जब यूरोपियन देशो ने मुस्लिम इलाक़ो पे चढ़ाई शुरू की तो
उनका मुकाबला करने के लिये कुछ ऐसी शेर दिल
शख्सियात सामने आई जिन्होने न सिर्फ़ मुसलमानो की
कीयादत और उन्हे अपनी विरासत
की तरफ लौटने का पैगाम दिया बल्कि अंग्रेज़ो के सामने वो
चैलेंज पेश किया की खुद अँग्रेज़ उनकी
बहादुरी के सामने घुटने टेक दिये तो साथ मे उनके सामने
हुस्न-ए-अख़लाक़ का वो नमूना पेश किया की जो
अँग्रेज़ तारीख अब तक पेश करने मे नाकाम है जहाँ
हिंदोस्तान मे अंग्रेज़ो से लोहा लेने वालो मे टीपू सुल्तान
शहीद का नाम सबसे बुलंद मकाम पर है तो
वही शेखुल हिंद मौलाना महमूद-अल-हसन(रह.)
की ज़ात-ए-मुबारका भी है जिन्होने उस
समय मुल्क की कीयादत की
जब इस मुल्क मे कीयादत का आकाल पड़ गया था बल्कि
शेखुल हिंद मौलाना महमूद-अल-हसन(रह.) ने
मुज़ाहेदीन का वो लश्कर तय्यार कर दिया जिन्होने
अंग्रेज़ो का मुकाबला आखरी दम तक किया और अंग्रेज़ो
को मुल्क छोड़ने पे मजबूर किया ठीक इसी
तरह लीबिया मे अमीर उमर मुख़्तार
शहीद(रह.) ने इटली की
ज़ालिम होकूमत से मुकाबला और आज़ादी के लिये जद्द-
ओ-जहद की वो मिसाल कायम की आज
भी दुनिया मे ज़ालिमो के खिलाफ इन्क़िलाब मे उनके नाम-
ओ-तस्वीर की तख्तियो का इस्तेमाल करना
काबिल-ए-फख्र और काबिल-ए-रहनुमाई समझा जाता है
इन्ही शख्सियात मे से एक अज़ीम
मुजाहिद हैं अल्जीरिया के शैख़ अब्दुल क़ादिर अल
जेज़ायरी(रह.) और ये तस्वीर
उन्ही की है और मैं आज इनका
मुख़्तसार सा तारूफ़ पेश कर रहा हू ताकि हम अपने
माज़ी की कीयादत और
उनकी जुर्रत-ओ-बहादुरी को देख सके
और वैसा ही शौक पैदा करे इस उम्मत की
सरबुलंदी के लिये जद्द-ओ-जहद और
ज़ेहनी फ़िक्र का
शैख़ अब्दुल क़ादिर 1808 मे पैदा हुये और 21 की
उम्र मे हज करने मक्का गये और फिर जब वापस
अल्जीरिया आये तो वहाँ1830 मे फ्रांस ने
अल्जीरिया पे हमला कर वहाँ क़ब्ज़ा कर लिया था और
उस समय अल्जीरिया के ठीक
वही हालात थे जैसे हिंदोस्तान मे था यानी
की छोटी छोटी रियासते
थी जो आपस मे ही लड़ा
करती थी ठीक वैसे
ही अल्जीरिया मे मुसलमानो के
मुख्तलीफ कबीले थे जो एक दूसरे के
कट्टर दुश्मन थे और सिर्फ़ आपस मे ही लड़ा करते
थे और फ्रांस ने इसी का फ़ायदा उठा के हमला किया और
फ़ौरन बेगैर किसी परेशानी के
अल्जीरिया पे क़ब्ज़ा कर लिया था
शैख़ अब्दुल क़ादिर ने सभी कबीलो को
इकट्ठा किया और उनके आपसी एख्तिलाफात को ख़त्म
कर उन सभी को इस बात पे आमादा कर लिया
की वो सब मुत्तहीद हो कर फ्रांस के
खिलाफ लड़ेंगे और उन सब ने शैख़ अब्दुल क़ादिर को अपना
अमीर चुन लिया.....आप जानते है की उस
समय उनकी उम्र क्या थी...???....जिस
उम्र मे हमारे यहाँ के नौजवानो को इश्क-ओ-आशिकी
के भूत सवार होते है शादी और लड़कियो के
हसीन सपने आते है उस उम्र शैख़ अब्दुल क़ादिर ने
पूरे अल्जीरिया को फ्रांस के खिलाफ जद्द-ओ-जहद के
लिये एकजुट कर लिया था जब उन्हे फ्रांस के खिलाफ जिहाद के लिये
अल्जीरिया की अवाम द्वारा
अमीर चुना गया उस वक़्त उनकी उम्र
सिर्फ़ 25 साल थी
शैख़ अब्दुल क़ादिर ने सबसे पहले एक मस्जिद से फ्रांस के
खिलाफ जिहाद का एलान कर फ्रांस की ताक़त से टकरा
गये उस समय उनके पास कोई आर्थिक और न ही
सैन्य मदद हासिल थी बस वो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त
के भरोसे फ्रांस से टकरा गये और जल्द ही फ्रांस को
उन्होने शिकस्त देनी शुरू की और सिर्फ़
7 साल के अंदर अल्जीरिया के एक तिहाई से अधिक
हिस्से को फ्रांस से आज़ाद करा लिया और जो उन्होने इलाक़ा फ़तेह
किया वहाँ इस्लामिक शरीयत नाफीज़ कर
उसे दारूल इस्लाम घोषित कर दिया लेकिन फ्रांस ने अपनी
पूरी ताक़त वहाँ झोंक दी और बिल आख़िर
ये मर्दे मुजाहिद 1849 मे जा कर गिरफ्तार हुआ और फिर उन्हे
नज़रबंद कर दिया गया और फिर बाद मे इन्हे रिहा कर दिया गया और
बाद मे ये दमिश्क(आज के सिरिया की
राजधानी) चले गये और जब 1860 मे माउंट लेबनान
सिविल वॉर छिड़ी और ड्रूज़ और ईसाइयो के
बीच जंग छिड़ी तो इन्होने
अपनी जान पर खेल कर हज़ारो ईसाइयो की
जान बचाई और उन्हे पनाह दी ध्यान रहे
की ड्रूज़ एक इस्लाम से खारिज फिरका है ये शियो के
इस्मायली फिरके से निकले थे.......
