Monday, 20 July 2015

खुदा के कानून की अहमियत

जीवन में क़ानून का महत्व

ऐतिहासिक प्रमाण इस बात के साक्षी हैं कि क़ानून और नियम, चाहे वह संस्कार, परंपरा और क़ानूनी रूप में हों, सदैव से ही मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण रहे हैं। धरती पर मनुष्य ने जब से क़दम रखा है तभी से उसके साथ सामाजिक नियम और क़ानून रहे हैं। मनुष्य ने विशेषकर सामाजिक संबंधों के जटिल होने के समय इस बात को स्वीकार किया कि जीवन में क़ानून के पाये जाने की आवश्यकता है।

क़ानून उस वस्तु को कहते हैं जो सामाजिक जीवन में मनुष्य के लिए यह निर्धारत करता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या न करना चाहिए। बिना क़ानून और नियम के जीवन समस्याओं से ग्रस्त और उसमें विघ्न उत्पन्न हो जाता है। जब मनुष्य सामाजिक जीवन व्यतीत करना चाहता है और एक दूसरे से सहयोग करना चाहता है और इस सहयोग के माध्यम से प्राप्त होने वाली उपलब्धियों को आपस में विभाजित करना चाहता है तो उसे दूसरे के हितों और इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए। जो भी अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहता है या वह अपनी इच्छा के अनुसार यह निर्धारित करता है कि लोगों के साथ किस प्रकार का बर्ताव करना चाहिए, इससे सामाजिक जीवन की नय्या पार नहीं लग सकती और सामाजिक मंच पर उसे गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इस विवाद को रोकने के लिए कुछ कानून और नियम निर्धारित करने होंगे, वरना सामाजिक जीवन डगमगा जाएगा और उसके आधार धराशायी हो जाएंगे। अब प्रश्न यह है कि कब और कहां पर इस प्रकार के साधारण क़ानून बनाए जाएं और पेश किए जाएं?

इतिहास पर दृष्टि डालने से यह बात समझ में आती है कि पहली बार प्राचीनतम और सबसे व्यापक क़ानून बेबीलोनिया की धरती पर हमूराबी के आदेश पर बनाया गया। वह 2013 से 2080 ईसा वर्ष पूर्व वर्तमान इराक़ के बेबीलोनिया पर राज करता था। उसके द्वारा जारी किया गया वैश्विक क़ानून अधिकतर झूठे आरोप, झूठी सौगंध, न्यायाधीश को घूस देने, फ़ैसले में अन्याय करने, राजा और प्रजा के मध्य संबंध, व्यापारिक और पारिवारिक क़ानून जैसे मामलों से संबंधित थे किन्तु ईश्वरीय क़ानून का इतिहास इससे भी प्राचीन है अर्थात ईश्वरीय क़ानून हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के काल से प्रचलित था। हज़रत नूह एक वरिष्ठ ईश्वरीय दूत थे जिन्होंने हज़रत मूसा और ईसा से पहले लोगों के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व संभाला। समाज का विस्तार, भौतिक, जातीय और सांप्रदायिक हितों को लेकर लोगों में मतभेद का बढ़ना, कारण बना कि ईश्वरीय दूत लोगों के मतभेद को दूर करने और उन्हें कल्याण का मार्ग दिखाने के निरंतर रूप से उचित क़ानून लोगों के सामने पेश करें। धर्म की परिधि में यह क़ानून दिन प्रतिदिन परिपूर्ण और व्यापक होते गये, यहां तक कि अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मूहम्मद सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल में यह क़ानून और नियम परिपूर्णता के चरम पर पहुंच गये।

इस्लाम धर्म के क़ानून और नियम आसमानी पुस्तक क़ुरआन के रूप में पैग़म्बरे इस्लाम के माध्यम से मानवता के सामने पेश किये गये। इस आधार पर पवित्र क़ुरआन, इस्लाम धर्म के क़ानून की किताब है जिसमें मनुष्य के मार्गदर्शन के कार्यक्रम, सामाजिक संबंध कैसे होने चाहिए और क़ानूनी और नैतिक नियमों के बारे में विस्तारपूर्वक बयान किया गया है। ईश्वरीय क़ानून की कुछ विशेषताएं हैं जो उसे लोगों द्वारा बनाए गये क़ानूनों से अलग करती हैं।

एक उचित और व्यापक क़ानून को मनुष्य की अध्यात्मिक व भौतिक आवश्यकताओं का उत्तर देने वाला होना चाहिए और इसका लागू होना, इन दोनों क्षेत्रों में समस्त लोगों की प्रगति और परिपूर्णता की भूमिका बने और शांति उत्पन्न होने का कारण बने। पवित्र क़ुरआन की विभिन्न आयतों में चिंतन मनन करके इस वास्तविकता का पता चल जाता है कि इस क़ानून और नियम को बनाने वाला अर्थात तत्वदर्शी और सर्वगुण संपन्न ईश्वर इन समस्त मामलों से भलिभांति अवगत है। लोगों के लिए वांछित क़ानून की कुछ विशेषताएं होती है और क़ानून बनाने वाला जब तक इन विशेषताओं से अवगत नहीं होगा तो इस प्रकार क़ानून बना ही नहीं सकता। अधिकारों का ख़याल रखना या अधिकारों से पूर्ण रूप से अवगत होना इन विशेषताओं में से एक है। अर्थात क़ानून बनाने वाले को समाज के हर व्यक्ति और हर गुट के उच्चाधिकारों और ज़िम्मेदारियों से पूर्ण रूप से अवगत होना चाहिए ना यह कि समाज के लोगों या किसी विशेष वर्ग के के लिए कठिनाइयां उत्पन्न करे और न ही कुछ विशेष लोगों के लिए अतार्किक समस्याएं उत्पन्न करे। क़ानून को समाज के हर वर्ग, वर्ण और गुट के हित में होना चाहिए। हर व्यक्ति या हर गुट के हितों की पूर्ति दूसरों के हितों से समन्वित होनी चाहिए। क़ानून में समाज और लोगों के हितों और हानियों पर दृष्टि रखने, क़ानून को लागू करने की गैरेंटी और मनुष्य की सृष्टि के अंतिम लक्ष्य और उसकी अध्यात्मिक परिपूर्णता पर दृष्ट

इस्लाम की दावत किस पर फ़र्ज़ ..?

