Sunday, 19 July 2015

सत्यप्रकाश का 14 समुलास और दयानंद की भाषा और इसकी समीक्षा पार्ट -1

सत्यार्थ प्रकाश’ का 14वां समुल्लास कुरआन से संबंधित है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता ने इस समुल्लास में बार-बार यह आरोप लगाया है कि यह कुरआन किसी अल्पज्ञ और जंगली व्यक्ति का बनाया हुआ है। 
खुदा के नाम से मुहम्मद साहब ने अपना मतलब सिद्ध करने के लिए यह क़ुरआन किसी कपटी-छली और महामूर्ख से बनवाया होगा। थोड़ी देर के लिए अगर यह बात मान भी ली जाए कि यह कुरआन किसी जंगली, अल्पज्ञ और महामूर्ख व्यक्ति (खुदा माफ करें) द्वारा बनाई हुई पुस्तक है तो यहाँ एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि क्या कोई अल्पज्ञ और जंगली व्यक्ति इतनी शुद्ध भाषा में कोई पुस्तक लिखसकता है ? 
तथ्यों की बात बाद में करेंगे। इस पुस्तक में व्याकरण आदि की लेशमात्र भी गलती क्यों नहीं है ? आज तक इसपुस्तक में किसी भाषा संशोधन अथवा सुधार की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी? 
1400 वर्षों की लम्बी अवधि में भी किसी अरबी भाषा के विद्वान औरविशेषज्ञ ने इस पुस्तक में कोई गलती क्यों नहींपकड़ी? इस पुस्तक का आज तक कोई प्रूफ संशोधन क्यों नहीं हुआ? कुरआन की भाषा शैली विशुद्ध, अनूठी और अद्भुत है। 
क्या कोई निरक्षर व्यक्ति इतनी विशुद्ध, प्रवाहपूर्ण और अनूठी भाषा शैली का प्रयोग कर सकता है ? दूसरा सवाल यह है कि मुहम्मद साहब (सल्ल0) अपना ऐसा कौन-सा मतलब सिद्ध करना चाहते थे जिसके लिए आपको जंगली, अल्पज्ञ और छली-कपटी व्यक्तियों कासहयोग लेना पड़ा ? 
तीसरा सवाल यह है कि क्या कोई छली-कपटी और स्वार्थी व्यक्ति इतने उच्च नैतिक मूल्यों का प्रतिपादन और स्थापन कर सकता है जितने उच्च और उत्तम मूल्य कुरआन में प्रतिपादित किए गए हैं? 
उदाहरणार्थ कुछ अंशों को देखिए -
1. ‘‘बेहयाई के करीब तक न जाओ चाहे वह जाहिर हो या पोशीदा।’’ (कुरआन 6-152)
2. ‘‘निर्धनता के भय से अपनी औलाद का क़त्ल न करो।’’(कुरआन 6-152)
3. ‘‘जब बात कहो, इंसाफ की कहो चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो।’’ (कुरआन 6-153)
4. ‘‘किसी मांगने वाले को मत झिड़को।’’ (कुरआन 93-10)
5. ‘‘बुराई का बदला भलाई से दो।’’ (कुरआन 41-34)
6. ‘‘भलाई में एक दूसरे से बढ़ जाने का प्रयास करो।’’ (कुरआन 3-48)
7. ‘‘माँ-बाप को उफ तक न कहो और न उन्हें झिड़को।’’ (कुरआन 17-23)
8. ‘‘जुआ, ‘शराब, देवस्थान व पांसे गंदे शैतानी कामहै इनसे अलग रहो।’’ (कुरआन5-90)
चोथा सवाल यह है कि क्याकोई विद्याहीन और जंगली व्यक्ति रहस्य पूर्ण ब्रह्मांडीय सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकता है ? 
कुरआन में वर्णित अनेक भूगोलीय और खगोलीय तथ्य आज विज्ञान की कसौटी पर सत्य साबित होते जा रहे हैं जिन्हें उस वक्त कोईनहीं जानता था। 
अब क्या उक्त आरोप कि कुरआन किसी अल्पज्ञ और कपटी-छली द्वारा बनाया गया है, तर्कहीन और मूर्खतापूर्ण नहीं है ?
‘सत्यार्थ प्रकाश’ जो एक वेद विद्वान और संस्कृत के प्रकांड पंडित का लिखा हुआ बताया जाता है, इसके अब तक 38 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। 
कई बार वेद-विद्वानों और विशेषज्ञों की एक टीमद्वारा इसके प्रूफ शौधन का प्रयास किया गया, मगर आज तक इसकी भाषा और व्याकरण ही शुद्ध न हो सकी। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि इस ग्रंथ के संपादको और अनुयायियों ने कभी इसे नगंभीरता से लिया है और न ही कोई खास महत्व ही दिया है। 
‘सत्यार्थ प्रकाश’ का 38वां संस्करण जो सन् 2006 मेंप्रकाशित हुआ और जिसका संपादन पंडित भगवद्दत् (रिसर्च स्कॉलर) ने किया। 
इस संस्करण को साढ़े तीन माह तक विद्वानों की एक टीम द्वारा प्रूफ शोधन के बाद प्रकाशित कराया गया। लिखा गया है कि इस बार सर्वशुद्ध ‘सत्यार्थ प्रकाश’ देने का प्रयास किया जा रहा है, मगर नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ व्याकरण की अशुद्धियाँ आज तक भी ‘शुद्ध नहीं हो पाई। 
भाषा व्याकरण तो क्या, उसमें वर्णित कुरआन की आयतों के नम्बर व तरतीब तक गलत है।‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता द्वारा 14वें समुल्लास में जितनी गंदी और घटिया भाषा का प्रयोग किया गया है, समीक्षा में तर्क और तथ्य भी उतने ही घटिया बचकाने और मूर्खता पूर्ण हैं। 
न कहीं गंभीरविचार है, न कोई युक्ति है और न तर्क। लगता है लेखक यह जानता ही न था कितर्क क्या होता है ? तथाकथित विद्वान द्वारा कुरआन के तथ्यों के साथ जो खिलवाड़ किया गया है और बेधड़क होकर जिस तरह कीचड़ उछाली गई है,

भारत में सभी धर्मो का एक - सच ..?