जिस शख्स के मुल्क के उपर एक ईसाई देश फ्रांस ने हमला किया
और शख्स के खानदान व मुल्क को तबाह-ओ-बर्बाद कर दिया और
जिनके खिलाफ उन्होने अपनी पूरी
ज़िंदगी जद्द-ओ-जहद की लेकिन जब
उस धर्म के लोगो पे कही ज़ुल्म हुआ तो ये शख्स
चट्टान की तरह ढाल बन गया और उनकी
ज़िंदगी के लिये अपनो से दुश्मनी मोल
ली जिस धर्म के लोगो ने उस मर्दे मुजाहिद को अपना
मुल्क छोड़ने पे मजबूर कर दिया वही शख्स दूसरे
मुल्क मे जा कर उस धर्म के खिलाफ उठने वाली तलवारो
को अपने सिने पे ले कर उनकी हिफ़ाज़त करता
है....आज वही सिरिया है जहाँ पे शैख़ अब्दुल
क़ादिर ने ईसाइयो के लिये लड़े और उनकी हिफ़ाज़त
की और उस समय आज का ही फ्रांस है
जिसने उनके मुल्क पे हमला कर उन्हे मुल्क छोड़ने पे मजबूर कर
दिया था.......हमने तो तारीख वो मिसाल पेश
की है की मेरा दावा है की
दुनिया कभी भी ऐसी मिसाल पेश
नही कर सकती आज भी
सिरिया है और आज भी फ्रांस है और
वही फ्रांस सिरिया मे बम की बारिश कर
रहा है जहाँ के लोगो ने ईसाइयो के तहफ्फुज़ के लिये
अपनी खून की दरिया बहा दिये और
आज.......अफ़सोस कोई शैख़ अब्दुल क़ादिर(रह.) की
मिसाल पेश न कर सका.....आज जब अपने चंद शहरियो
की मौत पे सिरिया मे मासूम बच्चो के उपर बम
की बारिश कर दी जाती हो और
हमसे शांति की मिसाले माँगी
जाती हो तो ऐसे समय मे शैख़ अब्दुल क़ादिर
की मिसाल पूरे दुनिया के सिर्फ़ चेहरे ही
नही बल्कि ज़हन पे तमाचा है और
उनकी जैइस मिसाल न पेश करने का जुर्म
भी
Monday, 14 December 2015
युरोपियन देशो के जुल्म पर मुसलमानों का असल जिहाद और कुरबानी .@
Sunday, 13 December 2015
क्या इस्लाम के अनुसार गैर मुस्लिम जहन्नम में और मुस्लिम जन्नत में जायेगा ..?
बहुत से मुस्लिमों और उन मुस्लिमों के कारण गैर मुस्लिमों के
बीच मे ये गलत विश्वास फैला हुआ है कि एक
मुस्लिम व्यक्ति सिर्फ मुस्लिम घराने मे पैदा होने भर से जन्नत का
अधिकारी हो जाता है जबकि एक गैर मुस्लिम व्यक्ति
चाहे कितना भी भला क्यों न हो वो दोजख मे
ही जाएगा ....॥
....सबसे पहले तो ये बात जान लें कि बिना अच्छे कर्मो के मुस्लिम
घर मे पैदा हुआ व्यक्ति भी दोज़ख से बच
नहीं सकेगा , पूरी कुरान पाक
की शिक्षा का सार यही है कि अल्लाह
का बंदा अल्लाह का आज्ञाकारी बने और अल्लाह के
आदेश मानकर हमेशा अच्छे और भलाई के काम करता रहे, पर यदि
वो व्यक्ति अल्लाह की आज्ञाओं का तिरस्कार कर के
अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए,
अल्लाह द्वारा अवैध ठहराए गए कर्म करता रहे तो फिर ये
व्यक्ति भी नरक से बच नहीं सकता
अब रही बात हर गैरमुस्लिम के दोज़खी
होने की..... तो ध्यान रहे कि किसी
भी विश्वास को बनाने से पहले एक मुस्लिम को इस बात
का गहन अध्ययन कर लेना चाहिए कि इस विषय मे कुरआन क्या
कहता है ....