आज हमारे मुसलीम भाई अकसर यह बात उलेमा पर डाल देते है की दावत देना तबलीग करना उनका काम है ! नही बल्की यह सबका काम है! हर मुलीम अपने पडौसी को या जिससे उसकी मुलाकात हो उसे दावत जरुर दे ..
-*-*-*-*-*-*-*-*+*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-*-नही अलल मुनकर और आज का मुस्लिम
जागो मुसलमानो क्या तूम उस.अल्लाह के लिये यह भी नही कर सकते की उपने करीबी दोस्तो को एक अल्लाह की दावत दो जबकी दुनिया के लिये हजार मुश्कीले उठाते हो..याद रखो फुसलाया उसे जाता है जो नादान हो उसे नही जो बाखबर हो फिर अल्लाह को बेवकुफ बनाने की इच्छा क्यो रखते हो ..अपने दोस्तो मे दो दावत ..दावत ..हराम से बचने की दावत नेक अख्लाक की और खुद नेक अख्लाक बनो....
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क्या मुश्कील है दावत का काम....
नही अगर बेदारी से करो १- तालिब बन जाना उनसे लो जानकारी उनके धर्म की जैसे तुमको उनके धर्म की जानकारी हो जिस बारे मे सवाल करो पहले जानकारी लो उस बारे मे
सवाल तालिब बन कर पुछो जैसे नर्मी से सहमति से पुछा जाता है..
छोटे मगर ठेस न पहुँचाने वाले सवाल करो जब वह आपके ईसलाम पर सवाल करे प्यार से डाउट क्लियर करो..
धिरे धिरे ईसलामी तालिम और वर्तमान मे उसकी अहमीयत और कुरान व विज्ञान की जानकारी दो ..
और साथ ही अख्लाके रसुल की जानकारी दो..
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याद रहे खुद इस्लाम की सही जानकारी के सोर्स से जुडो और उसी से उसे जुडने की सलाह दो .....
इंशाल्लाह भाग दो मे मजीद वजाहत करेंगे..

कुफ्र की पहचान संक्षिप्त मे

इस्लाम
इस्लाम (अरबी: الإسلام) एक एकेश्वरवादी धर्म है, जो इसके अनुयाइयों के अनुसार, अल्लाह के अंतिम रसूल और नबी, मुहम्मद द्वारा मनुष्यों तक पहुंचाई गई अंतिम ईश्वरीय पुस्तक क़ुरआन की शिक्षा पर आधारित है। यानी दनियावी रूप से और धार्मिक रूप से इस्लाम (और मुस्लिम कृरए के अनुसार पिछले धर्मों अनुकूलन) शुरू, ६१० ए से ६३२ ई। तक २३ वर्ष शामिल समय में मोहम्मद पर अल्लाह की ओर से उतरने वाले इल्हाम (कुरआन) से होता है। कुरान अरबी भाषा में रची गई (गोपनीयता कारण: आललसान कुरआन) और इसी भाषा में विश्व की कुल जनसंख्या के २४% हिस्से, यानी लगभग १.६ से १.८ अरब लोगों, द्वारा पढ़ी जाती है; इनमें से (स्रोतों के अनुसार) लगभग २० से ३० करोड़ लोगों की यह मातृभाषा है। कई निजी स्रोतों से मौजूदा स्वरूप में आने वाली अन्य ईश्वरीय पुस्तकों के विपरीत, बोसीलहٔ रहस्योद्घाटन, व्यक्ति अकेला (मुहम्मद) के मुँह से कथित होकर लिखी जाने वाली पुस्तक और पुस्तक का पालन करने के निर्देश प्रदान करने वाली शरीयत ही दो ऐसे संसाधन हैं जो इस्लाम की जानकारी स्रोत करार दिये जाते हैं।

इस्लामी मत

इस्लामी धर्म के प्रमुख मत यह हैं:

ईश्वर की एकता
मुसलमान एक ही ईश्वर को मानते हैं, जिसे वे अल्लाह (फ़ारसी: ख़ुदा) कहते हैं। एकेश्वरवाद को अरबी में तौहीद कहते हैं, जो शब्द वाहिद से आता है जिसका अर्थ है एक। इस्लाम में ईश्वर को मानव की समझ से परे माना जाता है। मुसलमानों से इश्वर की कल्पना करने के बजाय उसकी प्रार्थना और जय-जयकार करने को कहा गया है। मुसलमानों के अनुसार ईश्वर अद्वितीय है - उसके जैसा और कोई नहीं। इस्लाम में ईश्वर की एक विलक्षण अवधारणा पर बल दिया गया है और यह भी माना जाता कि उसका सम्पूर्ण विवरण करना मनुष्य से परे है। कहो: ईश्वर एक और अनुपम। ईश्वर सनातन, सदा से सदा तक जीने वाला है।
न उसे किसी ने जना और न ही वो किसी का जनक है।br /> एवं उस जैसा कोई और नहीं है।”
(कुरआन, सूरत ११२, आयते १ - ४)}}