भारत देश में इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, सिख, बुद्धिज़्म, ये प्रमुख धर्म है। इनकी प्राथमिक शिक्षा है समानता, भाईचारा, गरीबों की मदद। इन धर्मों के साथ वैदिक धर्म की तुलना की जाए तो वैदिक धर्म जाती व्यवस्था के ऊपर मुख्य रूप से आधारित है। अगर आप जाति व्यवस्था वैदिक धर्म से निकाल दोगे तो वैदिक धर्म जिसको की ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए हिन्दू धर्म का नाम दिया है, वह एक पत्ते के बंगले की तरह गिर जायेगा। उंच नीच, जातिवाद, ये वैदिक धर्म का आधार है, जिससे मूलनिवासियों का का नुक्सान ही हुआ है। इस जातिवाद, उंच नीच, अपमान और अन्याकारक हिन्दू धर्म से छुटकारा पाने के लिए हमारे मूलनिवासी भाइयों ने ये सनातन/वैदिक धर्म त्यागकर इस्लाम, इसाई, सिख और बुद्धिस्ट बने। लेकिन ब्राह्मणवाद के जातिवाद का जहर इनका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं। भारत देश में ये सभी धर्म ब्राह्मणवाद नाम के जहरीले कोबरा की लिपट में आ गए। ब्राह्मणवाद इन धर्मों में भी घुस गया है। एक के बाद एक हम इसका संक्षिप्त में विश्लेषण करते है। अगर जातिवाद, उंच नीच का जहर इन धर्मों में को मानने वालों में नहीं घुसता तो ब्राह्मणवाद कब का ख़त्म होता। 1. सिखिस्म:-किसी भी सिख गुरु ने जाति व्यवस्था मानने को नहीं कहा। फिर आज हमारे सिख भाई क्यों जाति में बंटे हुए है? क्यों नहीं, सभी सिखों को सिर्फ सिख नहीं कहा जाता? जाट सिख, रामगढ़िया सिख, कलसी सिख, मान सिख, संधू सिख, सैनी सिख, खत्री सिख, मजहबी सिख, चमार सिख ये सब क्या है? क्या सिख धर्म के गुरुओं ने ये सब मानने को कहा? क्या गुरु ग्रंथ साहब में ये सब लिखा है? इसका उत्तर है नहीं। फिर भी उंच नीच बना कर, ये सब मानकर हमारे सिख भाई ब्राह्मणवाद को क्यों बढ़ावा दे रहे है? क्या ये सिख धर्म के मूल सिद्धांत के विपरीत नहीं है? 2. इस्लाम: इस्लाम का भी मूलभूत सिद्धांत समानता है, कोई छोटा नहीं, कोई बड़ा नहीं, सब का अल्लाह एक, फिर भी मुस्लिम भारत देश में अशरफ (ऊँची जात का) , अजलफ़ (नीची जात का) , अरजल (अछूत जिन्हों ने इस्लाम कबूला), मुस्लिम राजपूत, मेहतर, कसबी, हलालखोर ये सब क्या है? क्या पाक कुरान में इसका जिक्र है? क्या मोहम्मद साहब (अल्लाह उनको शांति दे) ने ये सब माने को कहा? इसका उत्तर है नहीं। इसके सिवा शिया और सुन्नी के जो दो गुट है क्या ये इस्लाम के मूलभूत सिद्धांत के विपरीत नहीं है? 3. क्रिश्चियनिटी: ब्राह्मणवाद के जहर से ईसा मसीह का धर्म भी बच नहीं पाया। इसमें भी उंच नीच, जातिवाद का जहर बहुत है खासकर दक्षिण भारत में। दक्षिण भारत में केरल, तमिलनाडू, कर्णाटक, आंध्र प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में सीरियन क्रिस्चियन (ऊँची जाती के), एझवा क्रिस्चियन (नीची जात के), लैटिन क्रिस्चियन (अछूत धर्मान्तरित), य़ेसुइत क्रिस्चियन, खम्मा क्रिस्चियन, रेड्डी क्रिस्चियन और ना जाने कितनी जातियां है उनको ही पता है। अछूत/अनुसूचित जाती क्रिस्चियन जो है वो सबसे अधिक भेद भाव का शिकार है। उनकी दफ़न भूमि और प्रेयर चर्च अलग अलग होता है। 4. बुद्धिज़्म: बुद्धिज़्म ब्राह्मणवाद का शिकार शुरू से ही हुआ है। जैसे जैसे भगवान् बुद्धा का धम्म भारत की जनता में लोकप्रिय होने लगा, वैसे वैसे ब्राह्मण धर्म/वैदिक धर्म/सनातन धर्म घटता गया और ब्राह्मण लोग बुद्धा धम्म से जलने लगे। बुद्ध धम्म को ख़त्म करने के लिए बहुत सारे ब्राह्मण भिक्षु बन गए, उन्होंने बुद्धा धरम को कर्मकांड मानने वाला धरम बनाया जो की बुद्धा के तत्वों के विपरीत है। आप लोग देखेंगे की ज्यादातर बौध भिक्षु शुरुवात में ब्राह्मण ही थे, जिन्होंने पुष्यमित्र सुंग का साथ देते हुए अपने साथी बुद्ध भिक्षुओं का कत्ल करवाया। महायान, तिब्बतन बुद्धिज़्म, वज्रयान बुद्धिज़्म, निचेरियन बुद्धिज़्म, ये बुद्धिज़्म के शासन के खिलाफ है। ब्राह्मण जो की बौध भिक्षु बन गए उन्होंने भगवान् बुद्धा को विष्णु का अवतार बनाया और उनकी कर्मकांड के द्वारा पूजा अर्चना शुरू की, जो की बुद्धाशासन के खिलाफ है। अगर सभी मुस्लमान, सभी सिख, सभी क्रिस्चियन और बुद्धिस्ट भाइयों ने अपने अपने ग्रंथों के मुताबिक व्यवहार किया होता तो आज भारत देश पर 3% लोग कभी भी राज न करते। अब कोई भी मुस्लिम, सिख, क्रिस्चियन भाई/ बहन ये मत कहे की ये सब झूठ है और इन सब बातों को वो नहीं मानते। सच्चाई ये है की ऊपर लिखी हुयी सभी बाते प्रमाणित है।

वैदिक धर्म की की और आना कैसा ..?

दयानंद के # वेदों_की_ओर_लौटो के आह्वान के कारण स्वयं आर्य समाज भटक गया। वास्तव में वेद कोई ज्ञान का भंडार नही है बल्कि आर्यों के आदि-मानवीय जीवन की क्रिया कलापों का वर्णन है। जब आर्य जंगलों में घूमक्कड़ जीवन बिता रहे थे, उस काल में यह लोग अपनी युरेशियन भाषा संस्कृत में बोलते, नाच-गान करते और अपने क़बीले के सरदार जिसे इंद्र की उपाधि से नवाज़ा करते थे, उनकी प्रशंसा में पशु बलि के समय सुक्त वचन करते थे। यही मौखिक ज्ञान- परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही। इन सुक्तों में वह सभी क्रिया कलाप है जिसे ये लोग श्लील और अश्लील के रूप में अलग अलग नहीं देखते थे। आर्यों के क़बीलाई जीवन में नंगा रहना, सबके सामने मैथुन करना भी जायज़ था। वे उसे बच्चा पैदा करने का एक यज्ञ ही मानते थे। उस समय ख़ुशी में श्लोक भी बोलते थे। उन्हीं श्लोकों को आज हम वेदों में देख सकते हैं जिसे दयानंद सरस्वती ने गलत भाव देकर सारे सुक्तों को परमेश्वर से जोड़ दिया। क्या ऐसा करना सही था ? उसने तो आर्यों की जीवन शैली ही बदल कर रख दी। आर्यों के इतिहास को धार्मिकता के चोले में ढक दिया। आप मानें या न मानें, मैंने भी 1 नही 3-3 भाष्यकारों के वेद भाष्यों का अवलोकन किया है।*** वेद कोई ज्ञान का ख्ज़ाना नही है बल्कि इसमें हिंसा और अश्लीलता के सिवा कुछ नहीं है। मगर मैं इन श्लोकों को गलत नहीं मानता। क्योंकि यह उनके जंगली जीवन की क़बीलाई शैली थी। गलत वो आर्य समाजी हैं जो वेदों की असलियत को छुपा रहा है। प्राचीन आर्य घुमक्कड़, हिंसक, असभ्य थे, पशु मांस खाते थे, सबके सामने मैथुन करते थे। जबकि भारत में महान सिंधु सभ्यता विकसित हो चुकी थी तब ये लुटेरे उत्तरी ध्रुव और इरान (फ़ारस) में भटक रहे थे। इसलिए इन वैदिक आर्यों को इन तथ्यों को स्वीकार करने में संकोच हो रहा है क्योंकि इससे इनका मत भंग होता है।

महेन्द्रपाल आर्य का अपने आपको मोलवी और कुरान पर नुक्ताचीनी करना गलत नही ..?