देखें कुरान अध्याय 2 एवं अध्याय 5 । यहाँ ऐसी कुछ
बातें बयान की गई हैं जोकि इस्लाम के पैगाम का सार है
जो समस्त पैगंबरों ने हर दौर के लोगो को दिया है !! कुरान ने ये मूल
सिद्धान्त दो जगह बयान किए है ।
सूरह बकरह अध्याय 2 , आयत नंबर 62 में अल्लाह ताला
फरमाते है : "निस्संदेह, जो लोग ईमान वाले हुए और जो लोग
यहूदी हुए और नासारा (ईसाई) और साबि , उनमे से जो
व्यक्ति ईमान लाया अल्लाह पर और आखिरत (परलोक) के दिन पर
और उसने भले कर्म किए तो उसके लिए उसके पालनहार के पास
(अच्छा) बदला है । और उनके लिए न कोई भय है और न वह
दुखी होंगे। "
बिलकुल यही सिद्धान्त सूरह माइदाह सूरह नंबर 5
एवं आयत नंबर 69 मे भी बयान हुआ है कि चाहे
कोई शख़्स मुसलमान हो या यहूदी हो या ईसाई हो या
साबी या फिर कोई दूसरे धर्म का । आखिरत मे फैसला
तीन बुनियाद पर होगा:
•> एकेश्वरवाद पर ईमान ।
•> परलोक (आखिरत के दिन) पर ईमान ।
•> और अच्छे कर्म करते रहना ।
ये सारी चीज़े हर मनुष्य के लिए लोक और
परलोक मे सफल होने के लिए ज़रूरी है। और इन
शर्तों को पूरा करने वाला हर शख्स, चाहे वो किसी
भी धर्म का हो अल्लाह उन्हें दण्डित
नहीं करेगा.... वैसे देखा जाए तो ये तीनों
उसूल इंसान की मूल प्रवत्ति मे मौजूद हैं और अक़ल
भी इन्ही बातों की तरफ इशारे
करती है , कि हमें सदा अच्छे, सबकी
भलाई के काम करने चाहिए, और ये, कि इस दुनिया के रचयिता का
आंख से ओझल एक अस्तित्व कहीं न
कहीं तो मौजूद है, और ये कि हमारे शरीर
की मौत के बावजूद हमारा अस्तित्व बाकी
बचा रह जाने की सम्भावना है, जिस अस्तित्व के साथ
हम एक और जीवन जियेन्गे ॥
खैर इन सब बातों के साथ ही ये भी अक़ल
का तक़ाज़ा है कि अगर किसी ऐसे शख्स के पास खुदा
के रसूल का पैगाम पहुंचता है और वो ये जान लेता है
की ये पैगाम बिलकुल सही है लेकिन
हठधर्मी की बुनियाद पर उसे मानने से
इंकार कर देता है तो ऐसे शख्स के लिए भी हमेशा
की जहन्नम की चेतावनी है
। ये ऐसा जुर्म है जिसका बयान कुरान पाक की बहूत
सी आयतों मे आया है, और जो भी ये जुर्म
करेगा चाहे वो साबि हो या यहूदी, या ईसाई या कोई और
पंथ वाला या चाहे वो मुस्लिम घराने मे पैदा हुआ कोई शख्स
ही क्यों न हो, उसे अपने इन कामो के लिए दण्ड
भोगना पड़ेगा.... यानि हर एक नबी की
उम्मत और आज के समय के मुस्लिमों को इन उपरोक्त
तीन मूल नियमों के साथ ही साथ अपने
नबी की शिक्षाओं का पालन करना
भी आवश्यक है, और ऐसा न किया जाने पर व्यक्ति
अपराधी ठहरेगा
अब रहा ऐसा शख्स जिसने किसी रसूल या
नबी का पैगाम सुना ही नहीं
या अगर सुना भी है तो उस तक गलत
जानकारी पहुंची है (जैसे कि आज के दौर
मे हम देख सकते है कि नबी सल्ल. और इस्लाम के
बारे मे बहुत ही गलत और भ्रामक बातें फैलाकर लोगों
को इस्लाम से दूर रखने की कोशिशें की
जाती हैं, और इन गलत जानकारियों के कारण
ही बहुत से गैर मुस्लिम लोग इस्लाम से नफरत करने
लगते हैं, और ये लोग हमेशा गलतफहमी मे
ही रहते हैं, सिवाय तब के, जब कोई जानकार मुस्लिम
उसे सच्चाई न बता दे, या अल्लाह पाक कोई और अन्य बहाना न
बना दे, उस व्यक्ति को सच्चाई बताने का ) तो ऐसे शख्स के लिए
ऊपर बयान किए हुए 3 सिद्धांत की बुनियाद पर फैसला
होगा।
एक बात और ध्यान मे रखिए कि अल्लाह पाक कभी
निर्दोष और ईश्वरीय संदेश से अनभिज्ञ लोगों को
दण्डित नहीं करते, और ये बात अल्लाह ताला कुरान
(सूरह 17 आयत 15) मे खोलकर फरमाते है कि, : "हम लोगो को
यातना नहीं देते जब तक कोई रसूल न भेज दे "।
चुनांचे इस्लामी विद्वान इमाम ग़ज़ाली ने पांचवें
सदी में ये राय ज़ाहिर की थी कि
ग़ैर मुस्लिमों का एक गिरोह तो यक़ीनन रसूल अल्लाह
सल्ल अल्लाह अलैहि वसल्लम की नबुव्वत
की हक़्क़ानियत (सत्यवादिता) से पूरी
तरह वाक़िफ़ है और इस के इनकार के नतीजे में ख़ुदा
के अज़ाब का पात्र ठहरेगा, लेकिन वो ग़ैर मुस्लिम जिन्हों ने सिरे से
रसूल अल्लाह सल्ल अल्लाह अलैहि वसल्लम का नाम
ही नहीं सुना या नाम तो सुना है, लेकिन
आप की नबवी हैसियत और पैग़ंबराना
कमालात व औसाफ़ ( ईशदूत होने के कारण मिले चमत्कार एवं
विशेषताओं ) से परिचित नहीं हैं , उन के बारे में
यही उम्मीद है कि वो रहमत