नबी (दूत) और रसूल
इस्लाम के अनुसार ईश्वर ने धरती पर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिये समय समय पर किसी व्यक्ति को अपना दूत बनाया। यह दूत भी मनुष्य जाति में से होते थे और ईश्वर की ओर लोगों को बुलाते थे। ईश्वर इन दूतों से विभिन्न रूपों से समपर्क रखता था। इन को इस्लाम में नबी कहते हैं। जिन नबियों को ईश्वर ने स्वयं, शास्त्र या धर्म पुस्तकें प्रदान कीं उन्हें रसूल कहते हैं। मुहम्मद भी इसी कड़ी का भाग थे। उनको जो धार्मिक पुस्तक प्रदान की गयी उसका नाम कुरान है। कुरान में अल्लाह के २५ अन्य नबियों का वर्णन है। स्वयं कुरान के अनुसार ईश्वर ने इन नबियों के अलावा धरती पर और भी कई नबी भेजे हैं जिनका वर्णन कुरान में नहीं है। लगभग सन्सार मे १२४००० नबी (दूत) वर्णन कुरान मे है।

सभी मुसलमान ईश्वर द्वारा भेजे गये सभी नबियों की वैधता स्वीकार करते हैं और मुसलमान, मुहम्मद को ईशवर का अन्तिम नबी मानते हैं। अहमदिय्या समुदाय मुहम्मद को अन्तिम नबी नहीं मानता तथापि स्वयं को इस्लाम का अनुयायी कहता है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकारा भी जाता है हालांकि कई इस्लामी राष्ट्रों में उसे मुस्लिम मानना प्रतिबंधित है। भारत के उच्चतम न्यायालय के अनुसार उनको भारत में मुसलमान माना जाता है।[1] ref>On Finality of Prophethood – Opinions of Islamic

कुरान पूरी मानव जाती के लिए हे केवल मुस्लिम के लिए नही ..@

कुरआन केवल मुस्लिमों का ग्रन्थ नही ये समस्त मानवजाती के लिए ईश्वरीय सिध्दांत है 

कुरआन मजीद इतने उच्चकोटि की वाणी है कि उसे जो सुनता लहालोट हो जाता। हजरत मुहम्मद (सल्ल0) कुरआन पढ़कर लोगो को सुनाते, जो पढ़े-लिखे और समझदार थे वे इस पर र्इमान लाते कि यह अल्लाह का कलाम  हैं। 

इस प्रकार कुरआन के मानने वालों की संख्या बढ़ने लगी और दुश्मनों की परेशानी बढ़ने लगी। जो इस पर र्इमान लाता उसको मारा-पीटा जाता, किसी के पैर मे रस्सी बॉधकर घसीटा जाता, किसी को जलती हुर्इ रेत पर लिटाकर उपर से भारी पत्थर रख दिया जाता, किसी को उलटा लटकाकर नीचे से धूनी दी जाती। फिर भी ये र्इमान लाने वाले पलटने को तैयार नही थे। 

जब लोगो ने देखा कि ईमान लाने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही हैं तो तय किया गया कि मुहम्मद (सल्ल0) ही को कत्ल कर दिया जाए। र्इश्वर ने मुहम्मद (सल्ल0) को आदेश दिया कि रातो-रात मदीना चले जाओ, वहां के लोग अच्छे हैं और बहुत-से लोग इस किताब पर र्इमान ला चुके हैं। 

अत: मुहम्मद (सल्ल0) मदीना हिजरत कर गए जो मुसलमान जहां-जहां थे, धीरे-धीरे मदीना पहुचने लगे। इस प्रकार कुरआन मजीद पर र्इमान लाने वालों का एक गिरोह मदीना में बन गया। इस पर विरोधी बहुत चिन्तित हुए और इस छोटे-से गिरोह को खत्म करने के लिए उन्होने कर्इ बार आक्रमण किए, मगर हर बार पराजित हुए। 
इस प्रकार बद्र, उहद, हुनैन इत्यादि स्थानों पर युद्ध हुआ, पर हर जगह र्इमान लाने वाले सफल रहे और अरब मे इस कुरआन के आधार पर एक छोटी-सी इस्लामी हुकूमत बन गर्इ। 
वह अरब जहां कोर्इ हुकूमत ही न थी, दिन-दहाड़े काफिलें लूट लिए जाते और बस्तियों के लोग रातभर डर के मारे सो भी नही पाते कि डाकुओं को कोर्इ गिरोह रात को उनके घर पर आक्रमण करके लूट ना ले और मर्दो और औरतों को बाजार में ले जाकर बेच देते। यह थी अरब के लोगो की दुर्दशा। 
परन्तु जब इस्लामी हुकूमत स्थापित हुर्इ तो वहां ऐसा अमन हुआ कि एक बुढ़िया सोना उछालते हुए ‘सनाआ’ से ‘हजरे-मौत’ तक सैकड़ो मील की तन्हा रेगिस्तानी यात्रा करती है। रास्ते मे उसको कोर्इ भय नही होता। 
यह दशा देखकर लोग बड़ी संख्या मे र्इमान लाने लगे और पूरे अरब मे इस्लामी हुकूमत स्थापित हो गर्इ। 

