्त्री को व्यभिचार का दण्ड दिया जाने का आदेश था, न कि घरेलू हिंसा का आदेश ॥ शरीयत मे विवाह पूर्व व्यभिचार मे लिप्त पाए जाने वाले स्त्री पुरूषों को सार्वजनिक तौर पर 100 कोड़े मारने का दण्ड इसलिए निर्धारित है ताकि समाज मे अव्यवस्था न फैले लेकिन इसी हदीस मे उस व्यभिचारी स्त्री को तन्हाई मे दण्डित करने और उसे व उसकी होने वाली सन्तान को पाल लेने का आदेश नबी सल्ल. ने देकर समाज मे उस स्त्री की मर्यादा भी रख ली और उसे सम्मान से जीने का अधिकार भी दिला दिया... ज़रा सोचकर बताईए कौन से समाज के पुरुष अपनी सुहागरात मे दुल्हन को गर्भवती पाकर उसे छोड़ने की बजाय उसे अपना लेने लायक दिल बड़ा कर सकते हैं ?? शायद ही कोई ॥ सार यही निकल कर आता है कि हदीस मे भी पुरुष को कहीं भी अपनी पत्नी की पिटाई करने की अनुमति नही है, और यदि कहीं व्यभिचार आदि जैसे गम्भीर मामले मे पति को थोड़े सख्त व्यवहार की अनुमति है तो वो हिंसा के लिए नहीं बल्कि परिवार को टूटने से बचाने को है, परंतु सामान्यतः पति को बर्दाश्त कर लेने और पत्नी से भला व्यवहार करने की ही शिक्षा दी गई है !!

इस्लाम को बदनाम करने के लिए फेलाई जा रही गलत हदीश की समीक्षा पार्ट -1(औरत की पिटाई का हुक्म)

बहुत से मुस्लिम और गैरमुस्लिम लोगों का ख्याल है कि बीवी को काबू मे रखने के लिए और उससे अपनी जायज़ नाजायज बातें मनवाने के लिए बीवी की पिटाई करने का हक मुस्लिम पुरूषों को कुरान ने दिया है ... लेकिन ये ख्याल रखना कुरान पर एक बड़ा झूठ बांधना है ... 

छोटी मोटी बातों पर बीवी पर हाथ उठाने की इजाज़त कुरान पाक कतई नहीं देता, बल्कि ऐसे मौकों पर अपने आप पर काबू रखने का हुक्म ही कुरान और हदीस ने शौहर को दिया है क्योंकि जैव वैज्ञानिक आधार पर हर पुरुष की बनावट स्त्री के मुकाबले अधिक शक्तिशाली व स्वभाव आक्रामक रहता है, इस बात को ध्यान मे रखते हुए कि अन्य पुरूषों की तरह मुस्लिम पुरुष भी अपनी स्त्रियों पर अत्याचार और हिंसा न करने लगें, अल्लाह ने बड़ी ज़िम्मेदारी मुस्लिम पुरूषों को सौंपी कि वे अपनी पत्नी की नापसन्दीदा बातों को अनदेखा कर दें, और अपनी पत्नी से भला व्यवहार करते रहें पवित्र कुरान मे अल्लाह का फरमान है कि ... 

"अपनी पत्नी के साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। और यदि वो तुम्हें पसन्द न हों, तो सम्भव है कि एक चीज़ तुम्हें पसन्द न हो लेकिन दूसरी ओर अल्लाह ने उसमें बहुत कुछ भलाई रखी होगी," (सुरा 4 आयत 19) 

इसी तरह आप स. की ये हदीस शरीफ हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है, नबी (सल्ल0) ने फरमाया, 
"अपनी औरतों के साथ भला सुलूक किया करो, इसलिये कि औरतें पसली से पैदा की गई हैं और पसली टेढ़ी होती है, अगर तुम पसली सीधी करना चाहोगे तो वह टूट जायेगी और अगर उसी तरह छोड़ दोगे तो वो टेढ़ी ही रहेगी, तो तुम औरत को जैसी वो है वैसी ही रखकर उससे काम ले सकते हो, इसलिए औरत के साथ अच्छा व्यवहार किया करो" [ बुखारी शरीफ किताब 55, नम्बर 548: और बुखारी, किताब 62: नम्बर 113 ] 