इलाही (ईश्वर की दया) के दायरे में शामिल
हो कर नजात (मुक्ति) पा जाऐंगे।
.... इस विश्वास की बुनियाद सम्भवत: अल-अस्वद
बिन सरीअ़ की ये हदीस है
यहाँ उन लोगों का जिक्र है जिन तक किसी रसूल का
संदेश उनके जीवन मे नहीं पहुंच पाया था,
हदीस है कि अल्लाह के नबी
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "चार (गैरमुस्लिम) लोग
क़ियामत के दिन बहस करेंगे, (यानि उनके पास एक वैध कारण होगा
खुद को निर्दोष साबित करने के लिए ) एक बहरा आदमी
जो कुछ नहीं सुनता, एक बेवक़ूफ आदमी,
और एक बूढ़ा आदमी और एक वह
आदमी जो दो पैगंबरों के बीच
की अवधि में मर गया हो। बहरा आदमी
कहेगा कि मेरे रब इस्लाम इस हाल में आया कि मैं कुछ सुनता
ही नहीं था। बेवक़ूफ आदमी
कहेगा कि इस्लाम इस हाल में आया कि बच्चे मुझे
मेंगनी से मारते थे, और बूढ़ा आदमी कहेगा
कि मेरे रब इस्लाम इस हाल में आया कि मैं कुछ समझता बूझता
ही नहीं था, और दो नबियों के
बीच की अवधि में मरने वाला
आदमी कहेगा कि मेरे रब मेरे पास तेरा कोई सन्देष्टा
नहीं आया। तो अल्लाह तआला उस समय इन लोगों
की एक परीक्षा लेगा, और जो व्यक्ति उस
समय भी अल्लाह के आगे हठधर्मी
दिखाकर अल्लाह की आज्ञा नहीं मानेगा
वो नरक मे जाएगा, और जो गैरमुस्लिम व्यक्ति उस समय अल्लाह
की आज्ञा मान लेगा वो जन्नत मे भेज दिया जाएगा ....
इसे इमाम अहमद और इब्ने हिब्बान ने रिवायत किया है, और
अल्बानी ने सहीहुल जामिअ़
हदीस संख्या : 881 के अंतर्गत
सहीह कहा है।
और देखिए... कुरान पाक मे ये स्पष्ट लिखा हुआ है कि कयामत
मे, यानि न्याय के दिन कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति
का "बोझ" नही उठाएगा, यानि कोई भी
व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के पाप का दण्ड
नहीं पाएगा, बल्कि सबको अपने अपने किए का दण्ड
भरना होगा .... तो आप समझ सकते हैं कि कुरान मे जहाँ जहाँ
नरक मे जाने वाले पापियों के समूहों का जिक्र है, तो वहाँ इन समूहों
का प्रत्येक व्यक्ति, वैयक्तिक रूप से इस बात का दोषी
है कि उस पर सत्य पूरी तरह प्रकट हुआ लेकिन
फिर भी हटधर्मी के चलते वो
अत्याचारी बना रहा, इन समूहों मे एक भी
व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसपर सत्य पूरी
तरह प्रकट न हो पाया हो, और केवल अनभिज्ञता के कारण
उसने ईश्वर का सत्य न स्वीकारा हो .... देखिए, कुरान
मे ये बात भली भांति स्पष्ट है, अल्लाह तआला का
फरमान है :
"जब कभी उस (नरक) में कोई गिरोह डाला जायेगा उस
से नरक के दरोगा पूछेंगे कि क्या तुम्हारे पास कोई डराने वाला
नहीं आया था? वे जवाब देंगे कि बेशक आया तो था,
लेकिन हम ने उसे झुठलाया और कहा कि अल्लाह ने कुछ
भी नाज़िल नहीं किया, तुम बहुत
बड़ी गुमराही में ही
हो।" (सूरतुल मुल्क : 8-9)
और देखिए :
"और काफिरों के झुण्ड के झुंड नरक की तरफ हाँके
जायेंगे, जब वे उसके क़रीब पहुँच जायेंगे, उसके दरवाज़े
उनके लिए खोल दिये जायेंगे और वहाँ के रक्षक उन से पूछेंगे कि
क्या तुम्हारे पास तुम में से रसूल नहीं आये थे? जो
तुम पर तुम्हारे रब की आयतें पढ़ते थे और तुम्हें
इस दिन के भेंट से सावधान करते थे, ये जवाब देंगे कि हाँ, क्यों
नहीं, लेकिन अज़ाब का हुक्म काफिरों पर साबित हो
गया।" (सूरतुज़्ज़ुमर : 71)
अत: हर वह व्यक्ति जिसे उचित ढंग से इस्लाम की
दावत
पहुँच चुकी है उस पर हुज्जत क़ायम हो
चुकी है, यानि उसके पास कोई बहाना नही
रहा कि वो सच को जान, व दिल से मान नही चुका था,
फिर भी वो अल्लाह और रसूल से शत्रुता करे, ऐसे
ही अपराधी को कयामत के दिन दण्ड का
अधिकारी ठहराया जायगा, और जो इस हाल में मरा है कि
उसे दावत नहीं पहुँची या अनुचित रूप से
पहुँची है तो उसका मामला अल्लाह के हवाले है,
वह अपनी सृष्टि को सर्वश्रेष्ठ जानता है और
अल्लाह किसी के साथ अन्याय या किसी पर
बिलकुल भी अत्याचार नहीं करता है, जैसा
कि अल्लाह का फरमान है सूरह 41 आयात 46 मे , "तुम्हारा
रब अपने बंदो पर तनिक भी ज़ुल्म नहीं
करता। "
तो ऐसे मे उम्मीद की जा
सकती है की अल्लाह ताला उसे उसके
सच से अनजान होने की बुनियाद पर माफ कर देंगे।
और अल्लाह बेहतर जानते है !