मुहम्मद (सल्ल0) की मृत्यु के पश्चात उनके चार खुलफा- 
1. हजरत अबूबक्र (रजि0) 
2. हजरत उमर (रजि0) 
3. हजरत उस्मान (रजि0) 
4. हजरत अली (रजि0) ने उस वक्त की सभ्य दुनिया के बहुत बड़े क्षेत्र पर इस्लामी हुकूमत कायम कर दी। 
यह हुकूमत र्इश्वर के बादशाह होने और इन्सान का इससे पृथ्वी पर र्इश्वर का खलीफा (नायब) होने के आधार पर बनी थी। पूरे देश में र्इशग्रन्थ (कुरआन मजीद) के आधार पर कानून चलता था। पूरे देश मे जनता बड़ी सुखी थी और हुकूमत से पूर्णत: संतुष्ट थी। गैर मुस्लिम लोग जो इस हुकूमत के अन्दर रहते थे, वे हूकूमत से बहुत खुश थे। 
ईसाइयो विषय मे मिस्टर आरनाल्ड का कथन काफी हैं। वह कहते है- ‘‘मुसलमानों की हुकूमत मे जो र्इसार्इ फिरके रहते थे उनके साथ न्याय करने मे इस्लामी हुकूमत ने कभी कोताही नही की।’’ 
अन्य गैर मुस्लिम वर्गो के बारे मे केवल दो मिसाले प्रस्तुत की जाती है- मिस्त्र के एक गैरमुस्लिम ने उस वक्त के खलीफा हजरत उमर फारूक (रजि0) से शिकायत की आपके गवर्नर ने मेरे लड़के को नाहक कोड़े मारे है। गवर्नर और उसका लड़का तलब किया गया। शिकायत सही साबित हुर्इं। 
खलीफा हजरत उमर रजि0 ने लड़के को हुक्म दिया कि तुम भी गवर्नर के लड़के को कोड़े मारो। 
अत: उस लड़के ने गवर्नर के लड़के को कोड़े मारे। जब कोड़ा रखने लगा तो खलीफा ने कहा कि दो कोड़े गवर्नर साहब को भी मारो, क्योकि उनके लड़के को अगर यह घमण्ड न होता कि उसका बाप गवर्नर है तो तुम्हे कोड़े कदापि न मारता, परन्तु गैर मुस्लिम लड़के ने यह कहते हुए कोड़ा रख दिया कि जिसने मुझे मारा था मैने उससे बदला ले लिया, मेरा दिल ठंडा हो गया, मै गवर्नर को क्यो मारूं। 
मिस्त्र की एक गैर मुस्लिम बुढ़िया ने खलीफा हजरत उमर से शिकायत की आप के गवर्नर अबुल आस ने मेरी आज्ञा के बगैर मेरा मकान गिराकर मस्जिद मे सम्मिलित कर लिया हैं गवर्नर बुलाए गए। उन्होने इस बात को स्वीकार किया कि शिकायत सही हैं। मस्जिद तंग पड़ती हैं। किसी तरफ बढ़ने की गुंजाइश नही हैं, इसके मकान ही की तरफ बढ़ने की गुंजाइश हैं। 
बुढ़िया को उसके मकान की दुगुनी कीमत दी जा रही हैं, परन्तु उसने लेने से इन्कार कर दिया। हमारे सामने भी मजबूरी थी। 
अत: हमने उसका मकान गिराकर उसपर मस्जिद बना दी और मकान की दुगुनी रकम बैतुलमाल में जमा हैं। इस पर खलीफा बड़े गजबनाक हुए और हुक्म दिया कि बुढ़िया का मकान वही बनाया जाए जहॉ पहले था। इस प्रकार बहुत से वाकियात ऐसे हुए जिनसे मालूम होता है कि गैर मुस्लिम जनता भी इस्लामी हुकूमत से बहुत खुश थी। 
यह सारी बाते इतिहास के पन्नों में आज भी सुरक्षित हैं, जिन्हे पढ़कर आज के बुद्धिजीवी भी बोल उठे- नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा, 
‘‘ मुझे आशा हैं कि वह समय दूर नही जब मै इस योग्य हो जाउंगा कि संसार के सारे देशों के शिक्षित और योग्य लोगो को एकत्रित कर दूॅ और उनकी सहायता से कुरआन की बुनियाद पर एक ऐसी व्यवस्था स्थापित कर दूॅ जो सत्य हैं और मानवता को सफलता के मार्ग पर ले जा सकती हैं।’’

बर्नाड शां ने कहा, 
‘‘आने वाले सौ वर्षो मे हमारी दुनिया का मजहब इस्लाम होगा, मगर आज के मुसलमानों का इस्लाम नही, बल्कि वह इस्लाम जो मानव बुद्धि में रचा बसा हैं।

’’ रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा,
‘‘ वह समय दूर नही जब इस्लाम अपनी ऐसी सच्चार्इ जो ठुकरार्इ न जा सके, रूहानियत द्वारा सब पर विजय पा लेगा और हिन्दू मजहब पर भी विजयी हो जायेगा, तो हिन्दुस्तान मे एक ही मजहब होगा और वह इस्लाम मजहब होगा। 

महात्मा गॉधी ने कहा:, 
‘‘जब हिन्दुस्तान स्वतंत्र हो जाएगा तो हम यहां भी वैसा ही शासन स्थापित करेंगे जैसा अबूबक्र ने स्थापित किया था।’’ 
जय प्रकाश नारायण ने पटना मेडिकल कालेज मे सौरेत पर भाषण देते हुए कहा, 
‘‘यदि आज दुनिया के मुसलमान गफलत के पर्दे चाक करके मैदान मे आ जाएं और इस्लामी सिद्धान्तों पर काम करें तो सारी दुनिया का मजहब इस्लाम हो सकता हैं।’’ 

मुसलमान भाइयों अब हम खुद मुहासिबा करें,क्या हम वही कर रहै हैं- जो हुक्म हमे अल्लाह रब्बुल ईज्जत ने कुरआन में फरमाया! क्या हम अपने मजहब के सिध्दांतो,आदर्शों पर खरे हैं?

 क्या हम मुसलमान कहलाने का हक रखते हैं?