अक्सर स्त्रियों पर इसी कारण से तो अत्याचार हो जाते हैं कि मर्द खुद को औरत का मालिक समझकर, अपनी पत्नी की अस्ल शख्सियत और उसकी पसंद नापसन्द को दबाकर उसको अपनी मर्ज़ी का गुलाम बनाकर जीना चाहता है .... 
लेकिन प्यारे नबी स. ने मुसलमानों को अपनी बीवियों के साथ ये ज़ुल्म करने से रोक दिया है.. आप स. ने फरमाया कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारी गुलाम नहीं बल्कि तुम्हारी पार्टनर हैं ... 
अल्लाह ने कुरान पाक मे फरमाया कि अपनी पत्नियों को नुकसान पहुंचाने की बात मत सोचा करो (2:231) और आप सल्ल. ने पत्नियों के अधिकारों का वर्णन करते हुए हुक्म दिया अपनी पत्नियों को पिटाई न करो (सुनन अबू दाऊद, किताब-11, हदीस-2137, 2138 और 2139 ) 
तो ज़ाहिर है बीवी पर मालिकाना जताने, बीवी को दबाने या बात न मानने पर उस को पीटना इस्लाम मे तो हरगिज़ नहीं इस्लाम ने मुस्लिम पत्नियों को अन्यायपूर्ण मारपीट से बचा लिया है, लेकिन समाज मे ऐसे भी बहुत से केस ऐसे भी देखने मे आते हैं कि पति तो सज्जन होता है, पर पत्नी ही अपनी अनुचित महत्वाकांक्षाओं के चलते पति को परेशान करती रहती है, ऐसे मे अपनी जैविक बनावट के चलते शरीफ़ से शरीफ़ पति का हाथ भी स्त्री पर उठ सकता है, अत: स्त्रियों को भी इतना समझदार होना चाहिए कि यदि पति उनकी कुछ कमियों को नजरअंदाज करता है, तो वे भी पति को किसी मामूली बात के लिए अकारण उत्तेजित न करें, चूंकि विवाह संस्था को एकतरफा प्रयास नहीं बल्कि आपसी समझदारी ही सफल बनाती है 
पवित्र कुरान 4:34 मे भी पत्नी द्वारा ऐसा ही एक बेहद गलत और अनुचित कदम उठाने की दुर्लभ और एकमात्र परिस्थिति यानि पर-पुरूष गमन मे उसे दण्ड देने की अनुमति पति को है .. 
एवं इस मामले के अतिरिक्त किसी मामले मे स्त्री पर हाथ उठाने को इस्लाम से कतई नही जोड़ा जा सकता याद रखिए पर पुरुष गमन/व्यभिचार वही परिस्थिति है जिसके केवल संदेह मे पत्नी को जिन्दा जला देना, पत्नी की हत्या कर डालना, पत्नी का परित्याग कर डालना कई धर्मों के अनुसार आदर्श व्यवहार था ... 

मुस्लिम पुरूष ऐसा होता अनुभव करे, तो उसे क्या आदेश दिया गया है वो यहाँ देखिए : 
"पति पत्नियों के रक्षक और भरण-पोषण करने वाले है, क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ के मुक़ाबले में आगे रखा है, और इसलिए भी कि पतियों ने (पत्नियों के भरण-पोषण पर) अपने माल ख़र्च किए है, तो नेक पत्ऩियाँ तो आज्ञापालन करनेवाली होती है और गुप्त बातों की रक्षा करती है, क्योंकि अल्लाह ने उनकी रक्षा की है। और जो पत्नियों ऐसी हो जिनके सीमा पार करने का तुम्हें भय हो, उन्हें समझाओ और बिस्तरों में उन्हें अकेली छोड़ दो और (अति आवश्यक हो तो) उन्हें दण्ड दो। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानने लगे, तो उनके विरुद्ध कोई रास्ता न ढूढ़ो। अल्लाह सबसे उच्च, सबसे बड़ा है ॥" (4:34) 