नबी सल्ल. के वालिदैन जन्नती होंगे या
नहीं, अक्सर ये सवाल इस गलतफहमी
मे पूछा जाता है कि इस्लाम के मुताबिक हर गैर मुस्लिम दोज़ख मे
जाएगा .... हालांकि ऐसा नहीं है और नबी
की विलादत से पहले के लोगों पर ये हुज्जत कायम
नहीं होती है इसलिए उनके अच्छे कर्मो
के आधार पर उनके जन्नत ही जाने की
ज्यादा उम्मीद होती है, सो पैगंबर सल्ल.
के वालिदैन के बारे मे भी है ....!!
लोग सवाल करते हैं कि नबी सल्ल. से पहले तो तमाम
अरब बुरी तरह बहुदेववाद के शिकार थे और
उन्हीं अरबों के बीच पैगंबर सल्ल. के
माता पिता भी रहते थे ..... यानि सवाल पूछने वालों के
ख्याल से नबी सल्ल. के वालिदैन भी
बहुदेववादी होंगे ....
लेकिन सच्चाई ये है कि उस दौर मे बहुदेववाद मे विश्वास करने वालों
के साथ ही एक अल्लाह को सबसे ज्यादा
प्रभुत्वशाली मानने, और इस नाते केवल अल्लाह
की पूजा करने वाले लोग भी मौजूद थे गौर
कीजिए, नबी सल्ल. के जन्म से कुछ दिन
पहले का एक मशहूर वाकया है अबाबीलों द्वारा काबा
की रक्षा का, उसको पढ़कर ये ज्ञात होता है कि
नबी सल्ल. के दादा हजरत मुत्तलिब
एकेश्वरवादी थे, इनकी अल्लाह मे भक्ति
इस बात से भी परिलक्षित होती है कि
इन्होंने अपने पुत्र (यानि नबी सल्ल. के पिता) का नाम
"अब्दुल्लाह" रखा था जिसका अर्थ है "एक सर्वशक्तिमान ईश्वर
का भक्त" ....
फिर नबूवत के ऐलान से पहले भी नबी
सल्ल. का रूझान एकेश्वरवादिता की ओर होना
भी ये संकेत देता है कि आप सल्ल. की
आनुवंशिकता एकेश्वर पर विश्वास की थी
... इन बातो से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि
नबी सल्ल. के पिता, माता और दादा
एकेश्वरवादी भी थे ...
सो हमें आप सल्ल. के वालिदैन के जन्नत मे भेजे जाने
की ही ज्यादा आशा और
उम्मीद है ...
Friday, 11 December 2015
निकाह,तलाक,हलाला पर गैर मुस्लिम की गलत सोच.@
निकाह,तलाक,हलाला :- (हिन्दू भाईयों के समझाने के लिए पोस्ट)
भारतीय संविधान ही नहीं
पूरी दुनिया के व्यवस्था की पड़ताल कर
लीजिए हर जगह यदि कुछ सुविधाएं दी
गई हैं तो उन सुविधाओं के गलत इस्तेमाल पर दंड का प्रावधान
भी किया गया है ।इसे चेक ऐंड बैलेंस कहते हैं कि
किसी नियम या अधिकार का कोई गलत फायदा ना उठा ले।
आज़ादी के पहले या बाद में मुसलमानों की
यह बहुत बड़ी नाकामयाबी
रही है कि वह इस देश में इस्लाम के
सही रूप को प्रस्तुत नहीं कर सके।
मौलवी मौलाना जितना चंदा वसूलने में अपना प्रयास दिखाते
हैं उसका एक 1% भी इस्लाम के सही
रूप को सामने लाने की कोशिश करते तो अन्य मजहब के
लोगों में इस्लाम के खिलाफ झूठा प्रचार कर पाना किसी के
लिए सभंव नहीं होता , सही रूप से
प्रस्तुत करने का अर्थ धर्मांतरण से नहीं बल्कि
इस्लाम में दी गई व्यवस्था को तर्क और व्यवहार
की कसौटी पर रख कर सभी
समाज के लोगों के सामने रखना कि यह व्यवस्था इस कारण से है
और आज के दौर में इसके यह फायदे हैं ।इसीलिये
इस्लाम धर्म और इसकी व्यवस्थाओं के बारे में
झूठी कहानी किस्से गढ़ कर संघ इस देश
के कुछ लोगों को इस्लाम के बारे में बरगलाने और हृदय में घृणा भरने
में सफल रहा ।
दरअसल इस लेख का कारण आज सुबह की पोस्ट पर
आए मित्र अभिषेक सारश्वत के एक कमेंट से है जिसमें उन्होंने
इस्लाम की एक व्यवस्था "हलाला" पर एक
टिप्पणी कुछ यूँ की " हलाला वो है जो
तलाक दी गई बीवी दूसरे
व्यक्ति से विवाह करके उसका बिस्तर गर्म करे और तब तक करे
जब तक कि उस नये पति का मन ना भर जाए और वह तलाक ना देदे
, और फिर उसके तलाक देने के बाद पहला पति उस महिला से