महेन्द्रपाल की ओर से यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि वह पूर्व में मौलवी महबूब अली थे, केवल मौलवी ही नहीं अपितु हाफिज- ए- कुरआन भी थे। ज्ञात हो कि मौलवी वह होता है जिसे कुरआन, हदीस, फिका, तफसीर, अकाइद, इल्म-ए-कलाम, मन्तिक, फलसफा आदि का पूर्ण ज्ञान हो। यह सब ज्ञान अरबी भाषा के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। अतः एक मौलवी अरबी भाषा का पूर्ण ज्ञानी होता है। यह कोर्स करीब पन्द्रह वर्षो का है। दूसरी डिग्री महेन्द्रपाल (महबूब अली) के पास उनके दावे के अनुसार हाफिज की भी थी। हाफिज़ वह होता है जिसे पूरा कुरआन मुंह जुबानी कंठस्थ हो, और वह जहाँ से चाहे खडे-खडे़ कुरआन पढ़ कर सुना सके। मुझे असल इसी विषय पर बात करनी है कुरआन की एक एक आयत को समझने के लिये हजरत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की जीवनी को जानना आवश्यक है। श्री महेन्द्रपाल जी अगर अपने दावे के अनुसार पहले मौलवी महबूब अली थे तो हम उन से यह कैसे आशा कर सकते है कि वह मुहम्मद सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की जीवनी या कुरआनी आयतों के शान-ए-नुजूल से परिचित नहीं होंगे। परन्तु जो व्यक्ति हजरत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की जीवनी व कुरआनी आयतों के शान-ए-नुजूल से परिचित होते हुये कुरआन की उक्त आयतों पर प्रश्न खड़ा करें। हम उसे अपने दिमाग का इलाज कराने की सलाह देंगे। यह केवल हमारा निर्णय नहीं। हम इसे पाठकों की अदालत में रखते हैं। मक्के वाले जो मुहम्मद साहब के घर का घेराव कर चुके थे जब उन्होंने देखा कि वे बच निकले हैं और उन के तमाम साथी मदीना पहुँच कर आराम से रहने लगे हैं तो उन्हों ने वहाँ भी मुसलमानों को तंग करने का प्रयास किया। अतः पहले उन्होंने मदीने वालों को आपके विरुद्ध उकसाना चाहा। इसमें कामयाब न हुए तो स्वयं लाव-लश्कर लेकर मदीने पर चढ़ाई के लिए निकल पड़े। मक्के वालों की मदीने पर पहली चढ़ाई में मक्के वालों की ओर से करीब सात सौ व्यक्तियों ने भाग लिया जबकि मदीने में मुसलमानों की कुल संख्या उन से लगभग आधी थी। यहां से उन आयतों का अवतरण आरम्भ हुआ जिनसे महेन्द्र जी के दिल की धड़कनें बढ़ गयीं। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि मक्के वालों ने मदीने पर तीन बड़े आक्रमण किये। पहला हिजरत से दूसरे वर्ष, दूसरा हिजरत से तीसरे वर्ष और तीसरा हिजरत के चौथे वर्ष, अतः कुरआन की निम्न आयतें जिन पर महेन्द्र जी ने ऐतराज किया है, वे भी स्थिति के अनुसार समय- समय पर नाज़िल होती रही हैं। यहाँ तक कि कुछ आयतें हिजरत से आठ-दस वर्ष बाद फतह मक्का के समय भी नाज़िल हुईं। अब कुरआन की वे आयतें देखें - 1. जिन लोगों को मुकाबले के लिये मजबूर किया जा रहा है और उन पर जुल्म ढ़ाये जा रहे हैं अब उन्हें भी मुकाबले की इजाजत दी जाती है क्योंकि वह मजलूम हैं। यह इजाजत उन के लिये है जिन्हें नाहक उनके घरों से निकाला गया। सिर्फ इस लिये कि वे कहते थे कि हमारा परवरदिगार अल्लाह है (सूरह हज 49) दूसरों के कन्धों पर बैठ कर खुद को बड़ा दिखाने वालों की कमी नहीं है ऐसे ही साहब हैं महेंदर पाल आर्य ,वह बताते हैं की जनाब किसी मस्जिद में इमामत करते थे ,बेचारे ग़रीब इमाम की औक़ात भी क्या होती जिसका बस घरवाली पर नहीं चलता वह इमाम पर गुस्सा उतार लेता है ,इन गरीबों को खाना भी अलगअलग घरों से मिलता है वह भी मिला मिला, न मिला ,महेंद्र ने सोचा क्यों न कारोबार बदला जाए ,तो जनाब महेन्द्रपाल आर्य होगये ,खुद ही बताते है की पहले उनका नाम महबूब अली था ,चलो पहुंची वहीँ पे ख़ाक जहाँ का खमीर था ,बेहतर हुआ कि जनाब ने जल्द ही मस्जिद छोड़ दी वरना जैसी अक़्ल रखते थे न जाने कितनो का इमान खराब करते ,वह जो कक्षा १ मे बच्चों को पढ़ाया जाता है न, क, से कबूतर ,जब बच्चा अगली कक्षाओं में जाता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह इस बात को खुद समझ जाये कि ,क ,से कबूतर का क्या मतलब है और वह यह ज़िद न करने लगजाये कि, क ,से कबूतर ही होता है क से क़लम या क्लास या कुछ और नहीं बन सकता ,बस यही हाल है जनाब का ,कहते है कि अल्लाह ने कहा है कि , छ दिनों में उसने सृष्टि को रचा है तो यह बताओ कि सूरज नहीं था तो दिन का पता कैसे चला ,अरे वाह पंडित जी ज्ञानी हो तो ऐसा हो,अरे मेरे भोले पंडित अल्लाह ताला काल और आकाश से परे है उसे इंसानी दिनों से क्या सरोकार ? यहां तुम्हारे जैसे भोले मानव को यह समझाया गया है कि उसने सृष्टि को छ पिरयड में बनाया है जब कि वह चाहता तो एक शब्द कुन से सृष्टि को बना सकता था ,पंडित जी तुम्हारी यही अदाएं तो यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे कहदूं तुम मोलवी थे तुम ने अल्लाह को अर्श पर बिठा कर यह प्रश्न दाग दिया कि अल्लाह बड़ा है या अर्श ,अरे महाशय कहा न कि वह काल व् आकाश से परे है उसे बैठने उठने से कोई सरोकार नहीं है,उठना बैठना ,सोना जागना यह सब इंसानी सिफ़ात हैं ईश्वर तो इन सब से परे है, —

क्या अल्लाह प्राणी जीवो के लिए दया रखता हे .?

क्या अल्लाह प्राणी मात्र के लिय दया रखता हे .?

गौतम बुद्ध का जन्म एक क्षत्रिय परिवार में 563 ई0पू0 लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। लुम्बिनी कपिलवस्तु के पड़ोस में है। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। 
सिद्धार्थ श्रेष्ठतर जीवन मूल्यों की तलाश में 29 वर्ष की आयु में घर से निकल गए। 6 वर्ष तक सच्चाई की तलाश में भटकते हुए एक दिन उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गए। 
गौतम बुद्ध के बाद भारतीय चिंतन में एक तूफ़ान-सा आ गया था, क्योंकि गौतम बुद्ध का सीधा टकराव वैदिक ब्राह्मणों से था। वैदिक ब्राह्मण यज्ञ को प्रथम और उत्तम वैदिक संस्कार समझते थे। यह आर्यों का मुख्य धार्मिक कृत्य था। 
पशु बलि यज्ञ का मुख्य अंग थी। पशु बलि को बहुत ही पुण्य का कर्तव्य समझा जाता था। गौतम बुद्ध ने जब देखा कि आर्य लोग यज्ञ में निरीह पशुओं की बलि चढ़ाते हैं, तो यह देखकर उनका हृदय विद्रोह से भर उठा। आर्य धर्म के विरूद्ध उठने वाली क्रांति का प्रमुख कारण वैदिक पुरोहितवाद और हिंसा पूर्ण कर्मकांड ही था। 
ईसा से करीब 500 वर्ष पहले गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया था वह यह था कि, 
‘‘पशु बलि का पुण्य कार्य और पापों के प्रायश्चित से क्या संबंध ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है ?’’ 

यह एक विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध के करीब 2350 वर्ष बाद आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के प्रकांड पंडित स्वामी दयानंद सरस्वती ने इस्लाम पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया है वह यह है कि ‘‘यदि अल्लाह प्राणी मात्र के लिए दया रखता है तो पशु बलि का विधान क्यों कर धर्म-सम्मत हो सकता है ? 

पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है।’’ कैसी अजीब विडंबना है कि जो सवाल गौतम बुद्ध ने वैदिक ऋषियों से किया था, वही सवाल करीब 2350 वर्ष बाद एक वैदिक महर्षि मुसलमानों से करता है। जो आरोप गौतम बुद्ध ने आर्य धर्म पर लगाया था, वही आरोप कई ‘शताब्दियों बाद एक आर्य विद्वान इस्लाम पर लगाता है। 