आर्य समाज की नियोग विधि,औरत पर अत्याचार

औरत पर अत्याचार ===>> नियोग (भाग-2) :-D :-D यह भी एक तथ्य है कि पुनर्विवाह के दोष और हानियाँ तथा नियोग के गुण और लाभ का उल्लेख केवल द्विज वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए किया गया है। चैथे वर्ण ‘शूद्र को छोड़ दिया गया है। क्या ‘शुद्रों के लिए नियोग की अनुमति नहीं है ? क्या ‘शूद्रों के लिए नियोग की व्यवस्था दोषपूर्ण और पाप है ? जैसा कि लिखा है कि अगर पत्नी अथवा पति अप्रिय बोले तो भी वे नियोग कर सकते हैं। अगर किसी पुरुष की पत्नी गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए अथवा पति दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो दोनों कहीं उचित साथी देखकर नियोग कर सकते हैं। क्या यहाँ सारे नियमों और नैतिक मान्यताओं को लॉकअप में बन्द नहीं कर दिया गया है ? क्या नियोग का मतलब स्वच्छंद यौन संबंधों ;ैमग थ्तमम) से नहीं है ? :-D क्या इससे निम्न और घटिया किसी समाज की कल्पना की जा सकती है? कथित विद्वान लेखक ने नियोग प्रथा की सत्यता, प्रमाणिकता और व्यावहारिकता की पुष्टि के लिए महाभारत कालीन सभ्यता के दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि व्यास जी ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य के मर जाने के बाद उनकी स्त्रियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की। अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और एक दासी से विदुर की उत्पत्ति नियोग प्रक्रिया द्वारा हुई। दूसरा उदाहरण पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री का है। पाण्डु के असमर्थ होने के कारण दोनों स्त्रियों ने नियोग विधि से संतान उत्पन्न की। इतिहास भी इस बात का प्रमाण है। जहाँ तक उक्त ऐतिहासिक तथ्यों की बात है महाभारत कालीन सभ्यता में नियोग की तो क्या बात कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना भी मान्य और सम्मानीय था। वेद व्यास और भीष्म पितामह दोनों विद्वान महापुरुषों की उत्पत्ति इस बात का ठोस सबूत है। दूसरी बात महाभारत कालीन समाज में एक स्त्री पांच सगे भाईयों की धर्मपत्नी हो सकती थी। पांडव पत्नी द्रौपदी इस बात का ठोस सबूत है। तीसरी बात महाभारत कालीन समाज में तो बिना स्त्री संसर्ग के केवल पुरुष ही बच्चें पैदा करने में समर्थ होता था। महाभारत का मुख्य पात्र गुरु द्रोणाचार्य की उत्पत्ति उक्त बात का सबूत है। चैथी बात महाभारतकाल में तो चमत्कारिक तरीके से भी बच्चें पैदा होते थे। पांचाली द्रौपदी की उत्पत्ति इस बात का जीता-जागता सबूत है। अतः उक्त समाज में नियोग की क्या आवश्यकता थी ? यहाँ यह भी विचारणीय है कि व्यास जी ने किस नियमों के अंतर्गत नियोग किया ? दूसरी बात नियोग किया तो एक ही समय में तीन स्त्रियों से क्यों किया? तीसरी बात यह कि एक मुनि ने निम्न वर्ण की दासी के साथ क्यों समागम किया ? चैथी बात यह कि कुंती ने नियम के विपरीत नियोग विधि से चार पुत्रों को जन्म क्यों दिया ? विदित रहे कि कुंती ने कर्ण, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन चार पुत्रों को जन्म दिया और ये सभी पाण्डु कहलाए। पांचवी बात यह कि जब उस समाज में नियोग प्रथा निर्दोष और मान्य थी तो फिर कुंती ने लोक लाज के डर से कर्ण को नदी में क्यों बहा दिया ? छठी बात यह है कि वे पुरुष कौन थे जिन्होंने कुंती से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की ? स्वामी जी ने बहुविवाह का निषेध किया है जबकि उक्त सभ्यता में बहुविवाह होते थे। अब क्या जिस समाज से स्वामी जी ने नियोग के प्रमाण दिए हैं, उस समाज को एक उच्च और आदर्श वैदिक समाज माना जाए ? नियोग Part- 1 ( दयानन्द का नंगा पार्ट 13 में देख सकते हो ) ¶ ¶ ¶ ¶ ¶ ¶ ¶ islamnoorehaq.blogspot.in/2015/07/blog-post_38.html?m=1 :

इसलाम पर एक नजर

इस्लाम
इस्लाम (अरबी: الإسلام) एक एकेश्वरवादी धर्म है, जो इसके अनुयाइयों के अनुसार, अल्लाह के अंतिम रसूल और नबी, मुहम्मद द्वारा मनुष्यों तक पहुंचाई गई अंतिम ईश्वरीय पुस्तक क़ुरआन की शिक्षा पर आधारित है। यानी दनियावी रूप से और धार्मिक रूप से इस्लाम (और मुस्लिम कृरए के अनुसार पिछले धर्मों अनुकूलन) शुरू, ६१० ए से ६३२ ई। तक २३ वर्ष शामिल समय में मोहम्मद पर अल्लाह की ओर से उतरने वाले इल्हाम (कुरआन) से होता है। कुरान अरबी भाषा में रची गई (गोपनीयता कारण: आललसान कुरआन) और इसी भाषा में विश्व की कुल जनसंख्या के २४% हिस्से, यानी लगभग १.६ से १.८ अरब लोगों, द्वारा पढ़ी जाती है; इनमें से (स्रोतों के अनुसार) लगभग २० से ३० करोड़ लोगों की यह मातृभाषा है। कई निजी स्रोतों से मौजूदा स्वरूप में आने वाली अन्य ईश्वरीय पुस्तकों के विपरीत, बोसीलहٔ रहस्योद्घाटन, व्यक्ति अकेला (मुहम्मद) के मुँह से कथित होकर लिखी जाने वाली पुस्तक और पुस्तक का पालन करने के निर्देश प्रदान करने वाली शरीयत ही दो ऐसे संसाधन हैं जो इस्लाम की जानकारी स्रोत करार दिये जाते हैं।

इस्लामी मत

इस्लामी धर्म के प्रमुख मत यह हैं:

ईश्वर की एकता
मुसलमान एक ही ईश्वर को मानते हैं, जिसे वे अल्लाह (फ़ारसी: ख़ुदा) कहते हैं। एकेश्वरवाद को अरबी में तौहीद कहते हैं, जो शब्द वाहिद से आता है जिसका अर्थ है एक। इस्लाम में ईश्वर को मानव की समझ से परे माना जाता है। मुसलमानों से इश्वर की कल्पना करने के बजाय उसकी प्रार्थना और जय-जयकार करने को कहा गया है। मुसलमानों के अनुसार ईश्वर अद्वितीय है - उसके जैसा और कोई नहीं। इस्लाम में ईश्वर की एक विलक्षण अवधारणा पर बल दिया गया है और यह भी माना जाता कि उसका सम्पूर्ण विवरण करना मनुष्य से परे है। कहो: ईश्वर एक और अनुपम। ईश्वर सनातन, सदा से सदा तक जीने वाला है।
न उसे किसी ने जना और न ही वो किसी का जनक है।br /> एवं उस जैसा कोई और नहीं है।”
(कुरआन, सूरत ११२, आयते १ - ४)}}

नबी (दूत) और रसूल
इस्लाम के अनुसार ईश्वर ने धरती पर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिये समय समय पर किसी व्यक्ति को अपना दूत बनाया। यह दूत भी मनुष्य जाति में से होते थे और ईश्वर की ओर लोगों को बुलाते थे। ईश्वर इन दूतों से विभिन्न रूपों से समपर्क रखता था। इन को इस्लाम में नबी कहते हैं। जिन नबियों को ईश्वर ने स्वयं, शास्त्र या धर्म पुस्तकें प्रदान कीं उन्हें रसूल कहते हैं। मुहम्मद भी इसी कड़ी का भाग थे। उनको जो धार्मिक पुस्तक प्रदान की गयी उसका नाम कुरान है। कुरान में अल्लाह के २५ अन्य नबियों का वर्णन है। स्वयं कुरान के अनुसार ईश्वर ने इन नबियों के अलावा धरती पर और भी कई नबी भेजे हैं जिनका वर्णन कुरान में नहीं है। लगभग सन्सार मे १२४००० नबी (दूत) वर्णन कुरान मे है।

सभी मुसलमान ईश्वर द्वारा भेजे गये सभी नबियों की वैधता स्वीकार करते हैं और मुसलमान, मुहम्मद को ईशवर का अन्तिम नबी मानते हैं। अहमदिय्या समुदाय मुहम्मद को अन्तिम नबी नहीं मानता तथापि स्वयं को इस्लाम का अनुयायी कहता है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकारा भी जाता है हालांकि कई इस्लामी राष्ट्रों में उसे मुस्लिम मानना प्रतिबंधित है। भारत के उच्चतम न्यायालय के अनुसार उनको भारत में मुसलमान माना जाता है।[1] ref>On Finality of Prophethood – Opinions of Islamic