विवाह कर सकता है" ।ज़ाहिर सी बात है कि शब्द
बेहद गंदे हैं और यह देश में पनप चुकी एक
संस्कृति का उदाहरण मात्र ही है । तब सोचा कि
अपने हिन्दू मित्रों को इसकी व्याख्या करके हलाला का
अर्थ समझाऊँ , क्या पता संघी साहित्य पढ़ने के बाद
उनके मनमस्तिष्क में भी यही भ्रम हो ।
इस्लाम में विवाह की व्यवस्था भी
उसी "चेक ऐंड बैलेंस" के आधार पर है जहाँ निकाह
एक अनुबंध (एग्रीमेंट) होता है जिसमें लड़के और
लड़की की रजामंदी
ली जाती है , लड़की के बाप
को यह अधिकार है कि वह अपनी बेटी
के भविष्य की सुरक्षा के लिए कोई भी
"मेहर देन" निर्धारित कर सकता है , और इसकी
ज़रूरत भी इसी लिये है कि यदि निकाह
( एग्रीमेंट) टूटा तो मेहर उस लड़की के
भविष्य को सुरक्षित करेगा ।यह सब कुछ लिखित में होता है और
इसके दो गवाह और एक वकील होते हैं जो सामान्यतः
लड़की वालों की तरफ से रहते हैं जिससे
कि लड़की के साथ अन्याय ना हो , सब तय होने के
बाद सबसे पहले लड़की से निकाह पढ़ाने
की इजाज़त उन्ही वकील
और गवाहों के सामने ली जाती है और यदि
लड़की ने इजाजत देकर एग्रीमेंट पर
हस्ताक्षर कर दिया तब निकाह की प्रक्रिया आगे
बढ़ती है नहीं तो वहीं
समाप्त , सबकुछ सर्वप्रथम लड़की के निर्णय पर
ही आधारित होता है ।
लड़की की इजाज़त के बाद पूरे बारात और
महफिल में मेहर को एलान करके सभी शर्तों गवाहों
और वकील की उपस्थिति में निकाह पढाया
जाता है जो अब लड़के के उपर है कि वह कबूल करे या ना करे ,
यदि इन्कार कर दिया तो मामला खत्म परन्तु निकाह कबूल कर लिया तो
फिर उस एग्रीमेंट और पर वह हस्ताक्षर करता है
और सभी गवाह वकील और निकाह पढ़ाने
वाले मौलाना हस्ताक्षर करके एक एक प्रति दोनो पक्षों को दे देते
हैं और इस तरह निकाह की एक प्रक्रिया
पूरी होती है ।
ध्यान रहे की लड़की को मिलने वाला मेहर
तुरंत बिना विलंब के मिलना चाहिए और उस मेहर पर उसके पति का
भी अधिकार नहीं है , वह उस
लड़की की अपनी भविष्यनिधि
है।
निकाह के बाद जीवन में यदि ऐसी
परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं कि साथ जीवन
जीना मुश्किल है तो आपसी सहमति से
तलाक की प्रक्रिया अपनाई जाती है जो
तीन चरण में होती है , पहले तलाक के
बाद दोनों के घर वाले सुलह सपाटे का प्रयास करते हैं और जो कोई
भी समस्या हो उससे सुलझा कर वैवाहिक
जीवन सामान्य कर देते हैं , अक्सर मनमुटाव या कोई
कड़वाहट आगे के भविष्य की परेशानियों को देखकर दूर
हो ही जाती है और यदि
नहीं हुई और लगा कि अब जीवन साथ
संभव नहीं तो दूसरा तलाक दिया जाता है पर वह
भी दोनो की सहमति से ही ,
दूसरे तलाक के बाद गवाह वकील या समाज के अन्य
असरदार लोग बीच बचाव करते हैं और
जिसकी भी गलती हो मामले को
सामान्य बनाने की कोशिश करते हैं , अक्सर अंतिम
चेतावनी देखकर और बिछड़ने के डर से वैवाहिक जोड़े
गलतफहमी दूर कर लेते हैं या समझौता कर लेते हैं
और यदि सब सामान्य हो गया तो फिर से दोनो में निकाह
उसी प्रकिया के अनुसार होता है क्योंकि दो तलाक के
बाद निकाह कमज़ोर हो जाता है ।यदि सुलह समझौता
नहीं हुआ तो अंतिम और तीसरा तलाक
देकर संबंध समाप्त कर दिया जाता है ।इस तीन तलाक
की सीमा लगभग 2•5 महीने
होती है ।तलाक के बाद लड़की अपने माँ
बाप के यहाँ जाती है और इद्दत का तीन
महीना 10 दिन बिना किसी पर पुरुष के
सामने आए पूरा करती है, संघी साहित्य
इसे औरतों के ऊपर अत्याचार बताता है जबकि इसका आधार यह
है कि यदि वह लड़की या महिला गर्भ से है तो वह
शारीरिक रूप से स्पष्ट होकर समाज के सामने आ जाए
और ना उस महिला के चरित्र पर कोई उंगली उठाए ना