धर्म का संपादन मनुष्य द्वारा नहीं होता। धर्म सृष्टिकर्ता का विधान होता है। धर्म का मूल स्रोत आदमी नहीं, यह अति प्राकृतिक सत्ता है। यह भी विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व का इंकार करके वैदिक धर्म को आरोपित किया था, मगर स्वामी दयानंद सरस्वती ने ईश्वर के अस्तित्व का इकरार करके इस्लाम को आरोपित किया है। प्राचीन भारतीय समाज में पशु बलि के साथ-साथ नर बलि की भी एक सामान्य प्रक्रिया थी। 
यज्ञ- याग का समर्थन करने वाले वैदिक ग्रंथ इस बात के साक्षी हैं कि न केवल पशु बलि बल्कि नर बलि की प्रथा भी एक ठोस इतिहास का परिच्छेद है। यज्ञों में आदमियों, घोड़ों, बैलों, मेंढ़ों और बकरियों की बलि दी जाती थी। 
रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मुख्य पुस्तक ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में लिखा है कि यज्ञ का सार पहले मनुष्य में था, फिर वह अश्व में चला गया, फिर गो में, फिर भेड़ में, फिर अजा में, इसके बाद यज्ञ में प्रतीकात्मक रूप में नारियल-चावल, जौ आदि का प्रयोग होने लगा। आज भी हिंदुओं के कुछ संप्रदाय पशु बलि में विश्वास रखते हैं। वेदों के बाद अगर हम रामायण काल की बात करें तो यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि श्री राम शिकार खेलते थे। 
जब रावण द्वारा सीता का हरण किया गया, उस समय श्री राम हिरन का शिकार खेलने गए हुए थे। उक्त तथ्य के साथ इस तथ्य में भी कोई विवाद नहीं है कि श्रीमद्भागवतगीता के उपदेशक श्री कृष्ण की मृत्यु शिकार खेलते हुए हुई थी। यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि क्या उक्त दोनों महापुरुष हिंसा की परिभाषा नहीं जानते थे ? 
क्या उनकी धारणाओं में जीव हत्या जघन्य पाप व अपराध नहीं थी ? क्या शिकार खेलना उनका मन बहलावा मात्र था ? 
अगर हम उक्त सवाल पर विचार करते हुए यह मान लें कि पशु बलि और मांस भक्षण का विधान धर्मसम्मत नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर अत्यंत दयालु और कृपालु है, तो फिर यहाँ यह सवाल भी पैदा हो जाता है कि जानवर, पशु, पक्षी आदि जीव हत्या और मांस भक्षण क्यों करते हैं। 
अगर अल्लाह की दयालुता का प्रमाण यही है कि वह जीव हत्या और मांस भक्षण की इजाजत कभी नहीं दे सकता तो फिर शेर, बगुला, चमगादड़, छिपकली, मकड़ी, चींटी आदि जीवहत्या कर मांस क्यों खाते हैं ? क्या शेर, चमगादड़ आदि ईश्वर की रचना नहीं है ? 
शेर को जंगल का राजा कहा जाता है, वह जानवरों पर इतनी बेदर्दी और बेरहमी से हमला करता है कि जानवर दहाड़ मारने लगता है। 
मांसाहारी चमगादड़ों की एक बस्ती में लगभग 2 करोड़ तक चमगादड़ें होती हैं। अगर चमगादड़ की एक बस्ती के एक रात के भोजन का अनुमान लगाये तो 2 करोड़ की एक बस्ती एक रात में करीब 2500 कुंतल कीड़ों, कीटों आदि को चट कर जाती हैं। 
अगर इन कीड़ों, कीटों की तादाद का अनुमान लगाया जाए तो यह तादाद करीब 1000 करोड़ से अधिक होती है। यह तो एक मामूली-सा उदाहरण मात्र है,
यह दुनिया बहुत बड़ी है और इस जमीनी दुनिया से कहीं अधिक विस्तृत और विशाल तो समुद्री दुनिया है जहाँ एक जीव पूर्ण रूप से दूसरे जीव पर निर्भर है। 
विश्व के मांस संबंधी आंकड़ों पर अगर हम एक सरसरी नज़र डालें तो आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन 8 करोड़ मुर्गियां, 22 लाख सुअर, 13 लाख भेड़- बकरियां, 7 लाख गाय, करोड़ों मछलियां और अन्य पशु-पक्षी मनुष्य का लुकमा बन जाते हैं। कई देश तो ऐसे हैं जो पूर्ण रूप से मांस पर ही निर्भर हैं। अब अगर मांस भक्षण को पाप व अपराध मान लिया जाए तो न केवल मनुष्य का जीवन बल्कि सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। 
जीव- हत्या को पाप मानकर तो हम खेती-बाड़ी का काम भी नहीं कर सकते, क्योंकि खेत जोतने और काटने में तो बहुत अधिक जीव-हत्या होती है। विज्ञान के अनुसार पशु-पक्षियों की भांति पेड़- पौधों में भी जीवन Life है। अब जो लोग मांस भक्षण को पाप समझते हैं, क्या उनको इतनी-सी बात समझ में नहीं आती कि जब पेड़-पौधों में भी जीवन है तो फिर उनका भक्षण जीव-हत्या क्यों नहीं है? फिर मांस खाने और वनस्पति खाने में अंतर ही क्या है ? 
यहाँ अगर जीवन Life ; और जीव Soul; में भेद न माना जाए तो फिर मनुष्य भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की श्रेणी में आ जाता है। जीव केवल मनुष्य में है इसलिए ही वह अन्यों से भिन्न और उत्तम है। विज्ञान के अनुसार मनुष्य के एक बार के वीर्य Male generation fluid स्राव (Discharge) में 2 करोड़ ‘शुक्राणुओं (Sperm) की हत्या होती है। 
मनुष्य जीवन में एक बार नहीं, बल्कि सैकड़ों बार वीर्य स्राव करता है। फिर मनुष्य भी एक नहीं करोड़ों हैं। अब अगर यह मान लिया जाए कि प्रत्येक ‘शुक्राणु (Sperm) एक जीव है, तो इससे बड़ी तादाद में जीव हत्या और कहां हो सकती है ? 
करोड़ों-अरबों जीव-हत्या करके एक बच्चा पैदा होता है। अब क्या जीव-हत्या और ‘‘अहिंसा परमों धर्मः’’ की धारणा तार्किक और विज्ञान सम्मत हो सकती है।

Big GanG theory(पर गलत नही बेवकुफ बनाते है आर्य )

आप जानते ही होंगे आर्य समाजि बिगबैंग को गलत कहकर ये कहते है की कायनात ब्रहमाण्ड प्रक्रति कणो से बना है प्रक्रति कण क्या है ! आर्य समाज के दयानन्द सरस्वती की किताब सत्यार्थ प्रकाश के आठवे समुलास मे कहा गया रज: तम: यानी मध्य और जडता निच से जो कण बना वह प्रक्रति है! अब कुरान मे सुरह अम्बिया आयत तीस ३० मे कहा गया क्या इंकारियो को इतना भी नही सुझा कि जमीन और आसमान बंध यानी एक जान थे फिर हमने इंको जुदा कर दिया और पानी से हमने हर चीज को जिन्दगी दी क्या फिर ये लोग ईमान कबुल नही करते यहाँ चरम ताप गोले की तरफ ईशारा है..अब इसलाम ये नही कहता की कायनात मे प्रदार्थ प्रमाणु से नही बने बलकी यहाँ कायनात के विस्तार से पहले की दशा का जिक्र है जबकी हिग्स बॉसान भी प्रोटॉन से चरम ताप पर बनता है मतलब कायनात की शुरुआत कणो से नही बिग बैंग से हुई जिनेवा (स्विट्जरलैंड)। वैज्ञानिकों ने बुधवार को परमाणु के भीतर नया कण खोजने का दावा किया है। यह उस ‘हिग्स बोसॉन’ यानी गॉड पार्टिकल से मिलता-जुलता है जिससे माना जाता है कि ब्रह्मांड अस्तित्व में आया। सर्न के वैज्ञानिक ब्रह्मांड के इस रहस्य को सुलझाने के लिए 2008 से प्रयोग कर रहे थे।

बुधवार को उन्होंने इसके नतीजे का ऐलान कर दिया। वैज्ञानिकों की टीम के प्रवक्ता जोए इनकाडेला ने कहा कि ‘हम हिग्स बोसॉन के करीब पहुंच गए हैं। हालांकि नया कण हिग्स बोसॉन ही है, यह कहने में वक्त लगेगा।’ लेकिन प्रयोग के दौरान जो कण मिले, वे उस जैसे ही हैं।

प्रयोग में हमारा योगदान

1. इस खोज में भारत के 100 से अधिक वैज्ञानिक कई स्तरों पर शामिल रहे।

2. भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अर्चना शर्मा महाप्रयोग में शुरू से ही शामिल रहीं।

3. एफिल टावर से ज्यादा भारी 8,000 टन के चुंबक के हिस्से भारत में बने।

बोस ने दिया बोसॉन

भारतीय भौतिकविद सत्येंद्रनाथ बोस ने 1924 में बताया कि परमाणु में मौजूद कण प्रोटॉन एक जैसे नहीं होते। उनसे निकलने वाली ऊर्जा अलग-अलग होती है। इसी आधार पर बोस-आइंस्टीन फामरूला सामने आया। सब-एटॉमिक पार्टिकल को बोसॉन कहा गया।

क्या है गॉड पार्टिकल यानी हिग्स बोसॉन?

1. ब्रह्मांड में सभी कण बिखरे हुए थे। प्रकाश की गति से यहां-वहां घूम रहे थे। जैसे पार्टी में मेहमान बिखरे रहते हैं। लेकिन सेलिब्रिटी के आते ही वे उसे घेर लेते हैं।

2. 14 अरब साल पहले बिग बैंग के समय सामने आए हिग्स बोसॉन ने सेलिब्रिटी की तरह कणों को जोड़ा। उन्हें द्रव्यमान दिया। जिससे परमाणु, अणु आदि बने।

इसलिए जरूरी था प्रयोग...

1. ब्रह्मांड की हर चीज में गुरुत्व बल और द्रव्यमान (मास) से भार होता है। द्रव्यमान पैदा करने वाला कण हिग्स बोसॉन है। अब तक स्टैंडर्ड फिजिक्स के 11 कण ढूंढ़े जा चुके हैं। लेकिन हिग्स बोसॉन तक नहीं पहुंच पाए थे।

2. यदि हिग्स बोसॉन तक नहीं पहुंच पाते तो स्टैंडर्ड फिजिक्स के सिद्धांत झूठे साबित होते। अब तक की धारणाएं झुठला दी जाती और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के अलावा पदार्थो के बनने के नए सिद्धांत भी तलाशने पड़ते।

तो कैसे तलाशा गया इसे?

1. जिनेवा में सर्न की जमीन से 175 मीटर नीचे बनी प्रयोगशाला में 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में प्रोटॉन बीम्स की टक्कर कराई गई।

2. एक सेकंड में प्रोटॉन बीम्स ने सुरंग के 11 हजार चक्कर लगाए। इससे सूरज के केंद्र के तापमान से भी लाखों गुना ज्यादा तापमान पैदा हुआ।

3. तापमान बढ़ने से प्रोटॉन टूटा। ‘हिग्स बोसॉन’ जैसे कण बने। इसका द्रव्यमान तुलनात्मक रूप से प्रोटॉन से 120 से 130 गुना ज्यादा पाया गया। दोनों टीमों (एटलस और सीएमएस) ने इस कण की पुष्टि की है।

अब ये सवाल सुलझेंगे

1. 14 अरब साल पहले ब्रह्मांड कैसे बना?