आर्य समाज और सजा का कानून

स्वामी जी अपनी
पुस्तक ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ में मनुस्मृति के संदर्भ से
लिखते हैं कि दंड का विधान ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधार
पर होना चाहिए। (6-27)
स्वामी जी द्वारा संदर्भित मनुस्मृति
के दंड विधान पर एक दृष्टि डालिए-
कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो त्रान्यः प्रकृतो जनः।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा।।
(मनु0, 8-335)
भावार्थ - साधारण प्रजा को जिस अपराध के लिए एक पैसा
दंड दिया जाता है, उसी अपराध में लिप्त होने
पर राजा पर हजार पैसा दंड लगाया जाना चाहिए।
अष्टापद्यं तु शुद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम्।
षौडशैस्तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च।।
(मनु0, 8-236)
भावार्थ- यदि चोरी शुद्र, वैश्य या क्षत्रिय
करता है तो उन्हें पाप का क्रमशः आठ, सोलह और
बत्तीस गुना भागीदार बनना पड़ता
है।
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टि पूर्णं वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा च चतुःषष्टिस्तद्दोषगुण विद्धि सः।
(मनु0, 8-337)
भावार्थ - इसी प्रकार चूंकि ब्राह्मण को
चोरी के गुण-दोष का सर्वाधिक ज्ञान होता है,
अतः वह चोरी करता है तो उसे पाप का चैसठ
गुना भागीदार बनना पड़ता है।
यहां स्वामी जी ने वर्ण को ज्ञान
और प्रतिष्ठा का आधार माना है और ब्राह्मण वर्ण को
ज्ञान और प्रतिष्ठा में अन्य वर्णों क्षत्रिय, वैश्य
और शुद्र से ऊंचा मानते हुए किसी अपराध में
ब्राह्मण के लिए अधिक सजा का प्रावधान किया है।
स्वामी दयानंद ने अपनी दंड
विधान की धारणा को मनुस्मृति के उक्त ‘लोकों से
सत्य साबित करने का प्रयास अपनी पुस्तक
‘सत्यार्थ प्रकाश’ में किया है। (6-27)
अगर उक्त ‘लोकों से स्वामी दयानंद
की यह धारणा कि दंड का विधान ज्ञान और
प्रतिष्ठा के आधार पर होना चाहिए, सत्य साबित हो
भी जाता है तो अब मुनस्मृति के निम्न ‘लोक
भी देखिए, उनसे क्या साबित हो रहा है?
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह।
विलुप्तौ शुद्रवद्दण्ड्यौ दग्ध्व्यौ वा कटाग्निना।।
(मनु0, 8-376)
भावार्थ - यदि रक्षिण ब्राह्मणी से वैश्य या
क्षत्रिय शारीरिक संबंध स्थापित करे तो
उन्हें शुद्र के समान दंड देते हुए आग में जलाकर मार
देना चाहिए।
सहस्रं ब्राह्मणो दण्ड्योगुप्तां विप्रां बलाद् व्रजन्।
शतानि पत्र्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह सड्.गतः।।
(मनु0, 8-377)
भावार्थ - रक्षित ब्राह्मणी से यदि ब्राह्मण
बलात मैथुन करता है तो उस पर दो हजार पैसा दंड लगाना
चाहिए। यदि ब्राह्मणी की
सहमति से ऐसा करता है तो उसे पांच सौ पैसा दंड देना
चाहिए।
मौण्ड्यं प्राणान्तिकोदण्डोब्राह्मणस्य
विधीन्यते।
इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत्।।
(मनु0, 8-378)
भावार्थ - ब्राह्मण के सिर मुंडवाने का अर्थ
ही उसको मृत्युदंड देना है, जबकि अन्य
वर्णवालों को मृत्युदंड मिलने पर उनका सचमुच वध किया
जाना चाहिए।
न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम्।
राष्ट्रादेनं बहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम्।।
(मनु0, 8-379)
भावार्थ- भले ही ब्राह्मण ने अनेक
महापाप किए हों, किंतु उसका वध करना निषिद्ध है। उसे
देश निकाले की सजा दी जा
सकती है, ऐसी स्थिति में उसका
धन उसे दे देना उचित है।
न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मा विद्यते भुवि।
तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत्।।
(मनु0, 8-380)
भावार्थ- ब्राह्मण के वध से बढ़कर और कोई पाप
नहीं। ब्राह्मण का वध करने की
तो राजा को कल्पना भी नहीं करना
चाहिए।
शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति।
वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शुद्रस्तुवधमर्हति।।
(मनु0, 8-266)
भावार्थ- ब्राह्मण को यदि क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र द्वारा
अपशब्द या कठोर वचन कहा जाए तो उन्हें क्रमशः सौ
पैसा, डेड़ सौ पैसा तथा वध का दंड देना चाहिए।
पत्र्चाशद् ब्राह्मणो दण्डः क्षत्रियस्याभिशंसने।
वैश्ये स्यादर्धपत्र्चाशच्छूद्रे द्वादशको दम्ः।।
(मनु0, 8-267)
भावार्थ- यदि ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र को
अपशब्द कहा जाए तो उसे क्रमशः पचास,
पच्चीस और बारह पैसा आर्थिक दंड देना
चाहिए।
एकाजातिद्र्विजातीस्तु वाचा दारूण या क्षिपन्।
जिह्नयाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः।।
(मनु0, 8-269)
भावार्थ - शुद्र द्वारा द्विजातियों को अपशब्द कहा जाए तो
उसकी जिह्ना काट लेनी चाहिए,
ऐसे अधम के लिए यही दंड उचित है।
नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्योऽयोमयः ‘ांकुज्र्वलन्नास्ये दशांगुलः ।।
(मनु0, 8-270)
भावार्थ - यदि शुद्र प्रभाव के अहंकार में द्विजातियों के
नाम व जाति का उपहास करता है तो आग में तप्त दस
उंगली शलाका (लोहे की छड़)
उसके मुंह में डाल देनी चाहिए।
धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः।
तप्तमासेचयेत्तैलं वक्तृ श्रोत्रे च पार्थिवः ।।
(मनु0, 8-271)
भावार्थ- यादि शुद्र दर्प में आकर द्विजातियों को
धर्मोपदेश देने की धृष्टता करे तो राजा उसके
मुंह व कान में खौलता तेल डलवा दे मनुस्मृति के उक्त
‘लोकों में दंड विधान को बदल दिया गया है।
स्वामी दयानंद ने जहां ब्राह्मण को
किसी अपराध में अन्य वर्णों  से अधिक दंड का
अधिकारी माना है, वहीं उक्त
‘लोकों में ब्राह्मण के लिए अन्य वर्णों  से कम दंड का
प्रावधान किया गया है। जैसा कि उक्त ‘लोकों से स्पष्ट है
कि अगर क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र व्यभिचार करें तो उनको
जलाकर मार देना चाहिए, जबकि ब्राह्मण को मात्र सिर
मुंडवाने की सजा देनी चाहिए।
स्वामी दयानंद के मतानुसार तो ब्राह्मण को
जलाकर मारने से भी कोई बड़ी सजा
दी जानी चाहिए। मगर यहां
ब्राह्मण को सिर मुंडाने जैसी नाममात्र
की सजा रखी गई है। जहां
ब्राह्मण को अपशब्द कहने पर शुद्र के मुक़ाबले वैश्य
को और वैश्य के मुकाबले क्षत्रिय को अधिक दंड देना
चाहिए था, वहीं ‘लोक (8-266) में उक्त
प्रावधान को उलट दिया गया है, क्षत्रिय और वैश्य को
आर्थिक दंड रखा गया है वहीं शुद्र के लिए
मृत्यु दंड की बात कही गई है।
‘लोक (8-269, 270, 271) में शुद्र  द्वारा द्विजातियों को
मात्र अपशब्द कहने पर अमानवीय सजा का
प्रावधान किया गया है। क्या सजा का यह प्रावधान
बुद्धिसम्मत और न्यायसंगत है? जिस अपराध में
ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक सजा होनी
चाहिए थी वहीं ‘लोक (8-267)
में ब्राह्मण को अन्य वर्णों से कम सजा का प्रावधान किया
गया है। अब कहां गया स्वामी जी
का ज्ञान और प्रतिष्ठा पर आधारित दंड विधान? क्या
स्वामी जी ने पूरी
मनुस्मृति नहीं पढ़ी
थी?
अब क्या स्वामी दयानंद अथवा मनुस्मृति द्वारा
प्रतिपादित दंड विधान की धारणा न्यायसंगत और
व्यावहारिक लगती है ? क्या कोई शासन
व्यवस्था उक्त दंड विधान को मान्य करार दे
सकती है? क्या उक्त विधान हास्यास्पद और
अक्ल के ख़िलाफ़ नहीं

Sunday, 19 July 2015

क्या दाह संस्कार ( मुर्दों को जलाना ) उचित हे ..?

सत्यार्थ प्रकाश ममें दयानंद सरस्वती ने एक समीक्षामें लिखा है कि मुर्दे को गाड़ने से संसार की बड़ी हानि होती है, क्योंकि वह सड़कर वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देता है। क्या दफनाना गलत और जलाना सही .? 