उसके नवजात शिशु के नाजायज़ होने पर । इद्दत की
अवधि पूरी होने के बाद वह लड़की अपना
जीवन अपने हिसाब से जीने के लिए
स्वतंत्र है ।
अब हलाला पर आते हैं , तलाक की प्रक्रिया
इतनी सुलझी हुई और समझौतों
की गुंजाइश समाप्त करते हुए है कि तलाक के बाद
पुनः विवाह की गुंजाइश नहीं
रहती क्युँकि बहुत कड़वाहट लेकर संबंध टूटते हैं।
एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते अलग होने
वाले तो पुनः विवाह का तो सोचना भी असंभव है।
एक और तरह का तलाक की संभावना
होती है , वह होती है
जल्दबाजी में या बिना सोचे समझे हवा हवाई
तरीके से दे देना या पति पत्नी
की छोटी मोटी लड़ाई में तलाक दे
देना , सामान्यतः ऐसी स्थिति में पति-पत्नी में
प्रेम और आपसी समझ तो होता है पर क्षणिक
आवेश में आकर पुरुष तलाक दे देते हैं , लोग ऐसा ना करें और इसे
ही रोकने के लिए "हलाला" की व्यवस्था
की गई है कि जब गलती का एहसास हो
तो समझो कि तुमने क्या खोया है , और जीवन भर घुट
घुट कर रहो क्युँकि हलाला वह रोक पैदा करता है कि
गलती का एहसास होने पर फिर कोई उसी
पत्नी से विवाह ना कर सके , मैने आज तक अपने
जीवन तो छोड़िए अपने समाज अपने माता पिता नाना
नानी के मुँह से भी "हलाला"
की प्रक्रिया पूरी करके किसी
का उसी से पुनः विवाह हुआ है ऐसा
नहीं सुना ना देखा , यहाँ तक कि बी आर
चौपड़ा की इसी विषय पर बनी
बेहतरीन फिल्म "निकाह" भी तलाकशुदा
सलमा आगा के दूसरे विवाह ( राज बब्बर से) बाद पहले पति
(दीपक पराशर) से निकाह को इंकार कर
देती है ।हलाला मुख्य रूप से महिलाओं के उपर
निर्भर एक प्रक्रिया है जिसमे वह तलाक के बाद
अपनी मर्जी से खुशी
खुशी किसी अन्य से विवाह कर
लेती है और फिर दूसरे विवाह में भी
ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होती हैं कि यहाँ
भी निकाह टूट जाता है तब ही वह
इद्दत की अवधि के बाद पूर्व पति के साथ पुनः निकाह
कर सकती है वह भी
उसकी अपनी खुशी और
मर्जी से।हलाला इसलिए नहीं कि कोई
पुर्व पति से विवाह करने के उद्देश्य के लिए किसी
अन्य से विवाह करके तलाक ले और यदि कोई ऐसा सोच कर करता
है तो वह गलत है और हलाला का दुस्प्रयोग है परन्तु सच तो
यह है कि इस दुस्प्रयोग और गलती का
भी कोई उदाहरण नहीं ।यह सब स्त्रियों
के निर्णय के उपर होता है और कोई जबरदस्ती
नहीं कर सकता और कम से कम हर समाज
की महिला तो ऐसी ही
होती है कि वह बार बार पुरुष ना बदले , पुरुष तो खैर
कुछ भी कर सकते हैं ।तो हलाला अनिवार्य होने के
कारण पूर्व पति के लिए अपनी वह पत्नी
पाना लगभग असंभव हो जाता है ।हलाला औरतों का सुरक्षा का
कवच है कि पति तलाक देने के पहले हजार बार सोचे और
जल्दबाजी में या छोटे मोटे गुस्से में अपना बसा बसाया घर
ना उजाड़े और यदि उसने गलती की तो
हलाला के कारण उसे फिर से ना पाने की सजा भुगते और
घुट घुट कर मरे , फिर समझ लीजिए कि हलाला एक
स्वभाविक प्रक्रिया है जो इस नियत से नहीं
की जाती कि फिर से पहले पति
पत्नी एक हों बल्कि महिला का दूसरा विवाह अन्य
कारणों से विफल हुआ तभी वह पहले पति से
विवाह कर सकती है, मतलब कि वह महिला अपने
पहले पूर्व पति के लिए अब हलाल है।महिला के
इसी तीन बार निकाह को हलाला कहते
हैं।
ध्यान रखें कि जैसे पति तलाक दे सकता है वैसे ही
पत्नी भी वैवाहिक जीवन
तोड़ने के लिए अपने पति से "खुला" ले सकती है और
वह उसके अधिकार में है ।आशा करता हूँ कि अब सब स्पष्ट हो
गया होगा ।
Agar mard apni bivi ko 3 talaq ek waqt mein
day day to talaq ho jati hai ya nahi?