2. धरती कैसे अस्तित्व में आई?

3. इंसान और छोटी से छोटी चीजें कैसे जन्मी?

4. आकाशगंगा, तारे और ग्रह कैसे बने?

5. वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड की पांच फीसदी जानकारी है। शेष हिस्सा डार्क मैटर कहा जाता है। इसके रहस्य से अब पर्दा उठेगा।

लेकिन इनके जवाब बाकी हैं?

1. वैज्ञानिक तय नहीं कर पा रहे हैं कि नए कण को हिग्स बोसॉन ही कहा जाए या नहीं।

2. हो सकता है कि यह कण हिग्स का ही एक रूप हो या फिर एक नया ही कण हो।

3. अगर इसे नया कण माना गया तो हर चीज के बुनियादी ढांचे को लेकर बनाए गए वैज्ञानिक सिद्धांत गड़बड़ा सकते हैं।

हमें क्या फायदा?

बता रहे हैं सर्न प्रयोगशाला स्थित सीएमएस के वैज्ञानिक प्रो. विवेक आनंद शर्मा

जो निष्कर्ष मिलेंगे, उससे चिकित्सा और संचार तकनीकी में और विकास ला सकते हैं, जिसका अगले कुछ दशकों से आम आदमी फायदा उठा सकता है। यह एकदम वैसा ही है जैसे 100 साल पहले इलेक्ट्रॉन की खोज हुई। फिर बिजली और उसके बाद संचार क्षेत्र में अद्वितीय विकास हुआ। सेल फोन आए, कम्प्यूटर आए, जीपीएस की खोज हुई।

इसे ऐसे समझिए

1. चिकित्सा क्षेत्र में प्रयोग होने वाले स्कैनिंग इंस्ट्रूमेंट जो कि एटम स्मैशर पद्धति पर काम करते हैं उनका विकास होगा। मानव शरीर में मौजूद बीमारियों की विस्तृत और सूक्ष्मतर जानकारी मिल सकेगी।

2. सर्न की लैब में रोज जितना डाटा एकत्रित होता है उसे सही तरीके से रखने और दोबारा प्राप्त करने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू की खोज हुई थी। जो अब पूरी दुनिया में मुफ्त है। दो दशकों में ही यह पूरी दुनिया में संचार का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है। नए प्रयोग से इंटरनेट के क्षेत्र में विकास और तेज होगा।

3. परमाणु ऊर्जा, कंप्यूटर, मेडिसिन, मैन्यूफेक्चरिंग के क्षेत्र में क्रांतिकारी अविष्कारों के लिए दिशा मिलेगी। इलेक्ट्रॉन की ही मदद से आधुनिक विज्ञान के कई अविष्कार हुए। जो टीवी से लेकर सीडी और कैंसर रोगियों के लिए रेडियोथेरेप

सवाल-अल्लाह ने शेतान को क्यों बनाया ..?

आर्य मूर्खओ के बेकार के सवाल का सीधा जवाब शेत्तान को क्यों पैदा किया?असल बात यह है कि शैतान किसी की गुमराही के लिए कोई तर्क या कारण नहीं है बल्कि वह केवल एक बुरे सलाकार की तरह बुरे विचारों और कामों को सुझाव देनेवाला और लुभाने वाला है अतएव उसका यह बयान पूरे का पूरा कुरआन में मौजूद है तनिक ध्यान से सुनिए।जैसी दुनिया में और बहुत-सी बुरी संगतें होती हैं ऐसे ही शैतान भी एक बुरा साथी है इससे अधिक कुछ नहीं। इस बुरी संगत के प्रभाव से बचने के लिए ईश्वर ने एक इलाज बताया है बडा ही शक्तिशाली जो हकीकत में बडा प्रभावी है वह है अल्लाह का जिक्र (गुण-गाण करना) अतएव कुरआनमें इसका भी उल्लेख है--अर्थात ईश्वर के भले बन्दों पर शैतान का कोई दाव नहीं चल सकता। जो लोग अल्लाह के जिक्र में समय गुजारते हैं। और बुरे कामों से बचते हैं शैतान उनका कुछ नहीं बिगाड सकता। हां जो लोग बेहुदा बकवास और बुरी संगत में समय नष्ट करते हैं उन्हीं पर शैतान अपना जोर चला पाता है। अत- शैतान का उदाहरण बिल्कुल विष का सा समझो। जैसा कि ईश्वर ने विष पैदा करके उसका इलाज भी बता दिया है। ऐसा ही शैतान पैदा करके उसका प्रभाव बताकर इलाज (तौबा और रसूल का अनुसरण) बता दिया है। शैतान की विस्तार से बहस की जानकारी के लिए तफसीर सन्नाई भाग1 हाशिया खतमुल्लाह में देखें।हां याद आया कि दुनिया में इस समय करोडों मुसलमान, करोडों ईसाई, बौद्ध, यहूदी आदि कौमें ईश्वर के ज्ञान (वेद) को नहीं मानते बल्कि उसे मूर्ति का स्रोत जानते हैं तो परमेश्वर कैसा विवश है कि इनको सीधा नहीं कर सकता। उसके तेज में कोई फर्क तो है। आखिर किस-किस से बिगाडे और किस किस को पकडे?स्वामी जी! ''जीव आत्मा अपनी इच्छा की मालिक है'' (देखो सत्यार्थ प्रकाश, अध्याय7, नम्बर 48) धार्मिक मामलों में ईश्वर ने छूट दी हुई है जिसका जीचाहे आज्ञा पालक हो जो चाहे न हो,सुनो! कुरआन मजीद बताता है-- ''जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे काफिर बने। (सूरह कहफ - 29) और आर्य पिसचो में आपसे पूछता हु की ,, किस आयत से मालूम हुआ कि खुदा को पता नहीं। यदि शैतान के पैदा करने से खुदा बे इल्म साबित होता है तो परमेश्वर ने जैनियों को क्यों पैदा किया? जो आपके कथनानुसार मूर्ति पूजा को आरंभ करने वाले हुए जिनके बारे में सत्यार्थ प्रकाश में आप लिखते हैं- -''मूर्ति-पूजा का जितना झगडा चला है वह सब जैनियों के घर से निकला है और पाखन्डियों की जड़ यही जैन-धर्म है (सत्यार्थ प्रकाश प्रथम, उर्दू एडिशन, पृष्ठ-544, अध्याय 12, नम्बर 119) और सुनिए-- ईश्वर ने सुलतान महमूद( गजनवी औरगाजी महमूद धर्मपाल) को क्यों पैदा किया जिसने आर्यवरत की काया पलट दी और बताइए ईश्वर ने पुरानों के लेखकों को क्यों पैदा किया जिन्होंने (आपके कथनानुसार) सारे पुराण गप्पों से भरकर आर्यवरत को गुमराह कर दिया।और सुनिए..... ईश्वर ने मुसलमान क्यूं बनाए कि वेदिक धर्म का सारा ताना-बाना ही बिखर कर रह गया। , ,.........???????