एक सामान्य व्यवहार की बात है कि अगर बस्ती के पास कोई बदबूदार गंदगी या कोई जानवर जैसे चूहा, बिल्ली, कुत्ता आदि मरा पड़ा हो तो बदबू से बचने के लिए बस्ती के लोग उसे मिट्टी में दबा देते हैं ताकि बदबू फैलकर मनुष्यों को प्रभावित न करें। 
मनुष्य की अंतरात्मा कभी यह गवारा न करेगी कि किसी मृत जानवर को जलाया जाए। 
अगर कोई व्यक्ति किसी मृत जानवर को जलाएगा तो उसे अवश्य घिन आएगी। 

दूसरी यह बात भी सामान्य सी है कि जब किसी वस्तु आदि को जलाया जाता है तो उससे अवश्य वायु प्रदूषित होती है। मृत मनुष्यों को जलाना तो वस्तु आदि के जलाने से कहीं अधिक हानिकारक और ख़तरनाक है क्योंकि मृत मनुष्य को जलाने से न केवल वायु प्रदूषित होती है बल्कि रोगजनित गैसे भी निकलती हैं, जिनका प्रभाव मानव जीवन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अवश्य पड़ता है। 

तीसरा एक मानवीय पहलू यह भी है कि जिस व्यक्ति के साथ हमनेजीवन गुजारा है, जो हमारी आदरणीय माँ, बाप, प्रिय पत्नी, पुत्र व पुत्री आदि है, मरने के बाद उसे अपनी आँखों के सामने, अपने ही हाथों से आग में रखना व उसकी हड्डियों तक को भस्मीभूत कर देना कहाँ की मानवता है ?.. 

क्या यह क्रिया दिल दहलादेने वाली नहीं है ? इस विषय से जुड़ा एक अनैतिकव अमानवीय पहलू यह भी देखने में आता है कि जब किसी लाश को जलाया जाता है तो कफ़न पहले जलता है और लाश नंगी हो जाती है। यह वाकिया मानवता को ‘शर्मसार करने वाला होताहै। लाश अगर माँ अथवा औरत की हो तो इससे अधिक निर्लज्जता की बात क्या कोई और हो सकती है.....? 

स्वामी दयानंद सरस्वती ने दाह संस्कार की जो विधि बताई है वह विधि दफ़नाने की अपेक्षा कहीं अधिक महंगी है। जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है कि मुर्दे के दाह संस्कार में ‘शरीर के वज़न के बराबर घी, उसमें एक सेर में रत्ती भर कस्तूरी, माशा भर केसर, कम से कम आधा मन चन्दन, अगर, तगर, कपूर आदि और पलाश आदि की लकड़ी प्रयोग करनी चाहिए। मृत दरिद्र भी होतो भी बीस सेर से कम घी चिता में न डाले। (सत्यार्थप्रकाश13-40,41,42) 

स्वामी दयानंद सरस्वती के दाह संस्कार में जो सामग्री उपयोग में लाई गई वह इस प्रकार थी - घी 4मन यानी 149 कि.ग्रा., चंदन 2 मन यानि 75 कि.ग्रा., कपूर 5 सेर यानी 4.67 कि.ग्रा., केसर 1 सेर यानि 933 ग्राम, कस्तूरी 2 तोला यानि 23.32 ग्राम, लकड़ी 10 मन यानि 373 कि.ग्रा. आदि । (आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक, ‘‘महर्षि दयानंद का जीवन चरित्र’’ से) 

उक्त सामग्री से सिद्ध होता है कि दाह संस्कार की क्रिया कितनी महंगी है। गरीब परिवार का कोई व्यक्ति इस क्रिया को निर्धारित सामग्री के साथ नहीं कर सकता। आज के भौतिकवादी दौर में उपरोक्त किसी भी सामग्री का ‘शुद्ध और स्वच्छ मिलना भी न केवल मुश्किल बल्कि असम्भव है। 

अतः दाह संस्कार की विधि निर्धारित नियमों व मानकों के आधार पर करना अव्यावहारिक है। दाह संस्कार में मुर्दे के वजन के बराबर घी का सिद्धांत यानी किसी व्यक्ति के दाह संस्कार में 9-10 कनस्तर घी का इस्तेमाल क्या बेतुका- सा नहीं लगता.....? 
यहाँ एक बात यह भी विचारणीय है कि हिंदू समाज में बच्चों, साधु-संन्यासियों को औरकुछ वर्गों में आम व्यक्तियों को दफ़न किया जाता है। जब जलाना सर्वोत्तमहै,, तो फिर सर्वोत्तम विधि से बच्चों और साधु- संतों का अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता? 

एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि आर्य अपने मुर्दों को दफ़न करते थे, जलाते न थे। .
माह सितम्बर 2005 में, मेरठ के सिनौली स्थान पर 5 प्राचीनकालीन ‘शवधियाँ मिली थी, जिनमें मानव कंकाल सुरक्षित हालत में प्राप्त हुए थे। सभी‘शवधियाँ एक विशिष्ट दिक्स्थापन (सिर उत्तर दिशा में और पैर दक्षिण दिशा में) पैर सीधे और मुंह को बांयी बगल की ओर करके लिटाई गई थी। 

यह एक सबूत इस बात का है कि प्राचीन लोग भारत में अपने मुर्दों को दफ़न करते थे।हिंदू धर्म-दर्शन की यह धारणा कि मनुष्य का ‘शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है, मृत्युपरांत पंच तत्वों में विलीन किया जाना चाहिए। अगर इस धारणा को सही माना जाए तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मृत्युपरांत दाह संस्कार की विधि मानव ‘शरीर को पंच तत्वों में विलीन करने की उचित विधि नहीं है। 
पंच तत्वों मेंविलीन करने की उचित विधिकेवल दफ़नाना ही है।