इस आयत मे पत्नियों से गुप्त बातों (सतीत्व) की रक्षा करने की अपेक्षा का ज़िक्र फिर किसी स्त्री द्वारा सीमा पार करने की आशंका पर सुधारात्मक कदम उठाने की बात से ये स्पष्ट है, कि पति द्वारा पत्नी को हलका दण्ड देने की अनुमति सिर्फ और सिर्फ बेहद गम्भीर परिस्थिति मे तब है जब पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ व्यभिचारोन्मत्त हो रही हो ... 
और उसे बातचीत से, और फिर नाराजगी दिखाकर बात समझाने के उपाय विफल हो चुके हों ... 
तब इसलिए कि परिवार टूटने से, व स्त्री शरीयत द्वारा नियत वैवाहिक व्यभिचार के मृत्युदण्ड से बच जाए, पति को अनुमति है कि वो अपनी पत्नी को हलका दण्ड दे सकता है ... 
और ये दण्ड देते समय उसे ध्यान रखना है कि पत्नी को चोट न लगे बल्कि पत्नी केवल शर्मिन्दा हो और क्योंकि अल्लाह का फरमान है कि पति और पत्नी एक दूसरे का लिबास हैं, यानी एक लिबास की ही तरह उन पर एक दूसरे की शर्म छिपाने और इज़्ज़त रखने की ज़िम्मेदारी है , इसलिए ये दण्ड इस बात की आखिरी कोशिश के रूप मे दिया जाए, कि शायद इसके बाद पत्नी मामले की गम्भीरता को समझे, और व्यभिचार से खुद को रोक ले, और इस बात और दण्ड की जानकारी पति पत्नी के अतिरिक्त किसी और को न हो, किसी तीसरे को इस अपमानित करने वाली बात का पता न चले और पत्नी का सम्मान समाज मे बना रह जाए ॥ 

वैसे मारने के लिए जो शब्द "इदरिबुहूना" इस आयत मे आया है , इस शब्द का रूट "द,र,ब" है और इसका एक और अर्थ होता है, "छोड़ना".... 
अत: कुछ विद्वानों का मत ये भी है कि इस आयत मे पत्नी पर हाथ उठाने की बात नही बल्कि सुधारात्मक उपाय के तौर पर पत्नी को अपने से अलग कर देना है .... खैर, हम इदरिबुहूना का अर्थ शारीरिक दण्ड भी लें तब भी मुझे कोई समस्या नजर नहीं आती, चूंकि मामला व्यभिचार की ओर बढ़ने का है, जिसकी सख्ती से रोकथाम न की जाए और विवाहित स्त्री या पुरुष कोई भी व्यभिचार कर बैठे तो वो शरीयत के अनुसार मौत की सजा के अधिकारी हो जाएंगे, 
अत: अपने प्रिय की जान बचाने को थोड़ा सख्त कदम उठाना भी गलत नहीं माना जा सकता सोशल मीडिया पर अक्सर कुछ ऐसे फोटो देखता हूँ कि खुली सड़क पर एक तथाकथित मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को पीट रहा है, इस फोटो को इस्लामी कानून की परिणति बता कर इस्लाम को अपमानित किया जाता है, 
जबकि वो फोटो इस्लामी शिक्षा का खुला उल्लंघन है, क्योंकि वो आदमी अपनी पत्नी की इज़्ज़त नहीं रख रहा बल्कि सरे बाजार अपनी पत्नी का अपमान कर रहा है इसी तरह कुछ बुरी तरह लहूलुहान स्त्रियों के फोटो डालकर ये दावा किया जाता है कि इन स्त्रियों को इनके पतियों ने शरीयत के अनुसार पीटकर अधमरा कर डाला है, .... ... 
ये भी इस्लाम पर निराधार आरोप है क्योंकि कुरान सिर्फ एक बेहद गम्भीर और अपमानजनक परिस्थिति मे ही पत्नी को दण्ड और वो भी गम्भीर दण्ड नहीं बल्कि ऐसा दण्ड देने की अनुमति देता है, जैसे एक मां अपने जिद्दी बच्चे को आग से खेलने से रोकने के लिए मारती है, ये ध्यान मे रखते हुए कि बच्चे को चोट न लगे, बस वो मलाल मे आकर खतरे वाले काम से खुद को रोक ले ... 
उसी तरह प्रेमी पति से भी अपेक्षा है कि वो अपनी स्त्री को तबाह होने से बचाने को थोड़ी सख्ती दिखाएगा, जैसे मां की मार हिंसा नहीं कहलाती, वैसे ही 4:34 की अनुमति भी हिंसा नहीं है याद रखिए ये किसी तरह की जबर्दस्ती नहीं, बल्कि केवल एक पाप, व्यभिचार यानी पत्नी पति के साथ रहना चाहते हुए किसी और पुरुष से भी अनुचित सम्बन्ध बनाना चाहे, 
इस स्थिति को खत्म करने का एक विकल्प है, पर यदि ऐसा हो कि स्त्री की अपने वर्तमान पति के साथ निभ न रही हो और वो किसी दूसरे पुरुष से विवाह करना चाहती हो, तो वो पत्नी न्यायिक आधार पर मेहर लौटाकर खुला लेने को पूरी तरह स्वतंत्र है, और यदि ये स्थिति आए तो एक समर्पित मुस्लिम से ऐसे मामले, या और किसी भी मामले मे ये अपेक्षा नहीं है कि वो अपनी पत्नी को जरा भी पीड़ा दे, ...