Saturday, 18 July 2015

आर्य समाज के संस्थापक दयानंद जी का जीवन

अवश्य पढ़ें और अपने मित्रों को भी पढ़ाएं। अगर किसी #आर्य_समाजी_को इस पोस्ट में कोई गलती दिखाई दे तो अभद्रता दिखाकर आर्य समाज की संस्कृति सभ्यता दिखाने की बजाय अपने तर्क शांतिपूर्वक रखे। दयानंद का जन्म ब्राहमण परिवार में हुआ अर्थात पिताजी सवर्ण ज्ञानी थे वेदों का ज्ञान भी होगा या पुराणों का किन्तु वे हिन्दू थे और वे मंदिर में पूजा किया करते थे। लेकिन दयानंद ने 1838 में मात्र 15 साल की उम्र में शिवरात्रि पर देखा कि शंकर जी की मूर्ति के पास रखे प्रसाद को एक चूहा खा रहा है लेकिन शंकर जी अपने प्रसाद की भी रक्षा नहीं कर सके इसलिए दयानंद को लगा कि जो शंकर अपने चढ़ाए प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वो विश्व की रक्षा कैसे करेगा अर्थात दयानंद ने निर्णय लिया कि शंकर जी भगवान नहीं हैं और तब से शंकर जी की पूजा करनी बंद कर दी और अपने ही पिता के साथ बहस की और तर्क कुतर्क के साथ ये निर्णय लिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की पूजा नहीं करनी चाहिए। यहाँ से मूर्ति पूजा का विरोध आरम्भ हुआ। दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था, शंकर से विरोध के कारण दयानंद ने अपना नाम भी बदल कर दयानंद सरस्वती रख लिया। दयानंद पूरी तरह से नास्तिक हो चुके थे ईश्वर में या ईश्वर के किसी अवतार में कोई विश्वास ही नहीं रह गया। यहाँ तक कि अपने पिता को भी गलत साबित करने के लिए उनसे कई बार बहस की। दयानंद के इस व्यक्तित्व और नास्तिकता के कारण माता पिता चिंता में रहने लगे थे। कुछ समय पश्चात अपनी छोटी बहन और चाचा की असमयिक मृत्यु के कारण मानसिक तौर पर जन्म और मृत्यु के विषय को गंभीरता से लेते हुए ऐसे ऐसे प्रश्न करने लगे जिसके जवाब पिता के पास भी नहीं थे और न ही किसी अन्य के पास थे। जैसे कि उनको मरने से न बचाने का कारण मृत्यु टालने के उपाय आदि। दयानंद की इस स्थिति के कारण माता पिता ने निर्णय किया कि अब दयानंद का विवाह करा देना चाहिए शायद कुछ सोच में अंतर आये। लेकिन दयानंद को अपनी सोच की खोज विवाह से ज्यादा उचित लग रही थी, इसलिए 1846 में जब उनकी उम्र 23 साल की थी घर छोड़ दिया। आर्य समाजी कहते हैं कि कम उम्र में विवाह का निर्णय लिया था पिता ने किन्तु सत्य तो ये है कि 23 साल की उम्र कम नहीं होती आज के समय के अनुसार भी विवाह के लिए उत्तम मानी जाती है। घर से निकलकर कई जगहों पर यात्रा की और यात्रा करते हुए वह गुरु विरजानन्द के पास पहुंचे। गुरुवर ने उन्हें वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा-विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। परंतु गुरुवार बुद्धि में बदलाव न कर पाए और दयानंद ने पूजा पाठ का विरोध करना पुनः आरम्भ कर दिया। गुरु ने कहा कि मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ किन्तु उन्होंने उनकी विद्या ज्ञान ईश्वर भक्ति को मिटाना आरम्भ कर दिया। कई जगहों पर ईश्वर की पूजा का विरोध किया और पूजा पाठ को पाखण्ड बताया और लोगों को पूजा पाठ से रोकने हेतु प्रयास किया। बहुत से नास्तिक लोग दयानंद के साथ हो लिए और सभी नास्तिकों ने अपना एक दल बनाया। 1866 में हरिद्वार पहुंचकर कुंभ के अवसर पर पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई। गंगा स्नान आदि जैसे कर्मकांड भी पाखण्ड बताकर विरोध किया और लोगों को पूजा पाठ से रोका। [वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है। रामायण,महाभारत गीता पुराण आदि सारे धर्म ग्रन्थ नहीं हैं।] – इस का प्रचार करने के लिए दयानंद ने सारे देश का दौरा करना प्रारंभ किया। ये समय था जब हमारे देश में संस्कृत भाषा नाम मात्र को ही थी। वे हिंदी भाषा नहीं बोलते बल्कि संस्कृत में तीव्र प्रवाह से बोलते थे। इस कारण लोगों को कुछ ज्यादा ही ज्ञानी लगते थे। साथ ही वे तर्क लगाने में बहुत तेज थे या कहें कि कुछ ज्यादा ही नास्तिकता के कारण तर्क कुतर्क कुछ ज्यादा ही करते थे और सभी जानते हैं कि कुतर्कों का जवाब नहीं होता। संस्कृत ही बोलने के कारण बहुत कम लोग उनकी बात समझते थे अज्ञानी लोग उन्हें संस्कृत में तेज बोलने के कारण महाज्ञानी समझते थे। लेकिन उनकी बात का मूल नहीं समझ पाते थे। इसलिए उन्हें किसी ने हिंदी में लोगों से बात करने की सलाह दी क्योंकि कलकत्ता बम्बई आदि जिन स्थानों पर दयानंद जाते थे वहां संस्कृत के लोग नहीं बल्कि वहां की क्षेत्रीय भाषा वाले लोग अधिक होते थे जैसे कि कलकत्ता में बंगाली मुम्बई में मराठी भाषा जिनमे इतना अंतर है कि दोनों आपस में भी एक दुसरे की बात नहीं समझ सकते। इस कारण बहुत से लोग जिनके आगे तर्क कुतर्क करके दयानंद खुद और उनके अंधभक्त उनको महाविद्वान समझने लगे किन्तु फिर भी लोगों को कलकत्ता में एकमत नहीं कर सके दाल न गलने के कारण मुम्बई आ गए। इसके पश्चात् दयानंद ने हिंदी भाषा का उपयोग आरम्भ किया। मुम्बई आकर दयानंद ने 1875 में अपनी सत्यार्थ प्रकाश किताब हिंदी में लिखी और आर्य समाज की स्थापना की। मुम्बई में उनके साथ प्रार्थना समाज वालों ने भी विचार-विमर्श किया। किन्तु यह समाज तो ब्राह्मो समाज का ही मुम्बई संस्करण था। अतएव स्वामी जी से इस समाज के लोग भी एकमत नहीं हो सके। तब दयानंद यहाँ भी अपनी दाल न गलते देखकर दिल्ली प्रस्थान कर दिए। तीन वर्ष तक मुम्बई में प्रचार में असफल होने पर मुंबई से लौट कर 1878 में दयानंद इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) आए। वहां उन्होंने सत्यानुसन्धान के लिए ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलायी। किन्तु दो दिनों के विचार-विमर्श के बाद भी लोग किसी निष्कर्ष पर नहीं आ सके। यहाँ भी दयानंद किसी को एकमत नहीं कर पाए। इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से स्वामी जी पंजाब गए। पंजाब में उनके प्रति बहुत उत्साह जाग्रत हुआ और सारे प्रान्त में आर्यसमाज की शाखाएं खुलने लगीं। तभी से पंजाब आर्यसमाजियों का प्रधान गढ़ रहा है। दयानंद ये भी समझ गए कि जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं तथा फल भोगने में परतन्त्र हैं। जीवन मृत्यु किसी के वश में नहीं है। दयानन्द सभी धर्मानुयायियों को एक मञ्च पर लाकर एकता स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील थे किन्तु भाव केवल सभी के पूजा पाठ कर्म कांडों को अन्धविश्वास और पाखण्ड बताकर केवल अपनी सोच को ही उनपर सवार करने से था।