ALLAH TAALA FARMAATAY HAIN
Talaaq 2 martaba hai ….(Al-baqra #229)
yani waqfay waqfay ke saath hai ye nehi k
akathhi 2 Talaaqain’ Ahed e Risaalat Hazra Abu
Bakar r.a k dor e khlaafat ke ibtdai 2 saal mein
3 talaaqain ek Talaaq hi shumar hoti thien …
(Muslim 1472)
Hazrat Abu Rakaana r.a ne apni Bivi ko ek hi
majlis mein 3 Talaaqain day dien thien phir iss
pr naadim o pshemaan huay Rsool s.a.w.w ne
Abu Rakaana r.a se frmaya: Wo teenon (3)
Talaaqain ek he hain ….
(Ahmed #265/1 Blooghal mraam #1009) Hadees
hasan hai .
Ek Riwayat mein hai k Nabi kareem S.A.W.W ne
Abu Rakaana r.a se keha k tum Umme Rakaana
se Rujoo kar Lo unnhon ne arz kiya mein ne
issay 3 Talaaqain day di hain to Aaap S.a.w.w ne
farmaya Mujhe maloom hai tum iss se Rjoo kr
Lo ……
{Sahih Abu Daowd #1922,,,Ibne Maaja
#2051,,,Darul Qutteni # 34-35/4,,,Tirmzi
#1177,,,ibne Hbbaan #97/10}
Agar 3 Talaaqain waqai ho jateen to Abu
Rakaana r.a ko Aaap s.a.w.w ruju ka hukam na
daitay Balke Umme Rakaana ko kisi aur shakhs
se Nikah ka mashwara daitay …
Nabi Kareem S.A.W.W ko khabar di gaee ke ek
shakhas ne apni Bivi ko akathhi 3 Tlaaqain day
dalien hain aap S.A.W.W ghazbnaak ho kr
kharay ho gae aur farmaya ;
Kya ALLAH TAALA KI kitaab se khaela ja raha
hai jab ke mein tumharay darmyaan mojood
hoon Hatta ke ek aadmi khara hua aur uss ne
arz kia ,
Aey ALLAH k Rsool ! kya mein issay Qatal na kar
daaloon ? (Ghaytalhfaan 261,,,Nissai #3430)
Hadees sahih hai.
inn tamaam Dalayl se maloom hua k agar koi
shakhs apni bivi ko akathhi 3 Talaaqain day
daita hai to wo dar Haqeeqat ek he shumaar ho
gi ,,,,,,,,,, Hazrat Ibne Abbaas , Hazrat Zubair bin
Awaam , Hazrat ABDUR REHMAN bin Auf ,
HAZRAT ALI , HAZRAT IBNE MASOOD RAZI
ALLAH TAALA ANHUMA waghaira ka be yehi
Fatwa hai ….
(Gayt allhqqaan 329/1,,,Fttah al baari 456/10)
Ibne Tymya rh issi k qayl hain ….(Alfttawa #
16-17/3)
Shaikh Ibne Baaz: Teen Talaaqain akathhi ek he
shumar ho gi ….(fattwa al islamia#49/3)
Shaik Ibn e Baaz ne ek doosray fatway mein
kaha ek kalmay se 3 tlaaqain ek he shumar ho
gi ….(Fattawa ibne baaz mtrjjam #177/1)
Saudi Majjlis ka fatwa :- Agar mard apni bivi ko
ek he Lafz k saath 3 Talaaqain day day to Ulema
ke sahi tar aqwaal ke mutabiq sirf ek hi Talaaq
waqae ho gi …..
(Fattwa al janna tu dayma tulbehoos alalmya wal
ftaah #163/20)
۞ HALALA
Halala Aise Nikah Ko Kahte Hai Jis Me Koi Admi
3 Talaq Wali Aurat Se Sirf Talaq Ki Niyat Se
Nikah Wa Mubashart Karta hai Taaki Wah Aurat
Pahle Shauhar Ke Liye Halal Ho Jaye. Ise
Mansha Se Nikah Ko Halala Kahte Hai .. yaani
kare kOi bhare kOi. Ek Interview me ek khatoon
ne kaha tha Talaq jab mard deta hai to Halala
bhi Mard ka hi hOna chahiye..ye nahi ke Galti
koi aur kare aur saza kisi aur ko mile.
RasoolAllah s.a.w Ne Halala Karne Wale Aur Jis
Ke Liye Halala Kiya Jaye Dono Par Lanat Farmai.
Sunan Tirmizi 894, Nasai, Darmi Baiheqi ,
Ahmad.
۩ Hazrat Umar r.a Farmate Hai Ahade Risalat Me
Log Halale Ko Badkari Kaha Karte The .
Hakim 2/199 Tabrani Ausat Kama Fil Majma
4/264.
ImamHaismi rh Ne Is Rijal Ko Sahi Rijal Kaha
Hai .
۩ Hazrat Ibne Umar r.a Se Halale Ke Bare Pucha
To Unhone Kaha Dono Badkaar Hai .
Ibne Abi Sheeba 4/294.
Shaikh Sabahee Hallaq Ne Ise Sahi Kaha Attaleeq
Alrauztunndiya 2/38 .
۩ Hazrat Umar r.a Ne Farmaya Mere Pas Halala
Karne Wala Jiske Liye Halala Kia Jaye Dono
Laye Gaye To Me Dono Ko Rajam Kar Dunga .
Ibne Abi Sheeba 4/294, Abudurrazzak 6/218.