BiG BanG in Quran

क्या बिग बैंग थ्योरी गलत है?
बिग बैंग थ्योरी आज के ज़माने में यूनिवर्स
क्रियेशन की सबसे मज़बूत थ्योरी
है। इसके अनुसार दुनिया एक महाधमाके (बिग बैंग) से पैदा
हुई और उस वक्त से मौजूदा जमाने तक यह लगातार
फैल रही है। यह धमाका कितने वक्त
पहले हुआ इस बारे में वैज्ञानिकों में अलग अलग राय
है। कुछ के अनुसार ब्रह्माण्ड की कुल आयु
14 बिलियन वर्ष है तो कुछ के अनुसार 20 बिलियन वर्ष।
शुरूआती यूनिवर्स बहुत ही
सघन (Dense), और छोटे गोले के रूप में था। और अत्यन्त
गर्म था। फिर एक महाधमाके (बिग बैंग) के साथ टाइम और
स्पेस का जन्म हुआ। उस समय से आज तक यह
लगातार फैल रहा है।
बिग बैंग थ्योरी ‘रेड शिफ्ट’ और ‘कास्मिक वेव
बैकग्राउण्ड’ जैसे सुबूतों के द्वारा सत्यापित
होती है। रेड शिफ्ट बताती है कि
यूनिवर्स लगातार फैल रहा है, और जब इस फैलाव का
ग्राफ बैक साइड की तरफ बढ़ाया जाता है तो
एक बिन्दु की तरफ मिलता हुआ दिखाई देता
है। यही यूनिवर्स का
शुरूआती बिन्दु है। ‘कास्मिक वेव
बैकग्राउण्ड’, से पता चलता है कि यूनिवर्स का
शुरूआती टेम्प्रेचर आज के यूनिवर्स से बहुत
ज्य़ादा था। जो कि एक बिग बैंग का टेम्प्रेचर हो सकता है।
बिग बैंग थ्योरी कास्मोलॉजिकल थ्योरी
और आइंस्टीन की
रिलेटीविटी थ्योरी पर
भी खरी उतरती है।
ये तो बात हुई साइंस की। अब देखते हैं कि
इस्लाम इस बारे में क्या कहता है।
आईए पहले गौर करते हैं कुरआन हकीम
की कुछ आयतों पर
(6-101) वह (अल्लाह) सारे आसमान व
जमीनों का बनाने वाला है।-----
(51-47) आसमान को हमने अपने जोर से बनाया है।
और हम इसे विस्तार देकर फैलाते हैं।
(21-30) जो लोग काफिर हैं क्या वो इस पर गौर
नहीं करते कि आसमान व ज़मीन
दोनों आपस में मिले हुए थे और हमने उन्हें अलग किया।
हमने ही जानदार को पानी से पैदा
किया, इस पर भी ये लोग ईमान न लायेंगे।
(21-33) और वही वह (कादिरे मुतलक़)
है जिसने रात व दिन और आफताब व महताब को पैदा किया
कि सब के सब आसमान में तैरते हुए गर्दिश कर रहे
हें।
कुरआन की इन आयतों की
रौशनी में जो बातें साफ होती हैं,
वह ये कि यूनिवर्स में हर चीज पहले एक
दूसरे से मिली हुई थी। फिर सब
कुछ एक दूसरे से अलग हुआ और तब से यूनिवर्स
लगातार फैल रहा है। यूनिवर्स में कई आसमान हैं और
कई ज़मीनें। इन आसमानों में जो कुछ
भी है सब गर्दिश में है। कुछ भी
रुका हुआ नहीं है।
अब आप समझ सकते हैं कि बिग बैंग जैसी
मौजूदा थ्योरीज कुरआनी
हकीकतों के कितने करीब हैं। बिग
बैंग और कुरआन दोनों ही बताते हैं
कि शुरुआत में यूनिवर्स एक बिन्दु जैसी जगह
में सिमटा हुआ था। फिर यूनिवर्स के हिस्से अलग अलग
हुए और एक दूसरे से दूर हटने लगे।
अब एक सवाल उठता है कि यूनिवर्स के स्टार और
गैलेक्सीज किस चीज के जरिये
खल्क हुए? इस बारे में साइंस कुछ खास
नहीं बता पा रही है।
हकीकत ये है कि साइंस सितारों के बनने
की गुत्थी अभी तक
सुलझा नहीं पायी है। न
ही ये बता पायी है कि कायनात
की खिलकत में बनने वाला पहला मैटर कौन सा
था? लेकिन अगर हम कुरआन की ऊपर
लिखी आयतों पर गौर करें तो समझ में आता है
कि कायनात में बनने वाला पहला मैटर पानी था।
क्योंकि आयत कह रही है,‘हमने
ही जानदार को पानी से पैदा किया’।
लेकिन आयत तो सिर्फ जिन्दगी के बारे में कह
रही है? तो इसका जवाब ये है कि भले
ही साइंस कुछ ही
चीजों को जिन्दा माने लेकिन खालिके कायनात
की नजर में हर चीज जिन्दा है
और उसकी इबादत कर रही है।
सबसे पहले खल्क होने वाला मैटर पानी था,
इसके लिये एक और सुबूत हज़रत अली (अ-
स-) का खुत्बा है जो उनकी किताब नहजुल
बलागा में दर्ज है, इस खुत्बे में कहा गया है, ‘‘फिर ये कि
उस ने (अल्लाह ने) कुशादा फिज़ा, वसीअ
एतराफ व इकनाफ और ख़ला की वुसाअतें
ख़ल्क कीं और उन में ऐसा पानी
बहाया जिसके दरियाये मवाज़ की लहरें
तूफानी और बहरे ज़खार की मौज़े
तह ब तह थीं।’’ यानि स्पेस टाइम
की खिलकत के बाद पहला बनने वाला मैटर
पानी था।
अब एक सवाल और पैदा होता है, कि कायनात
की खिलकत में वक्त कितना लगा? इस बारे में
गौर करते हैं कुछ और आयतों पर,
(7-54) -----बेशक तुम्हारा परवरदिगार अल्लाह
ही है जिसने 6 दिनों में आसमान व
जमीन को पैदा किया। फिर अर्श को बनाने पर
आमादा हुआ। वही रात को दिन का लिबास
पहनाता है तो रात दिन को पीछे
पीछे तेजी से ढूंढती
फिरती है। और उसी ने आफताब
व महताब और सितारों को पैदा किया कि ये सब के सब
उसी के हुक्म के ताबेदार हैं।
(10-4) इसमें तो शक ही नहीं
कि तुम्हारा परवरदिगार वही अल्लाह है
जिसने सारे आसमान व जमीन को 6 दिन में पैदा
किया। फिर उसने अर्श को बलन्द किया------
पहली नजर में देखा जाये तो ये जुमले मौजूदा
साइंस की बुनियाद पर खरे नहीं
उतरते। कहाँ तो साइंस यूनिवर्स को बनने में अरबों खरबों
सालों की बात कर रही है और
कहां कुरआन सिर्फ छह दिनों की बात कर
रहा है। लेकिन एक बात जो गौर करने वाली
है वह यह कि हम अपना दिन गिनते हैं
पृथ्वी के अपने अक्ष पर एक पूरे चक्कर
से। जो कि चौबीस घंटे के बराबर होता है। ये
घंटे भी हमारे खुद के बनाये हुए हैं। अब
कायनात बनने की शुरुआत में
हमारी जमीन का
कहीं अता पता नहीं था। इसका
मतलब कायनात बनने में 6 दिनों की जो बात हो
रही है उसका मतलब कुछ और है। ये 6
दिन खिलकत की छह स्टेजें भी
हो सकती हैं और इनका कोई और मतलब
भी निकल सकता है। मिसाल के तौर पर इन
आयतों पर गौर करें
(32-5) आसमान से जमीन तक के हर
अम्र का वही मुदब्बिर व मुतजिम है। ये
बन्दोबस्त उस दिन जिस की मकदार तुम्हारे
शुमार से हजार बरस है उसकी बारगाह
में पेश होगी।
(70-4) जिसकी बारगाह में फ़रिश्ते व रूहें
हाजिर होती हैं एक ऐसे दिन में जिसका
अन्दाजा पचास हजार बरस है।
इस तरह यह साफ हो जाता है कि वक्त के गुजरने
की रफ्तार अलग अलग हालात में अलग अलग
है यही बात आज की साइंस
भी कह रही है। कि वक्त के
गुजरने की रफ्तार चीजों के चलने
की रफ्तार और यूनिवर्स में
उनकी पोजीशन से तय
होती है। इस तरह कायनात की
खिलकत में यकीनन एक लम्बा वक्फा गुजरा
है।
इस तरह से कुरआन और बिग बैंग थ्योरी
काफी हद तक एक दूसरे से मैच कर रहे
हैं। लेकिन इसमें कहीं कोई ऐसी
बात भी है जो खटक रही है।
मिसाल के तौर पर एक बड़े धमाके का होना। इसलिये क्योंकि
मौजूदा दौर में कोई खिलक़त इस तरह नहीं
हो रही है।
हम गौर करते हैं एक और क़दीम
इस्लामी दानिश्वर इमाम जाफर अल सादिक
(अ-) की बात पर। इमाम जाफर सादिक (अ-)
जो इमाम हुसैन (अ-) के पड़पोते थे, कहते हैं कि
यूनिवर्स के पैदाइश एक छोटे पार्टिकिल (जर्रे) से हुई
जिसके दो विपरीत ध्रुव (Opposite Poles)
थे। यह ज़र्रा विखण्डित (Fragmented), हुआ और
अपने जैसे और ज़र्रों की
पैदाइश की। इस तरह धीरे
धीरे यूनिवर्स का फैलाव हुआ। यानि यूनिवर्स का
क्रियेशन ठीक उसी तरह हुआ
जैसे किसी जानदार दरख्त या इंसान या
किसी जानवर की
पैदाइश होती है। किसी
भी जानदार का पहले एक सेल (Cell ) बनता
है फिर वह डिवाइड होकर अपने जैसे और सेल पैदा
करता है और इस तरह धीरे
धीरे पूरा जिस्म तैयार हो जाता है।
इसी तरह पूरी कायनात
की भी खिलकत हुई है।
कहीं कोई धमाका नहीं हुआ।
इमाम जाफर सादिक़ (अ-) की थ्योरी
में एक और खास बात है। जिसके मुताबिक यूनिवर्स एक
टाइम पीरियड में फैलता है और दूसरे में
सिकुड़ता है। इस तरह बिग बैग वह प्वाइंट हुआ जब
यूनिवर्स पूरी तरह सिकुड़ चुका था। उससे
पहले कायनात की कोई दूसरी
ही शक्ल मौजूद थी। जिसके बारे
में सिर्फ अल्लाह को ही इल्म है। इस
तरह खिलकत व खात्मे का यह सिलसिला हमेशा चलता
रहता है। ऐसी हालत में कायनात
की शुरुआत कब हुई यह मालूम करना
नामुमकिन है।
कायनात की शुरुआत व खात्मे के इस सिलसिले
की बात कुरआन इन अल्फाज में कह रहा
है :
(21-104) वह दिन जब कि हम आसमान को यूं लपेट
कर रख देंगे जैसे किताब के पन्ने लपेट दिये जाते हैं। जिस
तरह हमने पहले खिलकत
की शुरुआत की थी
उसी तरह हम फिर उसे दोहरायेंगे। ये एक
वादा है हमारे जिम्मे और ये काम हमें बहरहाल करना
है।
(86-11) क़सम है हटते बढ़ते चलने
(Reciprocating) वाले आसमान की।
Allah Knows better!

क्या आत्मा अनादी है?

देखो आत्मा दिखती नही नही कोई उसे महसुस कर सकता ..आत्मा एक प्रोसेस कोड सॉफ्टवेअर  की तरह है! जैसे न दिखने वाला वास्तविक वजुद न रखने वाला सॉफ्टवेअर पुरे सिसटेम मशीन आदी को ओपरेट करता है! आत्मा शरीर को ओपरेट करती है ! यानी लाशऊरी तहरिक के तरह है! जैसे सॉफ्टवेअर को खत्म किया जा सकता है वैसे ही आत्मा को भी!
जरा गौर करो मुसलमानो ये आर्य समाजी तूमसे कहते है कि आत्मा अनादी है और परमात्मा यानी जो सबका आत्मा है यानी खुदा भी अनादी है! तो जीवो यानी मखलुक की आत्मा मै तो कोई शक्ति नही अलबत्ता परमात्मा मे शक्ति कहाँ से आयी अगर यह मुमकीन है कि साथ मौजुद अरबो अत्माओ को न ईल्म आया न ताकत सिर्फ एक मे ही क्यो तो यह भी मुमकीन है कि वह एक अपनी शक्ति से  बना दे!
अनादी है तो जिसका स्वभाव ही निर्माण का है तो उसका अनादी होना संभव नही अच्छा जब अनादी है आत्मा तो परमात्मा की बात कौई क्यू माने अच्छा वेदो की हालत ही देखो ये कभी हिदायत के लिये कभी फैल नही पाये यही परमात्मा की कमजोरी दिखाई देती है! ये इल्जाम वेदों पर लगना ही है! जबकी जिन ईसाई व ईस्लाम की ये बुराई करते है ! तो परमात्मा ने इन धर्मो को फैलने से रोका नही नही वेदों की हीदायत है! लोगो तक पहुँची नही..
ये है वेदो की हकीकत ये कुरान मे शक पैदा करते है! जबकी इनके अकीदे मे बहुत कमी मौजुद है..

Thursday, 16 July 2015

क़ुरान सूरेह यूनुस की आयत 3 पर ऐतराज का जवाब,कुर्शी अर्श

पहले सही तरजुमा देखे"इन्ना (बेशक) रब्बूकूम(तुम्हारा रब या पालनहार) अल्लाहु(यकता बरहक माबुद)है!अल्लाजी़ (वह जिसने) खलक(पैदा किया)अस्समावाति(औसमानो)वल अर्दी(और जमीन को) फी(में)सित्तती(छ:)अय्यामीन( वैसे सामान्यतया अरेबी मे दिन के लिये यवमीन आता है पर यहाँ दिन से मुराद विशेष समय है)इस्तवाअल्ललअर्शि( यहा शब्द इस्तवा आया है यानी काइम होना..

पर तमाम जबानो का कायदा है! की जब कोई शब्द विशेष हस्ती के लिये स्थिति वगैरह के लिये प्रयोग हो तो उसका उसी अनुसार बदलता है ..

तो यहाँ काइम होना आम लोगो की तरह नही) अर्श या कुर्सि के दो मतलब अरेबी मे लिये जाते है 

१- खास अर्थ संपत्ति या हुकुमत 

२- तख्त...) अब इसकी कल्पना नही की जा सकती है!
ऐसे कुछ मंत्र वेदो मे भी है! जैसे यजुर्वेद अध्याय३१/१सहत्रशिर्षा पुरुष: सहस्त्राक्ष सहस्त्रपात् यानी एक विराट पुरुष जिसके हजारो हाथ पैर आँखे है..यहाँ वेदिक खुदा के लिये ये शब्द प्रयोग हुये है! लेकिन वेदिक विद्वान इसका अर्थ लेते है खुदा सारी कायनात मै फैला है! वैसे दुसरी जगह कुरान मे आठ फरिश्तो के तख्त को उठा के लाने का जिक्र है यहाँ इस आयत मे अर्श न्याय और खुदा की सुल्तानीयत का प्रतिक है..) 

अब ऐसा क्युँ तो जरा आयत के अगले शब्द पर गौर करे..युद्दबिरु (तदबीर करता है)अमवारी (काम की) यानी कायनात के निजाम या बंदोबस्त की इसे और गहराई से समझने के लिये देखे सुरह फुसीलत आयत ८-१३ तक..

मा (नही) मिन( कोई सिफारशी ) इल्लामिमबाअदीही(मगर बाद )इज्निही(इसकी इजाजत के)जा़लिक(वहहै)अल्लाहु(एकमात्र बरहक उपास्य)रब्बुकुम (तुम्हारा रब)पस उसकी बंदगी करो..."


अब इसी सुरह यूनूस आयत ३ का तर्जुमा जो आर्य समाजी पेश करते है वो ये है"अल्लाह तुम्हारा पालनहार है, जिसने पैदा किया आस्मानो को और जमीन को ६ दिनो मे फिर आस्मान पर जाकर अपने सिहासन पर विराजमान हुआ"
अब ये कहना ये चाहते है कि सिहासन तो केवल शरीर धारी का होता है..
तो जनाब ये अकीदा आपका कि परमात्मा निराकार है! तो बताओ किस रुप मे निराकार है!

१- आत्मा रुह है तो जनाब दयानंनद ने सत्यार्थ प्रकाश समुलास आठ मे आत्मा को अनादी बताया तो जब सब जीवआत्मा परमात्मा (खुदा) के साथ ही मौजुद थी तो दोनो के मकाम मे अंतर क्या रहा बाकी उसे परमात्मा क्यों माने ..चलो कहोगे कि उसने लोगो को बनाया..तो सवाल खडा होगा कैसे बनाया? 

कहोगे की अपनी शक्ति से तो कुल मिलाकर वह अपनी शक्ति से परमात्मा (खुदा) है! तो फिर उसे निराकार होने की जरुरत क्यो फैला होने यानी व्यापक या होने की जैसे नमक मे पानी मिला होना तो लोगो मे अपवित्रता क्यो जब परमात्मा उनमे है! 

तो क्या कायनात चलाने को वह फैला है! तो परमात्मा भी निर्भर हो गया चुँकि परमात्मा के हाथ पैर तो है नही तो कैसे बनाता है ! तो साफ है परमात्मा को व्यापक होने की निराकार होने की जरुरत नही..तब यह सवाल ही नीर्थक हो गया...

Tuesday, 14 July 2015

इस्लामिक तरीके से मोबाइल केसे इस्तमाल करे .?

QURAN ... MOBILE💢🔷 SUWAL AUR JAWAB.

═SUWAL 1:: Mai ye pochna chahta hu Qurane
kareem ko Mobail me rakhna Kaisa hai (Mobile kahan kahan jata hai toilet me jata hai) to mobile main Qurane Kareem ki aayat rakh sakte hai ya nahi ???  🔵JAWAB 1:: Insan k seene mein quran hai kalima hai aur wo toilet bhi jata hai to fir jana band karen Albatta screen pe quran khol kar fir galat jagah pe le jana ye bura hai Is liye apne deen ko mushkil na banayen Mobile mein quran rakhna jaiz hai ┄─━═════▤▤═════━─┄ 🔴SUWAL 2:: Agar hum mobile main Qur'an ki aayat parh rahe hain tab bhi wazu karna zarori hai ???  🔵JAWAB 2:: Agar mobile me quran ya quran ki koi aayat screen pe open nahi he Balke file band he to mobile bila wuzu pakad sakte hen screen chhu sakte hen matlab us waqt quran ke hukm me nahi... Albatta jab screen pe aayat open ho to us ko bila wuzu nahi chhu sakte. ┄─━═════▤▤═════━─┄ 🔴SUWAL 3:: MOBILE YA COMPUTER SE QURAN KI AAYAAT SEND AUR DELETE KARNA KAISA HAI ???  🔵JAWAB 3:: MOBILE YA COMPUTER SE QURAN KI AAYAAT SEND AUR DELETE KIA JA SAKTA HAI. LAKIN DUNYAWI SONGS , MOVIES YA ACTORS/ACTRESS KI PIC KO LOAD KARNE KE LIE QURAN KI AAYAAT YA DEENI POST DELETE KARNA BILKUL MUNASIB NAHI. DOOSRI QURANI AAYAAT YA DOOSRE DEENI POST KO LOAD KARNE KE LIE AGAR PURANE WALE KO DELETE KIA JAE TO KOI HARJ NAHI. AAJ BHI MADARSO MAIN AUR DOOSRI JAGHA JAB PARHAYA JATA HAI TO BLACK BOARD YA WHITE BOARD PAR QURAN KI AAYAAT AUR HADEESO KO LIKHA JATA HAI AUR PHIR OSE MITA KAR DOOSRI AAYAAT AUR HADEES LIKHI JAATI H AI. ┄─━═════▤▤═════━─┄ 🔴PLEASE SHARE ┄─━═════▤▤═════━─┄